जुबानी जंग में पिछड़ते राहुल गांधी

  • 11 अप्रैल 2014
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कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी के चुनावी भाषण लोकप्रिय रुझान को बदल पाने में नाकाम रहे हैं.

कांग्रेस ने जब से नेहरु गाँधी परिवार के वारिस राहुल गाँधी को 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार अभियान की कमान सौंपी है, वे देश के कोने कोने में जाकर बीते दस बरस के दौरान पार्टी के कामकाज के बारे में लोगों को बता रहे हैं और सत्ता में वापसी की सूरत में आगे का एजेंडा भी सामने रख रहे हैं.

(दलितों का खैरख्वाह)

राहुल गाँधी के भाषण को मुख्यतः दो भागों में बांटा जा सकता है. पहला हिस्से में वे आम तौर पर विपक्ष पर हल्ला बोलते हैं और भाजपा को ख़ासतौर पर निशाना बनाते हैं. राहुल का कहना है कि भाजपा नफ़रत फैला रही है. राहुल के भाषणों के दूसरे हिस्से में कांग्रेस की आगे की कार्ययोजना की बात रहती है.

पहली श्रेणी के भाषणों में वे भाजपा पर बंटवारे की राजनीति का आरोप लगाते हैं. उनका कहना है कि भाजपा सबको साथ लेकर चलने की बजाय कुछ लोगों के लिए काम करती है.

वे मुख्य विपक्षी पार्टी और उसके नेताओं ख़ासकर नरेंद्र मोदी पर अहंकारी होने का भी आरोप लगाते हैं.

सेकुलर भारत

कांग्रेस का ये नौजवान नेता भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की कड़ी आलोचना करते हैं.

वहीं मोदी भी नेहरु गाँधी परिवार पर हल्ला बोलने का आम तौर पर कोई मौक़ा नहीं छोड़ते हैं और वे ख़ास तौर पर राहुल को निशाना बनाते हैं. और सियासी हमला बोलने के लिहाज से मोदी जिन शब्दों को चुनते हैं, वे न तो अपने आपे में होते हैं और न ही सभ्य कहे जा सकते हैं.

(मोदी और राहुल का एक दूसरे पर हमला)

फ़रवरी की 23 तारीख को देहरादून में राहुल ने 'कांग्रेस मुक्त भारत' के जुमले के लिए मोदी को आड़े हाथों लिया और गीता, कुरान और बुद्ध की बातों का हवाला देकर लोगों को ये समझाने की कोशिश की कि कांग्रेस सेकुलर भारत के विचार की नुमाइंदगी करती है और इसे ख़त्म नहीं किया जा सकता है.

अप्रैल की पहली तारीख को उन्होंने बिहार के औरंगाबाद में कहा, "हम विचारों के बारे में बात कर रहे हैं. उनके नेता कहते हैं कि कांग्रेस को मिटा दीजिए... उन्हें गीता पढ़नी चाहिए. वे नहीं पढ़ते. गीता में कहा गया है कि दूसरों के लिए दयालुता के साथ काम करो... बुद्ध को मिटाया नहीं जा सकता है. अशोक और अकबर को भी नहीं. कांग्रेस को भी खत्म नहीं किया जा सकता. हम लड़ेंगे. हम जीतेंगे. हम सरकार बनाएंगे."

सकारात्मक एजेंडा

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अपने आक्रमक भाषणों में से एक में उन्होंने यह कह कर अपनी बात शुरू की, "राजनीति में क्रोध और अहंकार के लिए कोई जगह नहीं है. राजनीति लोगों का दुख दर्द दूर करने का काम है." भाजपा का नाम लिए बगैर उन्होंने कहा, "ये ख़ून की राजनीति करते हैं. वे और कुछ नहीं देखते लेकिन उन्हें सत्ता चाहिए... किसी भी कीमत पर सत्ता चाहिए."

(....अगर उनका वोट होता)

राहुल के मुताबिक़ "वे किसी भी संप्रदाय और जाति के ख़िलाफ़ गड्ढा खोद सकते हैं, एक दूसरे से उन्हें लड़ा सकते हैं, सत्ता हड़पने के लिए अगर उन्हें ज़रूरत महसूस हुई तो वे किसी का ख़ून बहाने से भी नहीं हिचकते हैं. हम ग़रीबों के लिए लड़ते हैं लेकिन भाजपा चुनिंदा लोगों की बात करती है. वे कहते हैं कि किसी को प्रधानमंत्री बना देने भर से हर किसी का भला हो जाएगा."

राहुल के भाषणों की दूसरी श्रेणी में उनका फ़ोकस राजनीति को लेकर उनके अपने नज़रिए और पार्टी के सकारात्मक एजेंडे पर होता है. वे नौजवानों, महिलाओं, ग़रीबों और दबे-कुचलों की बात करते हैं. वे लोगों से कहते हैं कि कांग्रेस उन्हें और ज्यादा अधिकार देने के लिए काम करेगी.

भ्रष्टाचार के आरोप

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राहुल ने ये भी कहा है कि वे उन 70 करोड़ों लोगों को मध्य वर्ग में लाने के लिए काम करेंगे जो हाल के वर्षों में ग़रीबी रेखा से ऊपर उठे हैं. वे कहते हैं, "हम संसद में महिलाओं के लिए 33 फ़ीसदी आरक्षण चाहते हैं लेकिन कौन इसे रोक रहा है. यह एनडीए है. हमने इसे स्थानीय निकायों में लागू किया था, हम इसे आपके लिए करेंगे."

(क्यों है कांग्रेस बैकफुट पर?)

देश के ग्रामीण इलाक़ों में की गई रैलियों में राहुल गाँधी ग़रीबों के अधिकारों पर ज़ोर देते रहे हैं, अपने पूर्वजों की यादों को कुरेदते हैं, उन पूर्वजों की, जो देश के प्रधानमंत्री के तौर पर लंबे समय तक रहे. पूरे जोशो-ख़रोश से भरे नकारात्मक राजनितक माहौल में युवा राहुल गाँधी ऐसी लड़ाई लड़ते हुए लग रहे हैं जिसके उनके हाथ पीछे की ओर से बंधे हुए हैं.

राहुल गाँधी की चुनौतियाँ इस लिहाज से भी बढ़ जाती हैं कि उन्हें बीते दशक के दौरान यूपीए सरकार की कथित गलतियों के लिए न केवल उसका बचाव करना होता है बल्कि पार्टी के लिए सबसे ज्यादा मुश्किल वक्त में अपने विज़न को भी लोगों के सामने रखना है. यूपीए सरकार पर घोटालों और भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं.

चुनावी जंग

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सत्ता विरोधी रुझान का बोझ अपने कंधे पर लिए राहुल आक्रामक नहीं हो सकते, न तो अपनी भाषा को लेकर और न ही अपनी शैली के मामले में. और यही वजह है कि उनके भाषणों में ग़ुस्सा या अपशब्द जैसी बातें नहीं होती.

(सवालों से क्यों मुँह चुरा रहे हैं राहुल-मोदी?)

भगवा खेमे पर उनकी ओर से लगाए गए आरोप और खास तौर पर मोदी की अगुवाई वाली भाजपा पर 'ज़हर की खेती' वाले बयान की तीखी आलोचना हुई थी. अपने भाषणों में तुलनात्मक रूप से सभ्य और ज़िम्मेदार शब्दों का चयन समझदार श्रोताओं को तो अच्छा लग सकता है लेकिन लोगों की भावनाओं को अपील करने के लिहाज से वे नाकाम रहे.

नेहरु गाँधी परिवार की विरासत ने कांग्रेस के इस युवा नेता को अपने राजनीतिक विरोधियों पर खुला कर हल्ला बोलने की छूट नहीं दी जो दूसरे लोग बड़ी आसानी से कर सकते हैं. और जैसा कि फिलहाल जारी चुनावी जंग में कई लोग ऐसा कर भी रहे हैं.

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