सोनिया के भावुक वीडियो संदेश के मायने

  • 15 अप्रैल 2014
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सोमवार की रात देश के कई सारे महत्वपूर्ण चैनलों से प्रसारित कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की वीडियो अपील को सामान्य चुनाव प्रचार से अलग करके देखा जाना चाहिए.

चुनाव के चार चरण पूरे होने और 110 सीटों यानी लगभग 20 फीसदी का फैसला ईवीएम में बंद हो जाने के बाद यह अपील सामने खड़ी पराजय को टालने की कोशिश में आखि़री आवाज़ जैसी लगती है.

यह अपील केवल इस बात पर केंद्रित नहीं थी कि कांग्रेस को जिताओ, बल्कि इस बात पर थी कि भारतीय जनता पार्टी या दूसरे शब्दों में नरेंद्र मोदी को आने से रोको. हालांकि उन्होंने मोदी या भाजपा का नाम नहीं लिया, पर समझा जा सकता है कि निशाने पर कौन था.

उन्होंने कहा, उनके पास नफ़रत, लालच और निरंकुश सत्ता की भूख का अंधेरा है. उनकी विभाजनकारी और निरंकुश विचारधारा हमारी भारतीयता और हिंदुस्तानियत को पतन की ओर ले जाएगी. 'हम इस चुनाव में एक ऐसे भारत के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जिसमें सत्ता कुछ चंद लोगों की नहीं हो बल्कि जिस पर सबका बराबर अधिकार हो.'

आसन्न खतरे का संकेत

हिंदी और अंग्रेजी में उनका दो मिनट 58 सेकंड का यह वीडियो संदेश संभवतः विज्ञापन के रूप में जारी किया गया था. क्या इस अपील की योजना पहले से तैयार थी या अंतिम क्षणों में तैयार की गई?

इसे पीछे हटते सेनापति की ओर से वाणों की आख़िरी बौछार माना जाए या शत्रु-पक्ष के ख़िलाफ़ माहौल को बदलने की ताक़तवर कोशिश? बहरहाल अपनी उपलब्धियों से ज़्यादा ‘आसन्न ख़तरे’ का संकेत इस संदेश में छिपा दिखाई देता है.

भारतीय जनता पार्टी की प्रचार-मशीनरी शुरू से तीन बातों पर जोर दे रही है. एक यूपीए के शासन की विसंगतियों, भ्रष्टाचार की कथाओं और ‘कमज़ोर नेतृत्व’ को निशाना बनाना. दूसरे मोदी और गुजरात के नाम पर विकास को चुनाव का मुद्दा बनाना. हिन्दू राष्ट्रवाद को पार्टी ने सबसे निचली पायदान पर रखा है.

कांग्रेस की विसंगतियाँ

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Image caption सोनिया गांधी की रैलियों में भाजपा लगातार निशाने पर रही है.

कांग्रेस की रणनीति कभी सुसंगत दिखाई नहीं पड़ी. पिछले साल जनवरी में कंडीशनल कैश ट्रांसफर का कार्यक्रम शुरू करते समय राहुल गांधी ने अपने सामाजिक विकास कार्यक्रम को 'गेम चेंजर' माना था.

पिछले दिसम्बर में आम आदमी पार्टी के उदय के बाद उन्होंने भ्रष्टाचार-विरोधी कानूनों और जनता से जुड़ाव को महत्वपूर्ण माना और प्रयोग के तौर पर अपनी पार्टी के भीतर कुछ प्रत्याशियों का चयन प्राइमरीज़ के आधार पर किया भी. पर यह सब किसी व्यापक सोच के रूप में सामने नहीं आया.

भाजपा और ख़ासतौर पर नरेंद्र मोदी की ‘साम्प्रदायिक छवि’ के आधार पर पार्टी ने मुस्लिम वोट को अपने पक्ष में लाने की कोशिश भी की. पार्टी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया कि इस कोशिश से सामाजिक-ध्रुवीकरण विपरीत दिशा में भी बढ़ेगा. और अब देश की सामाजिक बहुलता के बाबत सोनिया जी की अपील कितनी कारगर होगी, कहना मुश्किल है.

खुले आज़ाद समाज की परिकल्पना

सोनिया गांधी ने कहा, "हम इस चुनाव में एक ऐसे भारत के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जिसमें सत्ता कुछ चंद लोगों की नहीं हो बल्कि जिस पर सबका बराबर अधिकार हो. हमारा समाज एक दोराहे पर खड़ा है. कांग्रेस की विचारधारा एक स्वस्थ, खुले हुए आजाद समाज की कल्पना करती है जो नए जमाने की नई हवा में सांस ले."

यकीनन यह एक उदार और बहुल सामाजिक आधार वाले भारत की परिकल्पना है, पर क्या सामान्य वोटर सोनिया जी की बात पर भरोसा करता है? चुनाव के मौके पर संदेश से ज़्यादा संदेश देने वाले की साख महत्वपूर्ण है.

सही या ग़लत कांग्रेस की पहचान घपलों-घोटालों के साथ रूढ़ हो गई है. प्रधानमंत्री के पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारू और पूर्व कोयला सचिव पीसी परख की दो किताबों ने आग में घी का काम किया.

कांग्रेस पार्टी ने अपने तईं माहौल सुधारने की भरपूर कोशिश की है, पर पिछले तीन साल से लगातार बनती जा रही समझ इतनी आसानी से बदली नहीं जा सकेगी. प्रश्न यह है कि कांग्रेस को लेकर यह समझ पैदा क्यों हुई?

सवाल विश्वसनीयता का है

मान लेते हैं कि इन किताबों का प्रकाशन इस मौके पर सोच-समझकर किया गया है. पर हमला करने वाला पक्ष कांग्रेस की सुविधा देखकर तो काम नहीं करेगा. सवाल उसकी विश्वसनीयता का भी है. वोटर उसकी बात से आश्वस्त है या नहीं इसका पता 16 मई को लगेगा.

नौ चरणों में होने वाले लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ा 122 सीटों का पाँचवाँ दौर 17 अप्रेल को है. शायद वे उसके पहले अपनी बात कहना चाहती हैं.

लेकिन यह बात चेतावनी के रूप में कही गई है. पिछले हफ़्ते देश-विदेश के कई अख़बारों में सम्पादकीय लेखों और लेखकों-कलाकारों के पत्रों के रूप में भी यह चेतावनी दी गई है.

अंतिम क्षणों में माहौल बदलने की कोशिश

शायद पार्टी को लगता है कि अंतिम क्षणों में भी माहौल बदला जा सकता है. हाल में अमेठी में राहुल गांधी ने कहा था कि चुनावी सर्वे ग़लत साबित होंगे.

एक टीवी चैनल को दिए गए इंटरव्यू में उन्होंने कहा, "ओवरऑल काफी ठीक चल रहा है और रिजल्‍ट अच्‍छा आना चाहिए...ओपिनियन पोल 2004 में कह रहे थे कि कांग्रेस पार्टी हारेगी, इंडिया शाइनिंग का मार्केटिंग कैंपेन था. 2009 में भी ओपिनियन पोल में यही कहा गया और रिजल्‍ट दूसरा ही निकला. बीजेपी की मार्केटिंग अच्‍छी है, पर अंत में रिजल्‍ट देखने चाहिए."

इस बात के विपरीत ख़बर है कि कांग्रेस पार्टी के आंतरिक सर्वेक्षण में भी ज़्यादा से ज़्यादा 120 से 140 तक सीटें हासिल होने की उम्मीद जताई गई है.

पार्टी को केवल चार राज्यों में कुछ बेहतर परिणाम मिलने की आशा है. ये राज्य हैं असम, कर्नाटक, केरल और पंजाब. पिछले दिसम्बर में चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में पार्टी को जबर्दस्त पराजय का सामना करना पड़ा था.

मध्य वर्ग से अपील

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देश के सबसे ग़रीब और अशिक्षित वर्ग तक राजनीति की पहुँच आज भी बिचौलियों के मार्फ़त है.

पर सोनिया गांधी के वीडियो संदेश, राहुल गांधी के टीवी इंटरव्यू और नरेंद्र मोदी की मीडिया अदालत शहरी मध्य वर्ग को संबोधित हैं. इस वर्ग की भूमिका भारतीय चुनाव में बढ़ती जा रही है. पिछले साल के अंत में हुए चार विधानसभा चुनावों ने उसकी इस भूमिका को रेखांकित किया था.

यह विचारवान वर्ग है. यही वर्ग साम्प्रदायिकता और जातिवाद के खिलाफ खड़ा होगा. उसे आश्वस्त करने के लिए राजनीतिक दलों की शब्दावली दुरुस्त होनी चाहिए. खासतौर से कुछ शब्दों को हमेशा के लिए इस्तेमाल से बाहर करना होगा.

तीन महीने पहले देश की राजनीति का जो माहौल था, वह चुनाव के एक हफ्ते पहले बदल गया. इसका एक कारण यह भी है कि पार्टियों की परम्परागत समझ कुछ और है. सोनिया गांधी के इस संदेश ने औपचारिक रूप से जिन मूल्यों को रेखांकित किया, उनसे वोटर सहमत है या नहीं, यह बात वही बताएगा. यह बताने का उसके पास एक ही तरीका है - वोट.

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