ऐसे बिछी अमित शाह की बिसात

बीजेपी का चुनावी पोस्टर

लखनऊ के पुराने भाजपा कार्यालय में बाहर से दारुल शफ़ा की चाय आती थी वो भी मैले-कुचैले चार इंच के गिलास में.

अब इसी जगह पर क्रॉकरी में साफ़ सुथरी चाय मिलती है जिसे तश्तरी में परोसा जाता है. मीडिया प्रभारी के गले में राम-राम वाला भगवा गमछा नहीं, हाथों में आई-पैड और आई-फ़ोन है. अगर आपको उनकी फ़ोटो खींचनी है तो एकाध स्टूडियो नुमा कमरे भी बने हुए हैं.

(मोदी मैनेजमेंट के सबसे बड़े गुरु)

लखनऊ में प्रदेश भाजपा दफ़्तर के सामने विशालकाय होर्डिंग लगा है. पर मोदी की बगल में सिर्फ़ दो लोगों को जगह दी गई है. लखनऊ से चुनाव लड़ रहे पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह और अमित शाह. अटल या आडवाणी नहीं हैं.

भारतीय जनता पार्टी का बदला हुआ मैनेजमेंट साफ़ दिखलाई देता है. दफ़्तर के भीतर हर तरफ़ जैसे नरेंद्र मोदी और अमित शाह की छाप दिखती है. दफ़्तर इस वक़्त वॉर रूम बना हुआ है. इसकी कमान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के युवा प्रचारकों के हाथ में है जिन्हे संघ ने भेजा है.

बूथ स्तर पर

उनके साथ प्रदेश से ऐसे युवा चेहरे हैं जो मोदी की तरह के कपड़े पहने अभियान को नियंत्रित कर रहे हैं. सिर्फ़ लखनऊ में हीं नहीं मुझे ज़िला कार्यालयों में यही दिखाई दिया.

मैंने पता करना चाहा कि पार्टी का प्रबंधन कैसे बदला अमित शाह ने. अमित शाह ने पहला काम किया कि प्रदेश का दौरा कर के कार्यकर्ताओं की समस्याएं सुनीं. पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में इस प्रदेश में भाजपा को मुँह की खानी पड़ी थी और उसका मनोबल गिर चुका था.

(अमित शाह के खिलाफ प्राथमिकी)

फिर पार्टी को बूथ स्तर पर मज़बूत करने की कवायद शुरू हुई. सूत्रों के मुताबिक़ अमित शाह ने भाजपा में एक अनोखी चीज़ की जिसे वे गुजरात मॉडल बताते थे. फ़रमान जारी किए गए कि उनके पास प्रदेश में बूथ कार्यकर्ताओं की सिर्फ़ सूची भर नहीं आएगी.

उन्होंने सुनिश्चित किया कि हर बूथ प्रतिनिधि का नाम, पता, फ़ोटो और फ़ोन नंबर जल्द से जल्द प्रदेश कार्यालय में जमा कराया जाए. अमित शाह को प्रदेश में भेजने के समय भाजपा ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के एक उभरते हुए सितारे को अमित शाह के आँख और कान बनाकर लखनऊ भी भेजा.

युवाओं का रिझाना

इमेज कॉपीरइट SUNIL BANSAL FACEBOOK
Image caption पार्टी सूत्रों का कहना है कि सुनील बंसल के चयन का अर्थ संघ का हस्तक्षेप है.

भाजपा के भीतर के लोग बताते हैं कि सुनील बंसल के नाम पर मुहर लगने का मतलब था आरएसएस का हस्तक्षेप. क्योंकि संगठन को इस बात का अंदाजा हो चला था कि दिल्ली जैसी जगह में आम आदमी पार्टी की तरफ़ युवाओं का ख़ासा रुझान था और इस चिंगारी को यूपी पहुँचने में ज़्यादा समय नहीं लगता.

(अमित शाह के खिलाफ कार्रवाई की माँग)

अमित शाह और उनके प्रबंधन में भाजपा पर आरएसएस के लोग हावी दिखते हैं. चाहे मोदी का चुनाव क्षेत्र वाराणसी हो या फिर राजनाथ सिंह का क्षेत्र लखनऊ. हर तरफ बड़े ही धीमे स्वर से कार्यकर्ता एक नई किस्म की भाजपा की रणनीति बनाने में जुटे हुए हैं.

पत्रकार अवनीश त्यागी अमित शाह की कॉरपोरेट शैली को रेखांकित करते हैं, "अमित शाह की कार्यशैली एक दम बिज़नेस चलाने जैसी है उसमें कार्यकर्ता का कोई रोल ही नहीं है. उन्होंने एक निजी एनजीओ से संग्रह कराया और उसकी सेवाएँ लेते रहे हैं."

उन्होंने कहा, "जब राम शिला का पूजन हुआ था तब प्रदेश भाजपा के लिए कार्यकर्ता घरों से बाहर निकले थे. अब तो एनजीओ वाले आते हैं डिब्बे, पोस्टर और दूसरी सामग्री खाली करते हैं और चले जाते हैं. ये पुरानी भाजपा है ही नहीं."

अनुशासन

Image caption राजीव बाजपेयी कहते हैं कि अमित शाह को बंगाल की तर्ज पर यूपी में भी पार्टी की बूथ कमेटियाँ बनानी हैं.

हिंदुस्तान अख़बार से वरिष्ठ पत्रकार राजीव बाजपेयी 1984 से भाजपा कवर करते आ रहे हैं. वह बूथ कमेटियों की तरफ इशारा करते हैं. उन्होंने मुझे बताया कि जैसे पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु के ज़माने में बूथ कमेटियाँ मज़बूत रहा करती थीं वैसा ही उन्हें यूपी में करना है.

(मोदी से सवालों पर 'कतराए' अमित शाह)

अमित ने भाजपा में जान फूंकी क्योंकि इससे पहले कार्यकर्ता अलग भाग रहा था और नेता अलग भाग रहे थे. कई बड़े नेता बिना अपना नाम सार्वजिनक किए इस क़दम का आज भी विरोध कर रहे हैं, क्योंकि इसके बाद मुख्यालय का सीधा संपर्क अपने कार्यकर्ताओं और उनके ब्लॉक प्रतिनिधियों से होने की प्रबल संभावना बढ़ चुकी थी.

वैसे अमित शाह के फ़रमानों का विरोध करने वाले उनकी अहमियत के साथ-साथ उनके कथित ग़लत फ़ैसलों पर भी प्रकाश डालते हैं. जौनपुर से सुल्तानपुर के रास्ते में एक ढाबे में मेरी मुलाक़ात उत्तर प्रदेश में वैश्य समाज और समाजवादी पार्टी के पूर्व मंत्री नटवर गोयल से हुई.

भाजपा से पहले मोदी

Image caption नटवर गोयल कहते हैं कि अमित शाह को लोग मोदी के चश्मे से देखते हैं.

नटवर गोयल ने बताया, "अमित शाह को लोग मोदी के चश्मे से देखते हैं. उनसे न तो पार्टी का कल्याण हुआ है न संगठन का. अगर ये नहीं होता तो भाजपा को बार-बार प्रदेश में अपने उम्मीदवार नहीं बदलने पड़ते."

(मोदी की सरकार में गृहमंत्री कौन?)

लेकिन प्रदेश और ख़ास तौर से शहरों में रहने वाले एक तबक़े को इस बात का यकीन है कि अमित शाह भाजपा की नहीं बल्कि नरेंद्र मोदी की पसंद हैं. ऐसे माहौल में ज़्यादातर को उम्मीद थी कि अपनी कारॅपोरेट कार्यशैली के चलते अमित शाह प्रदेश के कई बड़े दिग्गज नेताओं को थोड़ा किनारे तो करेंगे ही.

Image caption प्रोफेसर द्विवेदी का कहना है कि अमित शाह की वजह से प्रदेश नेताओं के परस्पर विरोधी बयान भी नहीं आ रहे हैं.

प्रोफ़ेसर एसके द्विवेदी लखनऊ विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के विभागाध्यक्ष रह चुके हैं.

उनका मत है, "मोदी को पता था कि अगर उन्हें प्रधानमंत्री बनना है तो पहले से ही यूपी पर अपनी पकड़ बनानी ज़रूरी है. लखनऊ का ही उदाहरण ले लीजिए. राजनाथ सिंह ने यहाँ से लड़ने का मन बना लिया और उस पर मोदी और अमित शाह की मुहर लग गई."

उन्होंने कहा, "अब लालजी टंडन लाख कह लें, लेकिन उनके मन में कुंठा तो है ही. अमित शाह के प्रभाव के बाद भाजपा में प्रदेश एक नेताओं के परस्पर विरोधी बयान भी तो नहीं आ रहे हैं."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार