अमित शाहः मोदी मैनेजमेंट के सबसे बड़े गुरु

  • 7 अप्रैल 2014
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अगर इस चुनाव में नरेंद्र मोदी के बाद किसी की केंद्रीय भूमिका है तो वो अमित शाह की है.

पिछले आठ महीनों से अमित शाह ने 80 लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश की कमान संभाली हुई है और उन्होंने भारतीय जनता पार्टी को जीत की एक गंभीर दावेदार में बदल दिया है.

भारतीय जनता पार्टी में ये ऐलान पहले हुआ था कि अमित शाह उत्तर प्रदेश का प्रभार संभालेंगे. पार्टी की तरफ़ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का नाम आधिकारिक तौर पर बाद में आया था. प्रधानमंत्री पद के लिए उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों को नजरअंदाज़ नहीं किया जा सकता था.

(अमित शाह के ख़िलाफ़ कार्रवाई की माँग)

ऐसे में नरेंद्र मोदी इन सीटों को न किस्मत पर छोड़ सकते थे, न पार्टी की प्रदेश इकाई पर. अमित शाह इस वक़्त पार्टी के चुनाव अभियान में दूसरे सबसे बड़े पात्र हैं. और चुनावी रणनीति के हिसाब से सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी उनकी है.

चुनावी चौपड़ पर हर बात घूम फिर कर उत्तर प्रदेश पर आती है. यह प्रदेश गांधीनगर से दिल्ली का रास्ता तय भी करवा सकता है और रोक भी सकता है. जबकि भाजपा का प्रदेश में बुरा हाल था.

उपरोक्त तथ्य गुजरात से स्थानीय पत्रकार अंकुर जैन ने बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए भेजे हैं.

बाबरी के बाद

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राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के बाद 1996, 1998 और 1999 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने उतर प्रदेश में अपना मत प्रतिशत बढ़ाते हुए 30% का आंकड़ा पार कर लिया था लेकिन 2009 के लोकसभा चुनावों में पार्टी चौथे स्थान पर रही थी और नेताओं के हौसले पस्त थे और पार्टी से जुड़े लोग अपने-अपने जुगाड़ जमाने में लगे थे.

(सवालों से कतराए अमित शाह)

भीतरघात आम बात थी और सभी दिल्ली में हाई कमान से संपर्क में रहने का दम भरते थे. सिमटते जनाधार वाले परिदृश्य का न तो कोई बड़ा नेता ज़िम्मेदार था, न गुनहगार. और न ही कोई यह पहल करने वाला कि पार्टी में फिर से जान कैसे फूंकी जा सकती है.

शायद पार्टी की हालात की तुलना गुजरात भाजपा के उन दिनों से की जा सकती थी, जब नरेंद्र मोदी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से निकालकर गांधीनगर भेजा गया था. जून, 2013 से अमित शाह का डेरा लखनऊ में लग गया. शुरू में उत्तर प्रदेश भाजपा के कद्दावर नेताओं के ये पल्ले ही नहीं पड़ा कि इसका क्या मतलब है. पर बहुत देर नहीं लगी.

यूपी की कमान

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हिंदुस्तान के लखनऊ संस्करण के कार्यकारी संपादक नवीन जोशी को याद है वो दिन जब अमित शाह लखनऊ आने के बाद उनके अख़बार के कार्यालय आए थे.

(यूपी के 'रणक्षेत्र' में मोदी)

उन्होंने कहा, "अमित शाह ने प्रदेश के सभी बड़े नेताओं को महत्व देना बंद कर दिया. मैंने प्रमोद महाजन के प्रभारी होने का भी दौर देखा है लेकिन वो सभी को साथ लेकर चलते थे. लेकिन अमित मीटिंग वगैरह में किसी के सुझाव पर कम ध्यान देते हुए कहते रहे कि अच्छा आप मुझे ईमेल कर दीजिए, लिख कर भेज दीजिए."

वे बताते हैं, "कुल मिलाकर उन्होंने यूपी के नेताओं को दबा कर रखा और संदेश सा दिया कि आप लोग सीमा में रहें, अब मैं यहां पर आ गया हूँ, एक तरह से मैं ही मोदी हूं."

धीरे-धीरे ये संदेश सबको मिलने लगा कि उत्तर प्रदेश में पार्टी के बारे में जो भी फ़ैसले होंगे, वह अमित शाह के ज़रिए होंगे और यह भी कि चुनावी रणनीति और टिकट के बंटवारे धाकड़ नेताओं की साख से ज़्यादा इस आधार पर तय होंगे कि सीट जिता पाने की संभावना किस नेता के पास सबसे ज़्यादा है.

'मन में मोदी'

Image caption अवनीश त्यागी कहते हैं कि अमित शाह मैनेजर ज़्यादा हैं और लीडर कम.

ज़ाहिर है इस तरह के प्रयासों में कुछ लोग खुश होते हैं तो मुंह फुला लेने वालों की भी तादाद बढ़ ही जाती है. मैंने उत्तर प्रदेश में भाजपा के जितने नेताओं से ऑफ़ द रिकॉर्ड बात की, सभी के मन में एक टीस ज़रूर दिखी.

(राहत के बाद बढ़ेगी आफत?)

पहले का रिवाज़ यही था कि बड़े नेता अपनी सीट की घोषणा खुद कर देते थे और अपने 'करीबियों' को भी टिकट दिलवा ही देते थे. लेकिन 2014 चुनावों में ज्यादतर की नहीं चलने दी गई. अमित शाह इस परिवर्तन के प्रमुख कारण हैं.

अवनीश त्यागी उन गिने चुने पत्रकारों में हैं जिन्हें अमित शाह ने इंटरव्यू दिया है. दैनिक जागरण अखबार में लंबे अर्से से भाजपा को कवर करते रहे हैं. वो कहते हैं, "देखिए अमित शाह मैनेजर ज़्यादा हैं और लीडर कम. क्योंकि भाजपा समर्थकों के मन में मोदी बसे थे इसलिए अमित शाह में उन्हें वही दिखने लगे."

शाह का दबदबा

Image caption चंद्र मोहन इससे सहमत नहीं हैं कि भाजपा का दबदबा कम हुआ है.

अवनीश कहते हैं, "इससे भी दूसरे नेताओं का क़द कम हुआ और अमित शाह का दबदबा बढ़ा. अमित शाह के आने से फ़ायदा ये हुआ कि तमाम नेताओं पर लगाम लगी, लेकिन नुकसान ये भी रहा कि कई ज़मीनी कार्यकर्ता इस बीच पार्टी से दूर भी हुए."

(स्नूपगेटः केंद्र ने जाँच आयोग बनाया)

मैंने खुद अपने चुनावी दौरे में अयोध्या जैसी जगहों पर जाकर भाजपा कार्यकर्ताओं और महंतों से लंबी बात की है. ज़्यादातर को अब भाजपा के आईने में सिर्फ नरेंद्र मोदी का चेहरा नज़र आता है. लेकिन साथ ही उनमें इस बात को लेकर नाराज़गी भी है कि कैसे मोदी के दूत अमित शाह के प्रदेश में आने के बाद से फ़ैसले उनकी कलम से आने लगे.

चुनाव से ठीक पहले प्रदेश में टिकटों के बंटवारे से कम से कम 10 ऐसे बड़े नेता हैं जो मुंह फुलाए बैठे ही हुए हैं. हालांकि भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता चंद्र मोहन इस दलील को खारिज करते हैं कि अमित शाह के आने के बाद से प्रदेश में नरेंद्र मोदी का दबदबा ज़्यादा और भाजपा का कम हुआ है.

गुजरात मॉडल

Image caption नवीन जोशी कहते हैं कि अमित शाह ने यूपी के बड़े नेताओं को महत्व देना बंद कर दिया है.

अमित शाह प्रदेश में पार्टी के प्रचार अभियान को सुचारू रूप से लागू करने के भी जिम्मेदार है, जिसमें ज्यादातर पार्टी के चिन्ह के अलावा सिर्फ़ मोदी का चेहरा है.

(जाँच आयोग पर सवाल)

लेकिन भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता चंद्र मोहन को भी मानना पड़ा कि अमित शाह में लोगों को मोदी दिखते हैं. उन्होंने कहा, "अमित शाह का आना भर कार्यकर्ताओं में जान फूंक गया. उन्होंने प्रदेश में भाजपा को दायित्व बोध का नारा दिया. लोगों ने गांवों में कहना शुरू किया कि यहां भी विकास का गुजरात मॉडल चाहिए और यही संदेश दिल्ली तक पहुंचाया जाए".

अमित शाह का सबसे बड़ा योगदान यही है कि प्रदेश में लोग पार्टी की कम और मोदी की बात ज़्यादा कर रहे हैं. वाराणसी से मोदी की उम्मीदवारी घोषित कर रही सही कसर भी पूरी कर दी गई.

प्रदेश के बेहद ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में जब मैं दौरे पर गया तो तमाम लोगों ने भाजपा या उसके चुनाव चिन्ह कमल के बारे में कम और नरेंद्र मोदी के बारे ज़्यादा बात की.

जसवंत सिंह

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अमित शाह पर करीब से नज़र रखने वाले कई लोगों ने मुझे ये भी बताया कि कैसे वो दूसरों की कम सुनते हैं और वही करते हैं जो उनके मन को भाता है.

(क्या बीजेपी पर बोझ बनते जा रहे हैं अमित शाह?)

मैंने ये बात ख़ुद देखी वाराणसी में उनकी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में. उनकी पत्रकारों से औपचारिक बातचीत हमेशा बहुत सीमित और संतुलित रहती है. मैंने सवाल पूछा था जसवंत सिंह के निष्कासन पर और उनका जवाब था, "जब किसी पार्टी का सत्ता में आना तय हो जाता है तो टिकट पाने वालों की कतार लंबी हो जाती है."

माना कि जसवंत सिंह इससे पहले शायद जीतने के अभिप्राय से दार्जिलिंग सीट पर चले गए थे और 2014 में राजस्थान लौटना चाह रहे थे, लेकिन उनके क़द के नेता के लिए 'कतार' जैसी मिसाल देना अपने आप में बड़ा संकेत देता है.

वैसे भाजपा की विरोधी पार्टियों के नेता इसी बात को दोहराते हैं कि अमित शाह के आने के बाद से प्रदेश के मतदाताओं के बीच ध्रुवीकरण बढ़ा है. हाल ही में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रचार के दौरान उनके 'तीखे' भाषणों पर विपक्षी दल चुनाव आयोग तक पहुंच भी चुके हैं.

गंभीर दावेदार

Image caption अखिलेश सिंह के मुताबिक भाजपा के कई स्थानीय नेता अमित शाह से नाराज़ हैं.

प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता और विधायक अखिलेश प्रताप सिंह ने कहा, "अमित शाह को भाजपा का हर नेता प्रदेश में पूरी तरह स्वीकार कर लेगा, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है. मैं आपको कई ज़िलों के वरिष्ठतम भाजपा नेताओं के नाम बता सकता हूं जो उनसे नाराज़ बैठे हैं. टिकट बंटवारे में अमित शाह पूरी तरह नाकाम रहे हैं और चुनाव निकट आते ही उनकी रणनीति भी साफ़ दिखने लगी है."

(अमित शाह को सुप्रीम कोर्ट से राहत)

अमित शाह इस वक़्त उत्तर प्रदेश की राजनीति के केंद्रीय चरित्र हैं. इसकी सीधी वज़ह यही है कि पार्टी अब पहले की तरह अराजक, विभाजित, नेतृत्वविहीन नहीं रही. अमित शाह यह परिवर्तन लेकर आए हैं, जो कुछ चुनावी सर्वेक्षणों में दिखलाई देता है.

भारतीय जनता पार्टी सबसे ज़्यादा सीटों वाले प्रदेश में किसी भी और पार्टी के मुकाबले सबसे गंभीर दावेदार बन कर उभरी है. उस राज्य में जहां कांग्रेस, समाजवाद और दलित राजनीति के सबसे बड़े चेहरे मुकाबिल हैं.

क्या अमित शाह उन सब पर भारी पड़ेंगे...हालांकि उत्तरप्रदेश के बारे में ये भी उतना ही सही है, कि जो दिख रहा होता है, हक़ीक़त उससे कहीं ज़्यादा गहरी और बारीक़ होती है.

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