गुड़गांवः 'अब हम कहीं के नहीं हैं'

गुड़गांव बसई गांव

दिल्ली के बाहरी इलाक़े में स्थित अपने पारिवारिक खेत में दलबीर सिंह गेंदे की अपनी शानदार फ़सल के बीच ख़ुशी से गुज़रते हैं.

आम और बबूल के पेड़ों की क़तार वाले चार एकड़ के फ़ॉर्म से करीब आधा दर्जन मज़दूर फूल चुन रहे हैं. एक एकड़ में गेंदे के फूलों की खेती से करीब ढेड़ लाख रुपये मिल सकते हैं. वह गेहूं, जौ और ऑर्गेनिक सब्ज़ियां भी उगाते हैं.

छह साल पहले इंफ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी का करियर छोड़ने वाले दलबीर भारत आने से पहले सिंगापुर और सैन फ्रांसिस्को में काम कर रहे थे. वह कहते हैं, "मैं अपनी जड़ों की ओर लौट आया हूं और यहीं जीविका कमाने की कोशिश कर रहा हूं."

42 वर्षीय दलबीर गुड़गांव के बसई गांव में एक किसान परिवार में पैदा हुए थे. अब यह शहर गगनचुंबी इमारतों, चमकदार ऑफ़िसों और महंगे घरों के लिए पहचाना जाता है, जहां समृद्ध प्रोफ़ेशनल रहते हैं.

यह बात ज़्यादा लोग नहीं जानते कि गुड़गांव का तीन-चौथाई इलाका और 228 गांवों में रहने वाले इसके 18 लाख वोटरों में से ज़्यादातर मुख्यतः ग्रामीण हैं.

पिछले कुछ सालों में गुड़गांव शहर इन गावों में भी पसर गया है और लोगों की ज़िंदगी को तेज़ी से बदल दिया है- क्योंकि कई लोग बिल्डरों को अपनी ज़मीन बेचकर रईस हो गए हैं. बसई भी उन गांवो में से एक है जो उस बदलाव के सिरे पर खड़ा है जो शहरीकरण अपने साथ लाता है.

समृद्धि और ख़ुशी

अपने बचपन में दलबीर इसी गांव में अपने दोस्तों के साथ कुश्ती करते थे, गांव के तालाब में तैरते थे, भैंसों का दूध निकालते थे और एक स्थानीय स्कूल में पढ़ने जाते थे. पढ़ाई में वह अच्छे निकले और उन्हें प्राइमरी स्कूल में पढ़ाने की नौकरी भी मिल रही थी लेकिन एक रिश्तेदार ने उन्हें और पढ़ने के लिए प्रेरित किया.

इसलिए वह भारत के सबसे अच्छे इंजीनियरिंग स्कूलों में से एक में गए, कंप्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग में डिग्री ली और दस साल तक इंफ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी प्रोफ़ेशनल के रूप में काम किया.

2008 में जब तक गुड़गांव वापस लौटे तक बदलाव बसई तक पहुंच चुका था. शहर के विस्तार के साथ बिल्डरों ने बड़े पैमाने पर ज़मीन ख़रीद ली थी और किसान रईस बन गए थे. आज ज़मीन की कीमत 70 लाख से चार करोड़ प्रति एकड़ के बीच है.

दलबीर अपने बीवी बच्चों के साथ शहर में एक सुसज्जित मकान में रहने लगे लेकिन बसई में अपनी मां और भाई के परिवार के साथ उनके संबंध बने रहे. तीन साल पहले उन्होंने गांव में अपने पुराने घर को तोड़कर उसकी जगह दो मंज़िला पांच बेडरूम का घर आधुनिक घर बनाया.

वह कहते हैं, "बसई गांव कई तरह से, हिचकिचाते हुए अपना एक पैर परंपरा में रखता है और दूसरा आधुनिकता में."

ब्यूटी पार्लर, जिम, कोचिंग स्कूल और जैसे शेखी बघारते "सुसज्जित, एयर-कंडीशंड क्लासरूम" उग आए हैं. कच्चे रास्तों की जगह कंक्रीट के सड़कें आ गई हैं. परंपरागत घरों की जगह बने नए कंक्रीट के घरों का रास्ता चमचमाती कारें भैंसो के साथ बांटते हुए चलती हैं.

इमेज कॉपीरइट AFP

लंबी झुलसाने वाली गर्मियों में पगड़ी लगाए गांव के बुजुर्ग छांव में बैठकर हुक्का गुड़गुड़ाते हैं और धुआं उड़ाते हैं. और जब शाम ढलती है तो.... दलबीर कहते हैं, "सब पीते हैं."

वह पुराने सुरम्य ग्रामीण दिनों को याद करते हैं जब लोग खेतों में काम करने के लिए सुबह-सुबह उठ जाया करते थे, इधर-उधर जाने के लिए साइकिल का इस्तेमाल करते थे और वक्त गुज़ारने के लिए पेड़ों की छांव में बैठा करते थे.

वह कहते हैं लोगों ने अब खुद खेती करना बंद कर दिया है. अब लोग अपने खेतों में काम करने लिए प्रवासी मज़दूरों को रखते हैं और खुद कारों में घूमते हैं. बहुत से पेड़ काट दिए गए हैं.

उनके भतीजे लोकेश का मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद आगे पढ़ने के लिए विदेश जाने का इरादा है. उसने अपनी पारिवारिक जगह में एक टेनिस कोर्ट बनाया है जहां वह अपने भाइयों के साथ खेलता है.

दलबीर कहते हैं, "समृद्धि ने लोगों को ख़ुशी दी है लेकिन परिवारिक संबंध कमज़ोर हो रहे हैं और युवा लोग इसी प्रवाह में जी रहे हैं."

अंदरूनी हलचल

इमेज कॉपीरइट AP

चर्निंग दि अर्थ किताब के लेखक और भारत के विकास की नीति के कटु आलोचक असीम श्रीवास्तव और आशीष कोठारी गुड़गांव के एक एक किसान की बीवी से मुलाकात को याद करते हैं जो बदलालों पर कमाल की स्पष्टता से बात करती हैं.

वह कहती हैं, "जब पैसा इतनी आसानी से मिल रहा है तो कोई भी खेतों में काम क्यों करना चाहेगा? लड़के गाड़ियां लेकर गुड़गांव (शहर) जाते हैं और ज़रा में देर में फूंक आते हैं."

"कोई भी युवा खेती में रुचि नहीं लेता. इसमें बहुत कम पैसा है. खेती करके ज़िंदगी गुज़ारना मुश्किल है. सरकार ने इसके लिए किसी भी किस्म की मदद देना बंद कर दिया है जिससे यह और मुश्किल हो गई है. लेकिन पैसा आखिर कब तक चलेगा. लड़के अभी जवान हैं. उन्हें नहीं पता कि पैसे का सदुपयोग कैसे करना है."

वह किसान महिला "अपने संस्कृति और जड़ों के विनाश" की बात करती हैं, शराबखोरी और घरेलू हिंसा बढ़ने की चिंता करती हैं और डरती हैं कि "आदमी नियंत्रण से बाहर हो गए हैं."

वह कहती हैं, "हम शहर के नही हैं. और हमें अपना गांव भी अजीब लगता है. अब हम कहीं के नहीं हैं."

लेखकों का कहना है कि ग्रामीण हरियाणा "नैतिक विकार" की स्थिति में है. राजनीतिक मनोवैज्ञानिक आशीष नंदी के शब्दों में कहें तो यह "सदमाग्रस्त समुदायों ने अपनी भाग्य से नियंत्रण खो दिया है" और यह निराशा में डूब रहे हैं.

राजनेता और नीति निर्माता इन मामलों में मददगार साबित नहीं हो रहे.

एक के बाद एक सरकारों पर खेती की ज़मीन को बहुमंज़िला इमारतों के लिए बिल्डरों को बेचने में षड्यंत्र के आरोप लगे हैं. जलस्तर गिरने से पानी का संकट बढ़ता जा रहा है स्कूलों के पास और एक्सप्रेसवे पर शराब की दुकानों के ठेके खुलकर बांटे गए हैं.

दलबीर कहते हैं, "दिक़्क़त यह है कि राजनेता बेईमान हैं और प्लानिंग में उनकी कोई रुचि नहीं है. गुड़गांव एक चुनौतीपूर्ण निर्वाचन क्षेत्र और आपको पर्यावरणीय सरोकारों के मद्देनज़र आधारभूत ढांचे की सही से योजना बनाने की ज़रूरत है. ज़्यादातर राजनेता अल्पज्ञ हैं."

वह कहते हैं कि गुड़गांव की बाहरी समृद्धि अंदर की हलचल को छुपा लेती है.

लेकिन वह दोनों दुनियाओं को बनाए रखना चाहते हैं, पुराने और नए, गांव और शहर को.

उनके अनुसार, "मैंने जो भी किया हो, मेरे अंदर अब भी एक किसान है. मैं अपने हाथ गंदे करना पसंद करता हूं, इसलिए मैं वापस खेतों में लौट आया हूं."

लेकिन भारत में हर चीज़ की तरह खेती के भविष्य का भी अनुमान नहीं लगाया जा सकता.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार