यह ऊँट किस करवट बैठेगा?

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केरल की सभी 20 सीटों के अलावा बिहार, झारखंड, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, जम्मू और दिल्ली में लोकसभा के पहले चरण के मतदान से संकेत मिलने लगेंगे कि ऊँट किस करवट बैठने वाला है.

इस बार आम चुनाव काफ़ी दिलचस्प होने वाले हैं क्योंकि कई मुद्दे हैं जिनको लेकर देश के विभिन्न इलाक़ों में राजनीतिक दलों की क़िस्मत दांव पर लगी है.

भारतीय जनता पार्टी के सामने बड़ी चुनौती तो है ही, साथ ही क्षेत्रीय दलों के लिए भी यह इम्तिहान काफ़ी कठिन है.

केरल की बात करें, तो यहाँ मुक़ाबला काफ़ी दिलचस्प है. ऐसी सूरत में भारतीय जनता पार्टी को यहाँ खाता खोलने की उम्मीद बंधी है. पार्टी का दावा है कि नरेंद्र मोदी के पक्ष में चल रही लहर का असर इस दक्षिण भारतीय राज्य में भी देखने को मिला है और उसे यहाँ लाभ होने जा रहा है.

खुलेगा खाता?

सवाल उठता है कि क्या 'गॉड्स ओन कंट्री' यानी भगवान का अपना देश कहे जाने वाले केरल में क्या नरेंद्र मोदी की लहर भारतीय जनता पार्टी को एक सीट भी दिला पाएगी? यह भी सवाल उठता है कि क्या केरल के 56.2 प्रतिशत हिंदुओं की आबादी के बीच भाजपा और नरेंद्र मोदी की 'लहर' का प्रभाव हो पाया या नहीं?

वरिष्ठ पत्रकार वेंकटेश रामकृष्णन मानते हैं कि भाजपा इस बार केरल में पहले से बेहतर स्थिति में है और नरेंद्र मोदी की लहर का असर भी देखा जा रहा है. मगर, वह कहते हैं कि भाजपा की स्थिति इतनी भी बेहतर नहीं हुई है कि वह केरल में बहुत सारी सीटें ला पाए.

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वह कहते हैं कि केरल के दक्षिणी क्षेत्र की थिरुवनंतपुरम और कासरगोड सीट पर भाजपा ने काफ़ी ज़ोर आज़माइश की है और अपनी जीत के लिए आशान्वित है. मगर, उसके लिए इन सीटों पर जीत दर्ज करना उतना आसान भी नहीं होगा.

रामकृष्णन का मानना है कि संघर्ष राज्य के दो प्रमुख गठबंधनों के बीच होगा- कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूनाइटेड फ्रंट और दूसरी सीपीएम के नेतृत्व वाली एलडीएफ़. उनका कहना है कि राष्ट्रीय मुद्दों के बजाय स्थानीय मुद्दे ही केरल में हावी रहे हैं और यह चुनाव पूरी तरह से इन्हीं के इर्द-गिर्द ही लड़ा जा रहा है.

सत्ता विरोधी लहर

हरियाणा की बात करें, तो यहाँ लोकसभा की दस सीटें हैं, जहाँ संघर्ष काफ़ी दिलचस्प है. हरियाणा में भूपिंदर सिंह हुड्डा की सरकार दो बार से सत्ता में है और इस बार उनके सामने चुनौती काफ़ी बड़ी है. यहाँ सत्ता विरोधी लहर केंद्र और राज्य सरकारों के ख़िलाफ़ देखी जा सकती है.

चूँकि दोनों जगह ही कांग्रेस की सरकारें हैं इसलिए कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती है.

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ओमप्रकाश चौटाला की भारतीय राष्ट्रीय लोकदल और भारतीय जनता पार्टी के बीच चुनाव पूर्व गठबंधन नहीं हो पाया, जिसकी संभावनाएं व्यक्त की जा रही थीं. अलबत्ता भाजपा ने हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल के पुत्र कुलदीप बिश्नोई की हरियाणा जनहित कांग्रेस के साथ गठबंधन किया है.

इस बार आम आदमी पार्टी ने भी सभी सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए हैं. आम आदमी पार्टी के चुनावी समर में आने से हरियाणा की 10 सीटों पर हो रहे चुनाव काफ़ी दिलचस्प हो गए हैं.

वरिष्ठ पत्रकार दलजीत आमी का कहना है कि चुनाव पूर्व समझौता न होने के बावजूद चौटाला की पार्टी और भाजपा में अंदरूनी समझौता इसलिए है क्योंकि पंजाब में अकाली दल और भारतीय राष्ट्रीय लोकदल मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं. अकाली दल भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन का हिस्सा भी है.

दलजीत आमी का कहना है कि हरियाणा ऐसा राज्य होगा, जहाँ बुनियादी मुद्दों के बजाय कौन किसके साथ है और किसने किसका साथ छोड़ दिया- इस बार चुनाव में भी इन्ही मुद्दों पर ज़्यादा ज़ोर है. उनका मानना यह भी है कि ज़्यादातर सीटों पर हार-जीत का फ़र्क़ काफ़ी कम ही रहेगा.

कड़ी टक्कर

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ओडिशा की भी दस सीटों पर चुनाव हो रहा है, जिनमें से मुख्य रूप से पश्चिमी ओडिशा की कालाहांडी, कोरापुट, बोलांगीर, सुंदरगढ़ और बरगढ़ शामिल हैं. इन दस में से पांच सीटें पिछली बार कांग्रेस ने जीती थीं और इस बार उनके लिए परिस्थितियां काफ़ी मुश्किल हैं.

इस बार भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस और बीजू जनता दल को बड़ी चुनौती दे रही है. कांग्रेस के लिए मुश्किलें इसलिए भी बढ़ गई हैं क्योंकि कई दिग्गज समझे जाने वाले नेताओं ने पार्टी छोड़ दी है.

भाजपा को भी लगता है कि पश्चिमी ओडिशा में उसकी संभावनाएं ज़्यादा अच्छी हैं. इसलिए नरेंद्र मोदी की ज़्यादातर चुनावी सभाएं इन्हीं इलाक़ों में आयोजित की गई हैं.

पत्रकार संदीप साहू का कहना है कि बीजू जनता दल के लिए सत्ता विरोधी लहर से ज़्यादा बड़ी चुनौती उन नेताओं से है, जिन्हें पार्टी ने टिकट नहीं दिया और वह बाग़ी हो गए.

संदीप का कहना है कि इस बार पार्टी ने दूसरे दलों से आए नेताओं को टिकट बंटवारे में ज़्यादा तरजीह दी है, जिससे आक्रोश और ज़्यादा बढ़ गया है.

'कम होगा मतदान'

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छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर की एक सीट पर चुनाव कराना प्रशासन और पुलिस के लिए काफ़ी चुनौती भरा है. क्योंकि हमेशा की तरह इस बार भी माओवादियों ने चुनाव बहिष्कार की घोषणा की है.

वैसे भी मौजूदा सांसद भाजपा के दिनेश कश्यप सिर्फ ढाई साल से ही कुर्सी पर हैं और इस दौरान उन पर ज़्यादा कुछ न कर पाने का आरोप है.

कांग्रेस ने नक्सली हमले में मारे गए अपने नेता महेंद्र कर्मा के पुत्र दीपक कर्मा को टिकट दिया है, जिन्हें राजनीति का ज़्यादा अनुभव नहीं है.

बस्तर में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार सत्यनारायण पाठक कहते हैं कि इस बार चुनावी माहौल काफ़ी सुस्त रहा है. वह कहते हैं कि जितना जोश विधानसभा चुनाव में देखा गया, इस चुनाव में न के बराबर है. यही कारण है कि इस बार ज़्यादा अच्छे मतदान की उम्मीद भी कम ही है.

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