शूटर या प्रोफेसर: किसका लगेगा तीर निशाने पर?

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ठीक एक दशक पहले उनकी नज़र ओलम्पिक पदक पर थी और निशाना सही लगा भी. रजत पदक लेकर पहली बार भारत का परचम ओलम्पिक खेलों में लहराया. अब मैदान भी अलग है और निशाना भी. मुकाबला राजनीतिक है, तीर शब्दों के हैं और निशाना है "मोदी सरकार को लाना".

जयपुर ग्रामीण सीट से भाजपा के उम्मीदवार कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़ राजनीति में भले ही नए हैं लेकिन उन्होंने शब्दों के तीर चलाना बहुत ही जल्दी सीख लिया है.

उनका मुकाबला कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डॉ. सीपी जोशी से है जो राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी हैं.

जोशी मनोविज्ञान के प्रोफेसर रह चुके हैं. उन्होंने अपने चार दशक लम्बे राजनीतिक जीवन में कई महत्वपूर्ण दायित्व निभाए हैं और उनके पास संगठन और सरकार दोनों में काम करने का अनुभव है.

राज्यवर्धन सिंह को राजनीति के खेल और मैदान दोनों का ही कोई अनुभव नहीं है.

विश्वसनीयता

महज छह महीने पहले भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर राजनीति में कदम रखने वाले पद्मश्री, अर्जुन पुरस्कार और कॉमनवेल्थ खेलों में स्वर्ण सहित करीब 25 अंतरराष्ट्रीय पदकों से सम्मानित इस खिलाड़ी ने एक साल पहले ही भारतीय फ़ौज से स्वेच्छा रिटायरमेंट ली थी.

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अब वह स्वयं को "राजनीतिक सैनिक" के रूप में देखते हैं. अपने लोकसभा क्षेत्र में रोड शो करते हुए या चुनावी सभाओं में जब वह जनता से वोट की अपील करते हैं तो युवा मतदाताओं पर उनकी विशेष निगाह रहती है.

एक साधारण परिवार में जन्म लेकर भी एथेंस ओलम्पिक में रजत पद हासिल करने पर उन्हें गर्व है और उनकी हसरत है कि वह भारत के हर युवा को इतना योग्य बना सकें कि वह ओलम्पिक में देश के लिए स्वर्ण जीत कर ला सके.

जयपुर ग्रामीण सीट पर इस बार त्रिकोणीय मुकाबला है. वैसे सीधी टक्कर भाजपा के शूटर और कांग्रेस के प्रोफेसर के बीच ही है.

इस सीट पर उतरे तीसरे खिलाड़ी वर्तमान में आमेर विधानसभा से विधायक हैं और पूर्व सांसद और पुलिस महानिदेशक जाट नेता ज्ञान प्रकाश पिलानिया के पुत्र हैं. वह नेशनल पीपल्स पार्टी से चुनाव लड़ रहे हैं.

इस सीट पर 'कौन बाहरी और कौन घर का', जुमला भी खूब उछल रहा है. सीपी जोशी ने पिछला चुनाव भीलवाड़ा संसदीय क्षेत्र से लड़ा था और वहां की जनता से पानी की समस्या दूर करने का वादा किया था.

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जोशी ने बीबीसी से कहा कि वह 2000 करोड़ की योजना मंज़ूर कराने में कामयाब रहे थे लेकिन लागू करने में हुई देरी के चलते वह अपना वादा पूरी तरह नहीं निभा सके. चम्बल से भीलवाड़ा तक पाइपलाइन गुजरने वाले क्षेत्र के लिए वन विभाग की स्वीकृति चाहिए और यह प्रक्रिया इतनी जटिल है कि असली पानी अभी जनता से दूर है.

उन्होंने कहा था कि यदि वह इस समस्या का निदान नहीं कर पाए तो अगला चुनाव भीलवाड़ा से नहीं लड़ेंगे. पुरजोर शब्दों में वह कहते हैं, "मेरे लिए मेरी विश्वसनीयता अधिक महत्वपूर्ण है."

'कौन बाहरी, कौन घर का'

वह कहते हैं कि वह चुनाव विश्लेषक नहीं हैं लेकिन उन्हें विश्वास है कि उनकी पार्टी का प्रदर्शन हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव से निश्चय ही बेहतर होगा. उनके हिसाब से कोई "मोदी लहर नाम की चीज़ नहीं है. यह सिर्फ टेलीविजन पर है. यदि वाकई में लहर होती तो भाजपा गुजरात सहित अन्य स्थानों पर 'सहयोगी' क्यों ढूँढ़ती?"

भाजपा प्रत्याशी राज्यवर्धन सिंह अपनी हर सभा में खुद को स्थानीय सिद्ध करने की गरज से कहते हैं कि उनकी चार पुश्तें फ़ौज में रही हैं और वह अपना वोट जयपुर ग्रामीण क्षेत्र में डाल सकते हैं. पर क्या कांग्रेस के उम्मीदवार जोशी ऐसा कर सकते हैं?

वह पूछते हैं, "अब आप ही बताइए कौन बाहरी है और कौन घर का."

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सेना के कड़े अनुशासन वाले माहौल से बिलकुल उलट है राजनीति का माहौल?

इस सवाल के जवाब में राज्यवर्धन कहते हैं, "हाँ ,यह सही है और फ़ौज के कायदे कानून भी बड़े सख्त हैं. पर इतनी बड़ी सभाएं करवाना, इतने लोगों को इकठ्ठा करना, या उनका मन जीतना. उसके लिए एक बड़ा संगठन चाहिए. बिना किसी कायदे कानून के ऐसा होना भी अपने आप में बहुत बड़ा अनुशासन है."

उन्होंने राजनीति में आने का सपना नहीं देखा था पर उनकी यह इच्छा ज़रूर थी कि किसी ऐसे मंच पर जाएं जहां युवाओं के लिए कुछ कर सकें. उनका मानना है कि खेल और सेना दोनों का ही अनुभव उन्हें राजनीति में मदद करेगा. बाधाओं को पराजित कर मंजिल तक पहुंचने का ज़ज्बा उनके साथ है.

वह कहते हैं 'सच्चे दिल से, पारदर्शिता के साथ, सही इरादे और लगन से' वह अपना मकसद पा सकते हैं. ज़िन्दगी के इस पड़ाव पर अर्जुन की तरह उनकी आँख बस नरेन्द्र मोदी की विजय सुनिश्चित करने पर है.

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