'छीन लूंगा मैं ये रोटी किसी परचम की तरह'

  • 6 अप्रैल 2014
दिल्ली, मुशायरा जश्ने-ए-बहार

वो जिन दरख़्तों की छांव में से मुसाफ़िरों को उठा दिया था

उन्हीं दरख़्तों पे अगले मौसम, जो फल न उतरे तो लोग समझे

वो ख़्वाब थे ही चमेलियों से, सो सबने हाकिमों की कर ली बैअत

फिर एक चमेली की ओट में से, जो सांप निकले तो लोग समझे

दिल्ली में हुए जश्ने-बहार मुशायरे में अहमद सलमान ने अपने इस शेर के ज़रिए अपने दौर पर नज़र डालने की कोशिश की. उनकी शायरी सीधे हमलावर नहीं होती, मगर धीरे से आपके दिलो-दिमाग़ में जज़्ब हो जाती है.

दिल्ली में हुए जश्ने-बहार मुशायरे में वह पहले शायर थे, जिन्होंने ख़ालिस ग़ज़ल से शुरुआत की.

रोटी और परचम

भारत में हर तरफ़ आजकल सियासत का माहौल है. अवाम की दिक़्क़तों की चर्चा भी हो रही है. ऐसे में क्या पाकिस्तान के शायर भी वही सोचते हैं जो भारत के? अहमद सलमान ने अपने अगले शेर के ज़रिए इसकी तसदीक की –

छीन लूंगा मैं ये रोटी किसी परचम की तरह

दिन के घमासान में उतरा हूं मैं फ़ाका लेकर

बीबीसी हिंदी से बातचीत में अहमद सलमान का कहना था, ‘दोनों तरफ़ दुख-सुख एक ही हैं. क़द्रें एक सी हैं. हमारा सब कुछ एक ही तो है. बस बीच में एक लाइन सी है.’

शायरी के बदलते मिजाज़ पर वो कहते हैं, ‘अदब बराए ज़िंदगी का ज़्यादा असर है. रोटी और भूख को आप नज़रंदाज़ नहीं कर सकते. रोमांस अब ज़िंदगी की तरह ही शायरी का सिर्फ़ एक हिस्सा है.’

ख़ुद कनाडा में इम्मीग्रेशन एक्सपर्ट के तौर पर काम कर रहे अहमद सलमान के मुताबिक़ शायरी में अगर हिंदुस्तान और पाकिस्तान के शायरों का कलाम उठाएं तो आपको एक जैसे जज़्बात और ख़्वाहिशें दिखेंगी.

'जंग की बदौलत'

पाकिस्तान की मशहूर शायरा फ़हमीदा रियाज़ ने अपनी नज़्म की शुरुआत से पहले कहा– ‘मैं भारत नहीं कहती क्योंकि हिंदुस्तान एक इन्क्लूसिव लफ़्ज़ है और इसमें सभी शामिल हो जाते हैं.’

पाकिस्तान में चरमपंथ पर उनकी नज़्म में ये भी पंक्तियां थीं–

अम्न किसलिए लाएं, ख़त्म किसलिए कर दें

ये जो अरबों का कारोबार क़ायम है

जंग की बदौलत जो हम नियाज़मंदों का रोज़गार क़ायम है

'झाड़ू के कोने-किनारे'

कराची से ही आए शायर और पत्रकार अजमल सिराज का कहना था कि पाकिस्तान में भी आम लोग हिंदुस्तान की तरह तब्दीली चाहते हैं क्योंकि वे नाम बदलकर बार-बार इक़्तिदार हासिल करने वाली पार्टियों से परेशान हैं. उन्होंने अपने शेर के ज़रिए इस बात को यूं रखा -

कैसी भी हो उफ़्ताद परीशां नहीं होते, अब लोग किसी बात पे हैरां नहीं होते

कुछ ख़्वाब हैं जो नींद में देखे नहीं जाते, कुछ ग़म हैं जो चेहरे से नुमाया नहीं होते

होता है यहां रोज़ किसी शहर का मातम, इस दिल की तरह दश्त भी वीरां नहीं होते

उन्होंने कहा, ‘कोई साहब ने मुझसे पूछा कि आपके मुल्क में भी झाड़ू के कोने-किनारे नज़र आने लगे हैं. मैं समझता हूं कि सारी दुनिया में ऐसी झाड़ू वाली पार्टियां आएं और ऐसे लोग आएं, जो कूड़ा-करकट हटाएं.’

जश्ने-बहार के मंच पर उनकी ग़ज़ल ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया-

दीवार याद आ गई दर याद आ गया, दो गाम ही चले थे कि घर याद आ गया

कुछ कहना चाहते थे कि ख़ामोश हो गए, दस्तार याद आ गई सर याद आ गया

दुनिया की बेरुख़ी का गिला कर रहे थे लोग, हमको तेरा तपाक मगर याद आ गया

अपने मआमलात पे जब बात आ गई सब इम्तियाज़े-ऐबो-हुनर याद आ गया

फिर तीरगी-ए-राहगुज़र याद आ गई फिर वो चराग़े राहगुज़र याद आ गया

अजमल सिराज हम उसे भूले हुए तो हैं, क्या जाने क्या करेंगे अगर याद आ गया

'अस्लहा फेंक दो समंदर में'

पाकिस्तान की शायरा रेहाना रूही ने मुशायरे में हिंदुस्तान-पाकिस्तान दोस्ती की तमन्ना की.

अम्न हो जाएगा घड़ी भर में अस्लहा फेंक दो समंदर में

जंग सबके लिए तबाही है इसका सौदा न डालना सर में

हम बड़ों को ये सोचना होगा बच्चे कैसे जिएंगे इस डर में

दीन कहता है दोस्ती रखो, उनसे रहते हों जो बराबर में

अक्सर भारत में शायरी की महफ़िलों में शिरकत करने वाली रेहाना रूही को सियासत की बदलती ज़बान पर ऐतराज़ तो है मगर वो पूछती हैं, ‘क्या वो हमारी दुनिया से अलग हैं, आप फ़िल्मों में देखिए. क्या ज़ुबान आ गई है. सियासतदां भी उससे मुतास्सिर हैं.’

रेहाना मानती हैं कि शायर को भी दुनियावी मसलों की जानकारी होनी ज़रूरी है वरना वह सच नहीं लिख पाएगा. उनका एक शेर था –

हाकिम ने लगा ली हैं ख़रीदी हुई आंखें,

अब किसी बीनाई का अंदाज़ा लगेगा

वसीम बरेलवी

जश्ने बहार में यूं तो हर शायर को दाद मिली, मगर वसीम बरेलवी का कलाम लोगों ने बेहद सराहा. यहां तक कि मंच छोड़ने के बाद उन्हें एक बार फिर लौटना पड़ा. इंसानी जज़्बात पर उनके शेर बेहद पसंद किए गए.

उनका एक शेर था -

मैं बोलता गया हूं वो सुनता रहा ख़ामोश, ऐसे भी मेरी हार हुई है कभी-कभी

उन्होंने तरन्नुम के साथ अपनी ताज़ातरीन ग़ज़ल पेश की –

मैं उसका हो नहीं सकता बता न देना उसे, लकीरें अपने हाथ की वो सब जला लेगा

हज़ार तोड़ के आ जाऊं उससे रिश्ता वसीम, मैं जानता हूं वो जब चाहेगा बुला लेगा

मेरी आंखों को ये सब कौन बताने देगा, ख़्वाब जिसके हैं वही नींद न आने देगा

अपने घर बार छोड़कर रोज़ी-रोटी की तलाश में शहर का रुख करने वालों के लिए उन्होंने अपने जज़्बात यूं पेश किए.

भीगती झील कँवल बाग़ महक सन्नाटा, ये मेरा गांव मुझे शहर न जाने देगा

वसीम बरेलवी के अलावा पॉपुलर मेरठी, पंडित गुलज़ार देहलवी, मंज़र भोपाली, मंसूर उस्मानी और नसीम निकहत की शायरी को भी लोगों ने बेहद सराहा.

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