घर नहीं है पर वोट डालने का अधिकार है!

दिल्ली में रह रहे लाखों बेघरों को इस साल बड़ी आस थी. चुनाव आयोग ने उन्हें मतदाता पहचान पत्र पाने का मौका जो दिया था.

रैन बसेरों, रेलवे स्टेशन, फ़ुटपाथ इत्यादि पर रहनेवाले इन लोगों ने फॉर्म तो जमा किए पर कुछ एक को ही पलटकर पहचान पत्र मिला.

हनुमान मंदिर के सामने क़रीब 20 साल से रह रहे सुनील उन ख़ुशनसीब लोगों में से एक हैं जिन्हें वोटर आईडी मिला.

पर ज़िन्दगी में पहली बार वोट डालकर सुनील ने जब अपनी उंगली पर लगा स्याही का निशान मुझे दिखाया तो चेहरे पर कोई उत्साह नहीं था.

सुनील बोले, "पता नहीं कुछ बदलेगा या नहीं, सरकार ने आज तक तो हमें याद किया नहीं."

हनुमान मंदिर के बेघरों की क़रीब 180 अर्ज़ियों के जवाब में पांच लोगों को पहचान पत्र मिले हैं, ज़ाहिर है वोटबैंक के तौर पर ये लोग ख़ुद को बहुत मज़बूत नहीं समझते.

पहचान की मार

सुनील कहते हैं कि सबसे बड़ी परेशानी पहचान की है, "मुझे पहचान पत्र मिल गया है तो अब शायद विकलांग पेंशन मिल जाए और रोज़गार ढूंढने में मदद हो."

उनके मुताबिक मतदाता पहचान पत्र की कीमत वोट देने से ज़्यादा एक पहचान पत्र के तौर पर है.

पर सुनील की बहन पूजा इतनी उजली नहीं है. वो अपने परिवार के अलावा हनुमान मंदिर के सामने रह रहे और बेघरों के लिए पहचान पत्र की अर्ज़ियां दाख़िल करने में आगे रही है, पर उसका वोटर आईडी नहीं बना.

अपने बड़े भाई को मतदान केंद्र तक लेकर आई पूजा बस तरसती नज़रों से अंदर जाते लोगों को देखती रहती है.

पूजा से मैं पहली बार मिली थी पिछले साल अक्तूबर में. तब वो दिल्ली के चुनाव के लिए पहचान पत्र बनवाने की कोशिश कर रही थी. पर सफ़लता ना तब मिली, ना अब.

नेताओं से सवाल

पूजा मुझे कहती है कि पहचान पत्र के बिना ज़िन्दगी में बहुत पाबंदियां हैं. वो मिल जाए तो वो नेताओं के घर जाकर उनसे कई सवाल पूछना चाहेगी.

मुस्कुराकर कहती हैं, "वो थक जाएंगे मेरे सवालों से... मैं जानना चाहती हूं कि हमें भूल क्यों जाते हैं, हम फ़ुटपाथवालों, भीख़ मांगनेवालों और बेघरों को."

चुनाव प्रक्रिया और नेताओं से वो भी बहुत मायूस है. पर साथ ही ये भी कहती है कि पहचान पत्र बनवाकर रहेगी.

चलते-चलते कहती है कि पहचान होगी तो पूछ होगी ना.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार