'जान की चिंता करें या बच्चों की पढ़ाई की सोचें?'

बीबीसी कैंपस हैंगआउट, बस्तर

हर नक्सली हमले के बाद जान की चिंता करें या बच्चों की पढ़ाई के बारे में सोचें? रोटी की चिंता करें या डिग्री के बारे में सोचें? बिना डॉक्टरों के ओझा या झाड़-फूँक पर भरोसा न करें तो क्या करें? और समाज की मुख्य धारा में शामिल हो जाएँ या अपनी एक अलग संस्कृति को बचाने का संघर्ष करें?

ये वह चंद सवाल हैं जो भारत के सबसे युवा राज्यों में से एक छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर ज़िले के युवाओं ने उठाए.

आम चुनाव से जुड़े बीबीसी कैंपस हैंगआउट कार्यक्रम की शुरुआत हुई बस्तर विश्वविद्यालय से. चर्चा के केंद्र में थीं आदिवासियों की समस्याएँ.

बस्तर विश्वविद्यालय में अधिकतर छात्र ख़ुद इसी समुदाय से आते हैं और उनके लिए यह मौक़ा था अपने मुद्दे बाहरी दुनिया तक पहुँचाने का.

कैंपस हैंगआउट कार्यक्रम बीबीसी हिंदी के यूट्यूब चैनल पर लाइव प्रसारित हुआ जबकि बीबीसी हिंदी के फ़ेसबुक पेज पर पाठकों की प्रतिक्रियाएं इस पर आती रही.

एक नज़र बस्तर विश्वविद्यालय में हुई बहस के दौरान उठे मुद्दों पर

ममता

नक्सली घटना होने के बाद लोग डर जाते हैं. वे फिर बच्चों को स्कूल भेजना ही नहीं चाहते. घरों से दबाव बनता है कि वे स्कूल छोड़ दें. इस तरह पिछड़े इलाक़ों के बच्चे उच्च शिक्षा तक नहीं जा पाते. नक्सली समस्या हल हो ताकि बच्चे पढ़ने जा सकें.

हरीश बघेल

आरक्षण आदिवासियों को दिया गया है मगर उसका लाभ हमें नहीं मिल पा रहा है. जो लोग पहले से शिक्षित या विकसित हैं उन्हें ही फ़ायदा मिल रहा है.

छाया ईश्वर

गाँवों या आदिवासी इलाक़ों में स्कूल तो हैं मगर छात्र वहाँ सिर्फ़ खाना खाने जाते हैं न कि शिक्षा हासिल करने. स्वास्थ्य सुविधाएँ नहीं होने से वे ओझा या झाड़-फूँक करने वालों के पास चले जाते हैं.

मुनीश कुमार, सहायक प्रोफ़ेसर

बस्तर के लोगों की पहचान पिछड़े या आदिवासियों के रूप में है. यहाँ के छात्र-छात्राओं में इस आत्मविश्वास की कमी है कि वे कुछ भी कर सकते हैं. यहाँ के लोगों को लगता है कि इस इलाक़े में कोई भविष्य नहीं है. वे पढ़-लिखकर बाहर चले जाते हैं, यहाँ के लिए कुछ नहीं करते.

डॉक्टर आनंद मूर्ति मिश्रा, मानव विज्ञान विभाग

एक तरफ़ कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि इन लोगों का विकास होना चाहिए तो दूसरी ओर कहते हैं कि उनकी संस्कृति का संरक्षण होना चाहिए. विकास और संस्कृति संरक्षण एक साथ कैसे होगा. साथ ही देखा गया है कि स्थानीय भाषा में पढ़ाई से आदिवासियों की शिक्षा में फ़ायदा होता है तो उस पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए.

मीनाक्षी, छात्रा

आदिवासी शिल्पकारों को ठीक ढंग से प्रशिक्षित किया जाना चाहिए. स्थानीय कलाकारों को उनका उचित मूल्य नहीं मिलता. ज़रूरी है कि उनके काम के लिए स्थानीय बाज़ार विकसित हो.

माधुरी, छात्रा

स्थानीय लोग बच्चों को पढ़ाने से पहले अपनी आर्थिक स्थिति के बारे में सोचते हैं. पढ़ाने से पहले सोचते हैं कि दो वक्त की रोटी नहीं कमा पाए तो पढ़कर क्या होगा. आर्थिक स्थिति सुधरेगी तभी पढ़ाई हो पाएगी.

प्रिया शुक्ल, छात्रा

छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद की समस्या है. जब भी कोई नक्सल हमला होता है तो मीडिया ग्रामीणों के मारे जाने की ख़बर दिखा देती है मगर फिर बात मुड़ जाती है उस पर राजनीति की ओर. ऐसी नीति बननी चाहिए जिससे लोगों की समस्याओं का समाधान हो सके.

नेहा भंसोट, छात्रा

इन इलाक़ों में स्वच्छता की काफ़ी कमी है. शिशुओं या माँ की मौत की दर भी ऊँची है. शिक्षा सिर्फ़ किताबी नहीं होना चाहिए बल्कि लोगों का मानसिक विकास भी होना चाहिए.

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