सागरनामा 14: काप्पड़ गांव को क्या दे गया वास्को डी गामा?

केरल के कोझीकोड जिले का काप्पड़ गांव

केरल के कोझीकोड ज़िले के तटवर्ती गाँव काप्पड़ में लोग अक्सर पूछते हैं कि वास्को डी गामा उनके यहाँ आया था पर उन्हें क्या मिला.

ये सवाल उन लोगों की ओर से ज़्यादा पूछा जाता है जिनकी ज़मीन पर उस खोजी नाविक ने समंदर से निकलकर क़दम रखा था.

पश्चिमी देशों ने भारत को पहली बार काप्पड़ से ही देखा.

(मैं, हम और आप की जंग में फंसे कार्टूनिस्ट)

काप्पड़ मूलतः मछुआरों का गाँव था और है. पिछली बार भारतनामा के सिलसिले में 1998 में यहाँ आना हुआ था और पंद्रह साल बाद भी वो लगभग वैसा ही है, जैसा तब था.

कुछ नए पक्के मकान छोड़ दें तो मैं उसका एक-एक घर पहचान पा रहा था. वही घुमावदार सड़कें, वही हरे रंग की मस्जिद और वही धूल-मिट्टी खाता गंदा-सा स्मारक स्तंभ, जिस पर लिखा है कि वास्को डी गामा 1498 में यहीं उतरा था.

ख़स्ता हालत

स्मारक मुश्किल से दस वर्ग फ़ुट में बना है और ख़स्ताहाल है. रेलिंग तक टूट गई है हालाँकि अभी कुछ साल पहले वास्को डी गामा के भारत आने के पाँच सौ वर्ष पूरे हुए थे. स्थानीय लोगों के विरोध के कारण कोई जश्न नहीं हुआ. लेकिन लोग काप्पड़ में ज़रूर इकट्ठा हुए.

पाँच सौ साल से ज़्यादा के निरंतर अस्तित्व वाले काप्पड़ में वास्को डी गामा ने जिस ज़मीन पर पाँव रखे थे वह इस्माइल भाई के पूर्वजों की थी. टीपी इस्माइल ने पंचायत के कहने पर अपनी दस वर्ग फ़ुट ज़मीन प्रशासन को दे दी लेकिन घर छोड़ने को राज़ी नहीं हुए. उन्हें इसका मुआवज़ा भी नहीं मिला.

(चुनावी सूखे में केरल के रंग)

भारतनामा के समय उनका घर कच्चा था. अब वहाँ सुंदर एक मंज़िला मकान है, जिसका नक़्शा थोड़ी ज़मीन निकलने की वजह से बदलना पड़ा.

इकतालीस साल के इस्माइल भाई वास्को डी गामा के बारे में ज़्यादा नहीं जानते. उन्हें लगता है कि वो 'कोई इंग्लिशवाला' था, समुद्र से आया था. उसी की वजह से बाद में सड़क-वड़क बनी. पर उनकी ज़मीन चली गई. कहते हैं टूरिस्ट आते हैं तो दूसरे लोगों की कमाई होती है. मछुआरों को कोई नहीं पूछता. हमें क्या मिला?

ज़िंदगी की पहेली

पुराने रिकॉर्ड में कोझीकोड कालीकट है. इसी ज़िले में चेमनचेरी पंचायत का हिस्सा है काप्पड़. गाँव की कमाई के मुख्य साधन आम के बाग़ और मछलियाँ थीं. आज भी है. नारियल से उसे ज़्यादा कुछ नहीं मिलता. पर्यटन ने यक़ीनन काप्पड़ की शक़्ल होटल और रिज़ॉर्ट बनाकर बदली है, पर गाँव वहीं रह गया.

दिनभर नाव लेकर समुद्र में मछलियाँ पकड़ने वाले इस्माइल भाई अब समुद्र कम ही जाते हैं. सन 1983 में वे दुबई चले गए थे और कुछ बरस पहले, सौ की उम्र में पिता की मृत्यु के समय, वापस आए.

हथेलियों में पड़ी गाँठें दिखाते हुए इस्माइल कहते हैं, "अब उस तरह काम नहीं कर पाता. नहीं होता. हमें पैसे की फ़िलहाल किल्लत नहीं है. दोनों बेटियों की शादी हो गई है, बेटा बीकॉम कर रहा है और नया घर बन गया है. बस, कभी-कभी बेटियों को सोना-पैसा देने की मुश्किल होती है, पर चलता है. ऐसा तो सबके साथ होता है."

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पिता की बीमारी इस्माइल की वापसी की एक वजह थी तो एक वजह ये उम्मीद भी थी कि हिंदुस्तान लौटकर काम मिलेगा, ज़िंदगी बसर हो जाएगी. ऐसा हुआ नहीं.

इस्माइल के तीन भाई और पाँच बहनें हैं. बड़े भाई यूसुफ़ ज़मीन ख़रीदने-बेचने का काम करते हैं. उन्होंने अलग घर बनवा लिया है. छोटा भाई सऊदी अरब में है. 88 साल की माँ ज़ैनब और सबसे छोटी बहन अपने दो बच्चों के साथ उन्हीं के पास रहती है. उसके पति का दो साल पहले निधन हो गया था.

उम्मीद की किरण

इस्माइल अभी एक और घर बनाने की सोच रहे हैं. कहते हैं, "ये ज़मीन माँ की है, मैं ज़मीन और मकान छोटे भाई को दे दूंगा, जब वो लौटेगा. तब हम नए घर में चले जाएंगे."

रोज़मर्रा की कठिनाइयों के बावजूद इस्माइल का मानना है कि अब ज़िंदगी बहुत आसान है. असल मुश्किल तीस-चालीस साल पहले थी. एक तो गाँव बदहाल, दूसरे परिवार के पास खाने के लिए भी पैसा नहीं होता था. अभी वो मुश्किल नहीं है. दो वक़्त की रोटी और सालन मिलता है. मछली मिलती है. स्कूल है तो बच्चों की पढ़ाई-लिखाई की भी दिक़्क़त नहीं है. दवाख़ाना है, जहाँ डॉक्टर हफ़्ते में तीन दिन आता है. सड़कें पक्की हैं.

(समंदर और शहरीकरण के बीच फंसा नागांव)

काप्पड़ पढ़ाई के मामले में सबको बराबर मौक़ा देता है. लड़के-लड़कियों में भेद नहीं करता. लड़कियाँ साइकिल चलाकर स्कूल जाती हैं और अपनी उम्र के लड़कों से ज़्यादा जागरुक हैं. इस्माइल के भतीजे अल्तमश और अमनाश चौदह-पंद्रह साल के हैं, पढ़ते हैं, पर नहीं जानते कि बड़ा होकर उन्हें क्या करना है. लड़कियों के पास सपने हैं, वे कुछ करना चाहती हैं.

चेमनचेरी पंचायत की कुल आबादी क़रीब चार हज़ार है और काप्पड़ की लगभग डेढ़ हज़ार. इसमें नब्बे प्रतिशत मुसलमान हैं. दस एक घर हिंदुओं के हैं लेकिन गाँव में, बक़ौल इस्माइल भाई, 'सब अमन-चैन है. कोई लफ़ड़ा नहीं. सब एक दूसरे की मदद करते हैं.'

आपसी भाईचारा

इस्माइल के घर के ठीक पीछे एक हिंदू परिवार रहता है. घर की मालकिन गीता से कुछ दिन पहले किसी ने ज़मीन एक करोड़ रुपए में ख़रीदनी चाही पर वो गाँव छोड़ने को राज़ी नहीं हुई.

इस्माइल कहते हैं, "यहाँ सब एक हैं. मौक़ा-ज़रूरत एक दूसरे की मदद को खड़े होते हैं, ऐसा भरोसा छोड़कर कौन जाएगा?"

राजनीतिक रूप से काप्पड़ कांग्रेस का समर्थन करने वाला गाँव हैं. महँगाई उन्हें परेशान करती है, यूपीए सरकार पर घोटालों के आरोपों की उन्हें जानकारी है, कुछ भ्रष्टाचार है पर वोट तब भी कांग्रेस को देंगे क्योंकि 'अब्बा ऐसा करते थे और अम्मी ज़िद करके वोट डालने जाती हैं, कांग्रेस के लिए.'

(भटकल यानी पहचान का आतंक)

अख़बारों और टेलीविज़न पर ख़बरें देखने वाले इस्माइल भाई कहते हैं कि मार्क्सवादी अच्छे लोग हैं और नरेंद्र मोदी भी-'नरेंद्र मोदी अच्छा है. वो गुजरात में लफ़ड़ा किया तो अच्छा नहीं किया. लफ़ड़ा नहीं हो तो वो अच्छा है.'

इस्माइल धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता शब्द नहीं जानते पर कहते हैं, "मुस्लिम, हिंदू, ईसाई इधर एक साथ रहता है. एक ही है. दोस्त है. एक-दूसरे को सपोर्ट नहीं करेगा तो रह नहीं पाएगा इंडिया में. सपोर्ट नहीं होगा तो इंडिया किधर रहेगा."

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