जहां 'बापू' के कहने पर लौट आए थे मुसलमान...

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यही वह जगह है जहाँ 1947 के दिसंबर में विभाजन के बाद महात्मा गांधी आए थे और उन्होंने मेवात के मुसलमानों का आह्वान किया था कि वे भारत छोड़कर न जाएँ. इसके बाद मुसलमानों ने यहीं रहने का मन बना लिया और जो जा चुके थे वे भी सरहद से ही लौट आए.

आज हरियाणा के मेवात का घासेड़ा गाँव अपने आप में एक मिसाल बनकर खड़ा है.

गाँव के सबसे बुज़ुर्ग सरदार खान बताते हैं कि वो उस रोज़, उस रैली में, मौजूद थे जब महात्मा गांधी मुसलमानों से मुखातिब हुए थे, "मैं तब दस साल का था और मुझे उनकी एक-एक बात याद है. उनके आह्वान के बाद हम सब यहीं रुक गए."

वे कहते हैं, "वैसे भी मेवात के मुसलमान विभाजन के ख़िलाफ़ थे. मगर दंगे हो रहे थे, माहौल ख़राब था. चारों तरफ डर और दहशत का माहौल था. मगर हमारे बाप-दादाओं ने यहीं रहने का मन बना लिया. आज हमें ख़ुशी है कि हमने ऐसा किया."

घासेड़ा गांव में 4,500 घर हैं और काफ़ी बड़ी आबादी है. मगर घासेड़ा में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच आपसी सौहार्द बिगड़ने की कभी कोई घटना नहीं हुई. शायद पूरे भारत में घासेड़ा अपने आप में एक मिसाल की तरह मौजूद है.

यहाँ हिन्दू भी रहते हैं और मुसलमान भी और दोनों ही एक-दूसरे के सुख दुःख के साथी हैं.

नेताओं ने की उपेक्षा

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घासेड़ा के रहने वाले राम प्रसाद बताते हैं कि इतने सालों में इस इलाक़े में एक कमी रह गई और वह है शिक्षा के मामले में लोगों का पिछड़ापन. इतने सालों बाद भी शिक्षा के प्रति लोगों का रुझान उतना नहीं हो पाया, जितना होना चाहिए था.

मगर गांव के सरपंच अशरफ इसे लोगों की ही ग़लती मानते हैं. वह कहते हैं कि लोग इसके लिए ख़ुद ही ज़िम्मेदार हैं.

आज घासेड़ा एक आदर्श ग्राम है और इसे गांधीग्राम घासेड़ा के नाम से जाना जाता है. राज्य सरकार का दावा है कि उसने इस इलाक़े के विकास के लिए काफ़ी पैसे ख़र्च किए हैं.

मगर गाँव की बदबूदार और धूल भरी सड़कें कुछ और ही कहानी बयान करती हैं.

गाँव के लोगों का कहना है कि नेताओं ने इस इलाक़े में कभी अपनी दिलचस्पी नहीं दिखाई. राम प्रसाद कहते हैं, "नेताओं ने घासेड़ा की हमेशा उपेक्षा ही की है. कुछ एक नेता तो ऐसे भी हैं जिन्होंने गाँव के लोगों के साथ हाथ मिलाने के बाद अपने हाथ साबुन से धोए ताकि उनके हाथों में कीटाणु न लग जाएँ".

आधुनिक बाज़ार, मॉल और चकाचौंध वाले शहर गुड़गांव से महज 35 किलोमीटर की दूरी पर होने के बावजूद आज भी इस इलाक़े में बिजली नियमित नहीं हो पाई है.

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गाँव की चौपाल में बैठे बुज़ुर्गों का कहना है कि बिजली और पानी की कमी की वजह इलाक़े के किसानों को बरसात पर ही आश्रित रहना पड़ता है. पीने का पानी तो टैंकरों से आ जाता है मगर खेती के लिए अब भी पर्याप्त पानी का इंतज़ाम नहीं हो पाया है.

मगर सरपंच अशरफ ऐसा नहीं मानते. वह कहते हैं कि सरकार ने घासेड़ा पर काफ़ी ध्यान दिया है जिसकी वजह से यहाँ मेडिकल कॉलेज और अस्पताल की स्थापना संभव हो पाई है.

चौपाल में बैठे एक बुज़ुर्ग कहते हैं घासेड़ा में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच के तालुक़्क़ात हमेशा ही अच्छे रहे हैं और यहां की ग़रीबी, अशिक्षा और बाक़ी दूसरी दिक़्क़तों से दोनों बराबर ही जूझ रहे हैं.

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