चुनाव सर्वेक्षणों पर पाबंदी से क्या मिलेगा?

  • 9 अप्रैल 2014
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चुनाव सर्वेक्षणों पर पाबंदी की मांग मेरे लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं है. जो लोग चुनाव सर्वेक्षणों पर पाबंदी की मांग कर रहे हैं, उनका तर्क है कि इससे मतदान प्रभावित होता है.

कई चुनाव सर्वेक्षण राजनीतिक पार्टियों की ओर से प्रायोजित होते हैं.

इस तरह के तर्कों का कोई मज़बूत आधार नहीं है क्योंकि इस बात के कोई सबूत नहीं कि चुनाव सर्वेक्षणों का असर मतदान के निर्णय पर पड़ता है. भारत जैसे देश में बहुसंख्यक मतदाता अशिक्षित हैं. वे समाचार पत्र भी नहीं पढ़ सकते.

ऐसे में सर्वेक्षण किस तरह बड़ी संख्या में मतदाताओं को प्रभावित कर सकते हैं.

यह सही है कि बीते कुछ दशक के दौरान भारत में मीडिया का तेज़ी से विस्तार हुआ है. इसकी पहुंच बहुत बड़ी आबादी तक हो चुकी है, लेकिन अब भी मतदाताओं का बड़ा तबक़ा, जिसमें ग़रीब और गांवों में रहने वाले अशिक्षित शामिल हैं, मीडिया की पहुंच के दायरे से बाहर है.

मीडिया का कितना प्रभाव?

ऐसे में यह जानना दुखद और अचरज भरा है कि शहरों में रहने वाला शिक्षित तबक़ा जो ख़ुद को तर्कसंगत मानता है, वह चुनाव सर्वेक्षणों के नतीजों से प्रभावित हो जाता है.

जो लोग ये मानते हैं कि चुनाव सर्वेक्षणों से मतदान प्रभावित होता है और इसके असर से लोग उस उम्मीदवार को मत देते हैं जिसके जीतने की संभावना जताई जाती है, तो उन्हें यह स्वीकार करने के लिए भी तैयार होना चाहिए कि इसका ठीक उल्टा असर भी हो सकता है.

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चुनाव सर्वेक्षण में जिसके जीतने की संभावना जताई जा रही हो, उसके विरोधी मतदाता भी एकजुटता दिखाकर उसे हराने के लिए तैयार हो सकते हैं.

चुनाव सर्वेक्षणों के अमूमन इस तरह के सवाल होते हैं- वह कौन से मुद्दे हैं जिनमें मतदाता अपना मत डालता है, कौन सबसे लोकप्रिय नेता है और किस तरह से समय सीमा के अंदर किसी की लोकप्रियता बढ़ गई है या कम हुई है.

राजनीतिक दलों को समर्थन देने की वजह क्या है, आदि. ऐसे सवाल किसी भी बहुदलीय लोकतंत्र में पूछा जाना वैध है.

मतदाताओं पर असर

नहीं तो इन सवालों के जवाब हमें कहां से मिलेंगे? चुनाव आयोग के परिणाम से हम केवल यह जानते हैं कि किस राजनीतिक दल या किस उम्मीदवार को कितने प्रतिशत मत मिले हैं, या फिर कौन सी पार्टी चुनाव जीती है या हार गई है.

चुनाव सर्वेक्षण से हमें इन सवालों के ही नहीं बल्कि दूसरे तमाम सवालों के जवाब मिलते हैं जिससे कोई भी शख़्स अपनी जानकारी को अपडेट कर सकता है, भले उसके पास पहले से ही कितनी भी जानकारी क्यों न हो.

मैं इससे कतई सहमत नहीं हूं कि चुनाव सर्वेक्षण किसी ख़ास मकसद को पूरा करते हैं, भले ही वे किसी राजनीतिक पार्टी द्वार प्रायोजित क्यों नहीं हों. अगर कोई सर्वेक्षण करने वाली एजेंसी किसी राजनीतिक दल के एजेंडे के आधार पर सर्वेक्षण करती है तो वह इस काम में लंबे समय तक नहीं टिक सकती. हाल ही में एक स्टिंग ऑपरेशन में जिस तरह से सर्वेक्षण एजेंसियां फंसी हैं, उससे भी आसानी से उनकी पोल खुल जाती है.

लेकिन इसके साथ ही मुझे उन राजनीतिक पार्टियों की सोच पर भी तरस आता है जो लोगों के बीच ज़मीनी स्तर पर काम नहीं करतीं लेकिन सोचती हैं कि चुनाव सर्वेक्षणों का सहारा लेकर वे अपनी पार्टी के पक्ष में लोगों का समर्थन जुटा लेंगी.

ऐसे में मुझे लगता है कि उन्हें किसी ने गुमराह किया होगा क्योंकि चुनाव सर्वेक्षणों के ज़रिए व्यापक तौर पर मतदाताओं के मन को बदलना संभव नहीं होता.

अच्छे सर्वेक्षण, ख़राब सर्वेक्षण

इतना ही नहीं. आम लोगों के बीच क्या यह आम धारणा नहीं है कि ये सर्वेक्षण हमेशा ग़लत ही होते हैं? जिस चुनावी सर्वेक्षण की विश्वसनीयता आम मतदाताओं की नज़र में इतनी कम हो तो फिर वह किसी मतदाताओं के मन को प्रभावित कर सकता है?

हालांकि दुख के साथ, मैं इस बात से सहमत हूं कि सर्वेक्षण के प्रारूप के हिसाब से अच्छे सर्वेक्षण होते हैं तो ख़राब सर्वेक्षण भी होते हैं, जिनमें उचित तौर तरीकों का ध्यान नहीं रखा जाता.

ऐसे में हमें भारत में चुनाव सर्वेक्षण की तकनीक को बेहतर बनाने पर ध्यान देना चाहिए, इसे ज़्यादा पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की ज़रूरत है, लेकिन दुखद यह है कि इस वक्त चर्चा इस बात की हो रही है कि इस पर पाबंदी लगे या नहीं?

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व्यक्तिगत तौर पर मैं ऐसी किसी भी कोशिश का स्वागत करूंगा जिसके ज़रिए चुनावी सर्वेक्षण को आम लोगों के प्रति ज़्यादा जवाबदेह बनाया जा सके. जो लोग चुनाव सर्वेक्षण कराते हैं उनके लिए सर्वेक्षण का प्रारूप-विधि के साथ साथ सैंपल साइज से जुड़ी सभी जानकारी बताने को अनिवार्य कर देना चाहिए. इतना ही नहीं एजेंसियों को सर्वेक्षण दौरान होने वाले खर्चे का ब्यौरा भी अनिवार्य तौर पर बताना चाहिए.

पाबंदी पर सवाल

जो लोग चुनाव सर्वेक्षणों से जुड़े हैं वे ये जानकारी बताने से क्यों हिचकते हैं? इसका कोई कारण मुझे समझ में नहीं आता. चुनाव सर्वेक्षण करने वालों से अलग किसी तीसरी पार्टी द्वारा तैयार आचार संहिता का भी स्वागत है.

चुनाव सर्वेक्षण पर पाबंदी लगाने से मकसद पूरा नहीं होगा. जो लोग चुनाव सर्वेक्षण के ज़रिए गंदगी फैलाते हैं वह कोई दूसरा रास्ता तलाश लेंगे.

क्या हम पेड न्यूज़ के गंभीर आरोपों को देखते हुए चुनाव की रिपोर्टिंग पर पाबंदी लगा देंगे? चुनाव अभियान के दौरान तय सीमा से ज़्यादा पैसा ख़र्च करने के गंभीर आरोप की वजह से हम चुनाव पर पाबंदी लगा देंगे?

मैच फ़िक्सिंग के गंभीर आरोपों की वजह से हम क्रिकेट पर पाबंदी लगा देंगे? इन सभी मामलों की तरह ही चुनाव सर्वेक्षणों पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले हमें इसके साथ की गई छेड़छाड़ की गंभीरता से जांच करनी चाहिए.

(संजय कुमार सेंटर फ़ॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसायटीज के वर्तमान निदेशक एवं प्रोफेसर हैं)

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