क्या हिंदुत्व के सिलेंडर की हवा निकल चुकी है?

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सोमवार से शुरू हो रहे आम चुनाव में भारत के सबसे बड़े विपक्षी दल, भारतीय जनता पार्टी, की जीत की संभावना जताई जा रही है. इसकी वजह प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार भाजपा नेता नरेंद्र मोदी की अद्वितीय लोकप्रियता बताई जा रही है. इस लोकप्रियता का कारण बताया जा रहा है मोदी के बारह-वर्षीय मुख्यमंत्रीकाल के दौरान गुजरात का विकास.

मोदी कहते हैं कि वह भारत से बेरोज़गारी, महंगाई, भूखमरी, ग़ुरबत और आर्थिक शिथिलता कम कर देंगे. उनके विरोधी भले ही गुजरात की तरक़्क़ी के दावे नकारें, लेकिन यह तय है कि विकासपुरुष के दावे के आधार पर ही मोदी चुनाव हारेंगे या जीतेंगे.

ध्यान देने की बात ये है कि इस चुनाव में मोदी की एक दूसरी बड़ी उपलब्धि को भाजपा बिलकुल दबा गई है. और वो है उनका प्रखर हिंदुत्ववादी परिचय जिसके चलते वह सालों से गुजरात में लोकसभा और विधानसभा चुनाव जीतते आ रहे हैं.

'हिंदू हृदय सम्राट'

उत्तरप्रदेश के वाराणसी से चुनाव लड़ रहे मोदी अब तक अयोध्या में राम जन्मभूमि के विवादित स्थल पर माथा टेकने नहीं गए हैं. और न ही उन्होंने वहां राममंदिर बनाने की चर्चा छेड़ी है जो भाजपा हर चुनाव के पहले आदतन करती रही है.

हिंदुत्ववादी छवि से किनारा करने की मोदी की वजह साफ़ है. धर्मनिरपेक्षता ख़त्म कर हिंदू राज का लक्ष्य साधने वाली इस दक्षिणपंथी विचारधारा ने भले ही गुजरात में फ़ायदा पहुंचाया हो, देश में अन्य चुनावों में वह पूरी तरह विफल हो चुकी है.

अक्तूबर 2001 में गुजरात का मुख्यमंत्री बनाए जाने से पहले मोदी भाजपा के मातृ संगठन, रा़ष्ट्रीय स्वयंसेवकसंघ (आरएसएस), की ओर से पार्टी में आए एक मंझले स्तर के नुमाइंदे थे और पर्दे के पीछे काम करते थे.

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सितंबर 2001 में गुजरात के विधानसभा उपचुनाव में भाजपा की अप्रत्याशित हार से घबराकर भाजपा नेता और उस वक़्त के उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने मोदी को मुख्यमंत्री बना कर गुजरात भेज दिया था. सरकारी पद संभालना तो दूर मोदी ने इसके पहले चुनाव तक नहीं लड़ा था. इसलिए आडवाणी मानते थे कि मोदी उनका नुमाइंदा बन कर उनके इशारे पर चलेंगे.

लेकिन जब फ़रवरी 2002 में गोधरा शहर में एक ट्रेन में लगी आग में विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के 59 कार्यकर्ताओं की मौत हो गई तो पांच महीने पहले मुख्यमंत्री बने मोदी का जीवन एक झटके में बदल गया और वह ख़ुदमुख़्तार हो गए.

दंगाइयों ने ट्रेन में आगज़नी के लिए उस मोहल्ले के मुसलमानों को ज़िम्मेदार माना जिसके पास उस रोज़ आग लगने के वक़्त ट्रेन रुकी थी. अगले दिनों दंगाइयों ने गुजरात भर में सैकड़ों मुसलमानों की जवाबी हत्याएं कर डालीं.

इस क़त्लेआम को मोदी ने हिंदुओं की प्रतिक्रिया बताया़. उन पर आरोप लगाए जाते हैं कि उन्होंने मोटे तौर पर भाजपा-विहिप के आक्रामक रुख़ का साथ दिया. इस घटनाक्रम के बाद देश ही नहीं दुनिया भर के अपने समर्थकों में मोदी हिंदू हृदय सम्राट कहलाने लगे.

आठ महीने बाद गुजरात विधानसभा चुनाव में मोदी ने भाजपा को भारी जीत दिलाई. तब से दो और विधानभा चुनाव जीत कर वो मुख्यमंत्री बने हुए हैं. लेकिन दिल्ली के ताज की तमन्ना ने मोदी को हिंदुत्ववादी मुकुट उतारने पर मजबूर कर दिया है.

वाजपेयी का समाजवाद, आडवाणी का हिंदुत्व

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भाजपा के चुनावी हिंदुत्व के उतार और चढ़ाव की कहानी दिलचस्प है. अपने मूल में हिंदुत्ववादी होने के बावजूद भाजपा के राजनैतिक जीवन का पहला नारा हिंदुत्व का नहीं सहिष्णु गांधीवादी समाजवाद का था.

इस नारे को पहले भाजपा अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी ने 1980 में पार्टी की स्थापना के साथ ही दिया था. लेकिन साल 1984 के आम चुनाव में ये नारा पिट गया. भाजपा के 224 उम्मीदवारों में से सिर्फ़ दो जीते. वाजपेयी ख़ुद हार गए.

यह भाजपा का पहला औपचारिक चुनाव था. लेकिन इससे पिछली लोकसभा में भी तब के जनसंघ के 13 सांसद रहे थे. ये सांसद जनवरी 1980 के चुनाव में जनता पार्टी के टिकट पर चुने गए थे. उसी साल दिसंबर में भाजपा बना कर ये अलग हो गए थे.

आनन-फ़ानन में बनी जनता पार्टी ने 1977 में इंदिरा गांधी की केंद्रीय सरकार को ज़बरदस्त शिकस्त दी थी. लेकिन जब जनता पार्टी के हिंदुत्व गुट पर आरएसएस से नाता तोड़ने का दबाव पड़ने लगा तो देश की पहली ग़ैर-कांग्रेसी सरकार गिर गई.

1980 के चुनाव में इंदिरा गांधी भारी जीत के साथ वापस आईं. टूटी हुई जनता पार्टी के सभी गुटों को मुंह की खानी पड़ी थी. वाजपेयी समझते थे कि ऐसे माहौल में हिंदुत्व के नाम पर वोट नहीं मिलेंगे. इसलिए उन्होंने गांधीवादी समाजवाद का नारा दिया.

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लेकिन अक्तूबर 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या हो गई और आम चुनाव में उनके पुत्र राजीव गांधी ने भारी जीत हासिल की. वाजपेयी पीछे हट गए और भाजपा में उनके समकालीन हिंदुत्ववादी आडवाणी का उदय हुआ.

1986 से 1991 तक भाजपा अध्यक्ष रहे आडवाणी ने बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद को राजनीति का केंद्रबिंदु बनाया. 1989 के चुनाव में भाजपा 85 सीटें जीत कर लोकसभा में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी. उसके समर्थन से केंद्र में सरकार बनी.

1990-91 में ही पहली बार चार राज्यों में भाजपा की सरकारें बनीं. इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण जीत रही उत्तरप्रदेश में, जहाँ अयोध्या है. मध्यप्रदेश, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश में आज़ादी के बाद यह कांग्रेस की पहली हार थी.

'धीमी आंच पर हिंदुत्व'

1991 के आमचुनाव से आठ महीने पहले अगस्त 1990 में आडवाणी ने रामजन्मभूमि के मुद्दे पर गुजरात से अयोध्या तक रथयात्रा शुरू की जिसकी चलते देश में सांप्रदायिक दंगे हुए. अक्तूबर में आडवाणी बिहार में गिरफ़्तार कर लिए गए. एक हफ़्ते बाद अयोध्या में बाबरी मस्जिद पर हमला करने वाले भाजपा-विहिप के दर्जनों कार्यकर्ता पुलिस गोलीबारी में मारे गए.

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इस घटनाक्रम के चलते हिंदुत्व की फ़सल लहलहाने लगी. सत्ता की उम्मीद पर भाजपा ने 1984 और 1989 के मुक़ाबले 1991 में दोगुने उम्मीदवार खड़े किए. लेकिन भाजपा सिर्फ 120 सीटें जीत कर संसद में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बन पाई.

6 दिसंबर 1992 को भाजपा-विहिप के कार्यकर्ताओं ने हमला करके बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया. उसी दिन कांग्रेस की केंद्र सरकार ने भाजपा की राज्य सरकारें बर्ख़ास्त कर दीं. यहीं से हिंदुत्व की चुनावी बेवफ़ाई शुरू हो गई.

इन राज्यों में नवंबर 1993 के मध्यावधि चुनावों में भाजपा ने जीत की आशा की. लेकिन राजस्थान छोड़ कर तीनों राज्यों में उसकी बुरी हार हुई. बाबरी की परछाई 1996 के लोकसभा चुनाव पर भी पड़ी. भाजपा 161 सीटें जीत कर सबसे बड़ी पार्टी बनी लेकिन बहुमत लायक सहयोगी नहीं बटोर पाई. पहली बार प्रधानमंत्री बने वाजपेयी को 13 दिन में इस्तीफ़ा देना पड़ा.

1998 के आमचुनाव के वक़्त भाजपा को घोषणा करनी पड़ी कि वो रामजन्मभूमि मुद्दे को "धीमी आंच" पर डाल रही है. अपनी जान बचाने के लिए भाजपा हिंदुत्व की डूबती नौका से कूद पड़ी. तब से भाजपा कभी भी हिंदुत्व और रामजन्मभूमि तक लौट नहीं पाई है. क्या हिंदुत्व जिस धीमी आंच पर था उस सिलेंडर की गैस ख़त्म हो चुकी है?

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