वॉशिंगटन में मोदी की चाय पर चर्चा

अमरीका में भारतीय मूल के नरेंद्र मोदी समर्थक

वॉशिंगटन में अंजू प्रीत ने पिछले दिनों सुबह-सुबह अपना फ़ेसबुक स्टेट्स अपडेट किया. लिखा, "बेहद खूबसूरत सुबह. जब आप मोदीजी के लिए काम करने के लिए इतने सवेरे उठते हैं तो ऐसे ही दृश्य दिखते हैं."

हार्वर्ड में पढ़ी अंजू प्रीत इन दिनों वॉशिंगटन के जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी में कैंसर रिसर्च पर काम करती हैं. घर से ऑफ़िस का रास्ता लगभग एक घंटे का होता है और उस दौरान वो हर दिन भारत फ़ोन लगाती हैं रिश्तेदारों को, दोस्तों को, दोस्तों के दोस्तों को ये कहने के लिए कि वे नरेंद्र मोटी को वोट दें.

कुछ का जवाब होता है, "आप कौन होती हैं हमें बताने वाली कि हम किसे वोट दें."

लेकिन अमरीका से जब फ़ोन आता है तो ज़्यादातर लोग अच्छे से बात करते हैं.

अमरीका में देर शाम जब भारत में सुबह हो रही होती है, टेलीफ़ोन का सिलसिला फिर से शुरू हो जाता है.

अंजू प्रीत का कहना है कि इन दिनों अमरीका में कम से कम दो से तीन हज़ार भारतीय हैं जो रोज़ नरेंद्र मोदी के प्रचार के लिए भारत फ़ोन घुमाते हैं और सप्ताहांतों में तो फ़ोन कॉल्स की तादाद कई गुना बढ़ जाती है.

चाय पर चर्चा

और मोदी की ये फ़ौज सप्ताहांतों में अलग-अलग शहरों में करती है चाय पर चर्चा. वॉशिंगटन में ही अब तक 15 बार 'चाय पर चर्चा' का आयोजन हो चुका है.

एक ऐसी ही चर्चा में मोदी समर्थक रात पर जागरण करते रहे और देशभक्ति के गीत गाते रहे क्योंकि अमरीका के समय से सुबह साढ़े छह बजे नरेंद्र मोदी से इंटरनेट के ज़रिए सीधा सवाल-जवाब होना था.

अंजू प्रीत कहती हैं उनका मकसद कोई राजनीतिक पद हासिल करना नहीं है.

वह कहती हैं, "मैं ये सब एक भारतीय होने के नाते करती हूं क्योंकि यहां हम सबको लगता है कि मोदीजी भारत के लिए बेहतर होंगे."

आम अमरीकी बेपरवाह

दिल्ली में विधानसभा चुनावों से ठीक पहले अरविंद केजरीवाल के लिए भी यहां ख़ासा जोश नज़र आता था. लेकिन इन दिनों वो सुगबुगाहट ख़त्म सी हो गई है.

वैसे आम अमरीकियों के लिए भारत का मतलब है बस मसालेदार खाना, नाचती गाती फ़िल्में या फिर सिलिकॉन वैली के महारथी. इनके लिए नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल भारतीय नामों के अलावा कुछ भी नहीं हैं.

वॉशिंगटन में भारतीय मूल के अमरीकियों पर चल रही प्रदर्शनी देखने आए कुछ अमरीकियों से जब मैंने भारतीय चुनाव के बारे में पूछा तो उनमें से कोई नहीं था जिसे पता हो कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनाव हो रहे हैं.

अमरीकी सरकार की उम्मीदें

लेकिन कांग्रेस में, उद्योगपतियों में, विदेश विभाग में भारतीय चुनाव के बारे में ख़ासी रूचि है.

नया प्रधानमंत्री कौन होगा, वोटरों का रूझान क्या होगा, धर्म और जाति का कितना असर होगा, यहां के थिंक टैंक्स में इन सवालों पर हो रही बहस में भी ख़ासी भीड़ जुटती है.

यहां के जानेमाने थिंक टैंक से जुड़े ऐशले टेलिस कहते हैं कि इस रूचि की वजह यह भी है कि अमरीका भारत को एक लोकतांत्रिक साझेदार की तरह देखता है.

वह कहते हैं, "भारत में कुछ नयापन का ख़्याल अमरीका के लिए भी मौक़ा पैदा करता है. इसलिए रूचि सिर्फ़ इस बात में नहीं है कि चुनाव कामयाब हों, बल्कि इसमें भी है कि परिणाम क्या होंगे."

उनका कहना है कि अमरीका की उम्मीद है कि नया नेतृत्व ऐसा हो जो फ़ौरन फ़ैसले कर सके, दक्षिण एशिया को नेतृत्व दे सके और चीन के बराबर खड़ा हो सके.

लेकिन सबसे अहम हैं आर्थिक सुधार और भारत में नए नेतृत्व से अमरीका काफ़ी उम्मीदें लगाए बैठा है.

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Image caption अगर भारत में मोदी सरकार बनती है तो अमरीका उन्हें गले लगाने के लिए तैयार नज़र आ रहा है.

बदला रुख़

पिछले दिनों अमरीकी कांग्रेस में भी भारत के मानवाधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता पर एक सुनवाई हुई और इन मामलों से जुड़े गुटों ने मोदी पर जमकर निशाना साधा.

उनका कहना था कि पिछले महीनों में भारत में अल्पसंख्यकों पर हमलों में तेज़ी आई है और मोदी के नेतृत्व में हालात और बदतर हो सकते हैं.

अख़बारों में भी मोदी के साथ-साथ गुजरात दंगों का ज़िक्र हमेशा होता है.

लेकिन अगर मोदी की सरकार बनती है तो अब यहां की हुकूमत उन्हें गले लगाने के लिए तैयार नज़र आ रही है.

वॉशिंगटन पोस्ट अख़बार ने उन पर एक संपादकीय भी लिखा है जिसका निचोड़ है, "ओबामा प्रशासन ने मोदी पर अपना रुख़ शायद यही सोच कर बदला है कि वह मज़हबी लड़ाइयों को छोड़कर अर्थव्यवस्था को चमकाने के वादों पर अमल करेंगे."

भारत में मतदान शुरू हुए अभी हफ़्ता भी नहीं हुआ है लेकिन अमरीका में यही लग रहा है जैसे परिणाम आ गए हैं.

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