मोदी के भरोसे पार होगी बीजेपी की नैया?

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क्या भारत की मुख्य विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने आम चुनावों में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर नरेंद्र मोदी को उतारकर सबसे बड़ा जोख़िम मोल लिया है?

निश्चित तौर पर, मोदी को बहुत सारे लोगों का समर्थन हासिल है और उसी अनुपात में लोग उन्हें नापसंद भी करते हैं.

उनके समर्थकों का मानना है कि कट्टर राष्ट्रीयता और गुजरात को विकास के रास्ते पर ले जाने वाले प्रशासक की बेहद सावधानी से बनाई गई छवि मोदी को भारत पर शासन करने के लिए उपयुक्त बनाती है.

वहीं उनके आलोचकों का मानना है कि मोदी भारत के सबसे ज़्यादा ध्रुवीकरण करने वाले राजनेता हैं. वह अपने शासन के दौरान साल 2002 में हुए गुजरात दंगों के लिए माफ़ी मांगने से इनकार कर चुके हैं.

(किसको है मोदी का इंतज़ार?)

भारतीय जनता पार्टी के मुताबिक़ देश उस दंगे को पीछे छोड़कर आगे बढ़ चुका है और जब कांग्रेस के ख़िलाफ़ ग़ुस्सा और निराशा अपने चरम पर पहुंचा हो, तब मोदी के नेतृत्व में उसके पास चुनाव जीतने का सबसे अच्छा मौका है.

मोदी ही मोदी

चुनावी सर्वेक्षण इस उम्मीद को और बढ़ा रहे हैं जिसमें कांग्रेस के मुक़ाबले में मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी को बढ़त मिलती दिख रही है.

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पार्टी के अंदर एक धड़े के विरोध के बाद भी, भारतीय जनता पार्टी ने विवादास्पद और करिश्माई मोदी के व्यक्तित्व के इर्द- गिर्द पार्टी को बढ़ने की अनुमति दे दी. वह हर जगह नज़र आ रहे हैं- समाचार पत्रों में, टीवी नेटवर्क में, बस स्टेशन या फिर मेट्रो रेल में.

वह ऊर्जा से भरा चुनावी अभियान चला रहे हैं. वह भारत भर का दौरा कर रहे हैं. वह जनसैलाब वाली चुनावी रैलियों को संबोधित कर रहे हैं. मेरे एक दोस्त ने मज़ाक में कहा भी है मोदी सर्वत्र नज़र आते हैं.

यह साफ़ दिख रहा है कि भारत में व्यक्तिवादी राजनीति का दौर लौट रहा है, जो 1970 के इंदिरा गांधी के ज़माने में था. वो दौर ऐसा था जब कांग्रेस के एक उत्साही नेता ने उनकी तुलना भारत से कर दी थी, जिस पर ख़ासा विवाद भी हुआ था. कांग्रेस तब बहुमत से चुनाव जीतती थी, जो एक पार्टी की सरकार के लिए आवश्यक था.

(चुनावी मौसम और मोदी की पगड़ी)

लेकिन 1980 के आख़िरी सालों में भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के उदय का दौर शुरू हुआ. इसके बाद भारत में कई राजनीतिक दलों की मिली जुली सरकार का दौर आया.

साल 2009 के आम चुनाव में देश भर में 363 राजनीतिक दलों ने हिस्सा लिया था. 1984 में यह संख्या महज 35 थी. बहुत लोगों का मानना है कि क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के उदय से लोकतंत्र की जड़ें मज़बूत हुई हैं और स्वस्थ संघीय व्यवस्था भी चलन में आई.

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महत्वपूर्ण यह है कि दो प्रमुख राजनीतिक दलों, कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी को पिछले पांच आम चुनाव के दौरान आधे पापुलर वोट भी नहीं मिले हैं.

भारतीय जनता पार्टी का मानना है कि मोदी का ट्रैक रिकॉर्ड और करिश्मा पार्टी को बहुमत दिलाने में कारगर साबित होगा. लेकिन दूसरे लोगों को इसको लेकर आशंका है. इन लोगों के मुताबिक एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द चुनाव लड़ना जोख़िम भरा हो सकता है.

मोदी के पक्ष में मतदाताओं का झुकाव नहीं दिख रहा है, जिसमें देश के कुल मतदाताओं का 15 फ़ीसदी हिस्सा मुस्लिम मतदाताओं का भी है. यह हिस्सा एकजुट होकर मोदी और उनकी पार्टी को चुनाव हरा सकता है.

मोदी के साथ प्रयोग

पश्चिम के उदारवादी लोकतंत्रों में व्यक्तिवादी राजनीति का चलन ज़्यादा है क्योंकि वहां इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की पहुँच ज़्यादा है. वे मुद्दों के बदले नेताओं को अहमियत देते हैं. भारत में मोदी का सैलाब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में दिख रहा है. उनके पक्ष में दिख रही लहर को कई लोग भारतीय राजनीति में अमरीकी राष्ट्रपति प्रणाली की तर्ज पर देख रहे हैं.

(मोदी के तीखे और आक्रामक होते हमले)

लेकिन दिल्ली स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसायटीज (सीएसडीएस) के चुनाव विश्लेषक संजय कुमार इस चलन पर संदेह जताते हैं.

वह मानते हैं कि भारत में व्यक्तिवादी राजनीति का दौर लंबे समय तक नहीं चलेगा क्योंकि विविधता भरे देश में कई मज़बूत क्षेत्रीय पार्टियां मौजूद हैं.

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ऐसे में भारतीय जनता पार्टी ने एक ही व्यक्ति पर इतना बड़ा दांव कैसे खेल लिया?

कईयों का मानना है कि पार्टी के पास कोई विकल्प नहीं था. ख़ासकर 2004 और 2009 में पार्टी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में दो चुनाव हारने के बाद कोई विकल्प नहीं था.

संजय कुमार कहते हैं, "पार्टी मोदी के साथ प्रयोग कर रही है और जीतने की उम्मीद कर रही है. यह कामयाब भी हो सकता है और नाकाम भी हो सकता है."

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