विवेक एक्सप्रेस: महिलाएँ, जो लाना चाहती हैं बदलाव

विवेक एक्सप्रेस में महिला यात्री

भारत की सबसे लंबी रेल यात्रा पर उन महिलाओं से भी मिलना हुआ जो अपने दम पर समाज में बदलाव लाने की कोशिश कर रही हैं और उनसे भी जो आर्थिक, सामाजिक हालात की वजह से अपने भविष्य से समझौते कर रही हैं.

सिस्टर रोज़ मेघालय के ख़ासी हिल इलाक़े में आदिवासी समुदाय को रबर की खेती सिखाकर चर्चा में आई हैं.

वो 36 साल पहले केरल छोड़कर मेघालय चली गई थीं. संयोग से वो मेरे ही कंपार्टमेंट में थीं. मैंने उनसे पूछा कि क्या वाक़ई में पूर्वोत्तर की महिलाएं दक्षिण भारत और भारत के बाक़ी हिस्सों की महिलाओं से अलग हैं?

उन्होंने कहा, "पूर्वोत्तर भारत की महिलाएं निडर होती हैं. हालांकि वहां का सामाजिक ढांचा थोड़ा अलग है. परिवार भी अलग हैं. ख़ासतौर पर मेघालय में महिलाएं अपनी मर्ज़ी से शादी करती हैं लेकिन अब परिवार भी बिखरने लगे हैं."

आर्थिक मजबूरी

उन्होंने बताया, "मेरे पास एक लड़की आई जिसकी मां ने भी दूसरी शादी कर ली थी और पिता ने भी. वो नन बनना चाहती थी. मैंने उससे कहा कि इसमें तुम्हारी ग़लती नहीं है. तुम्हें नन बनने की ज़रूरत नहीं है.''

हालांकि पूर्वोत्तरी भारत में ऐसा कम ही होता है कि महिलाओं को किसी तरह का भेदभाव झेलना पड़े.

16 साल की गीता असम के फरकटिंग से तिरुपुर जा रही थीं. मैंने उनसे पूछा कि क्या उन्हें लड़की होने की वजह से किसी तरह का भेदभाव झेलना पड़ता है.

गीता ने इससे साफ़ इनकार किया, लेकिन गीता की हालत से पता चलता है कि असम और दूसरे राज्यों में महिलाओं को आर्थिक मजबूरियों की वजह से अक्सर संघर्ष करना पड़ता है.

ख़ुद गीता को दसवीं के बाद पढ़ाई छोड़ देनी पड़ी, अब वो तिरुपुर की एक फ़ैक्ट्री में दर्जी का काम कर रही हैं.

तो दक्षिण भारत में महिलाओं की हालत क्या पूर्वोत्तर भारत की महिलाओं जैसी ही है?

दक्षिण के हालात

केरल की रहने वालीं और अभी अरुणाचल प्रदेश में तेज़ू के कलेक्ट्रेट में क्लर्क प्रसन्ना कहती हैं, ''दक्षिण में महिलाएं ज़्यादा पढ़ी लिखी हैं. हालांकि ये ज़रूर है कि वो शादी माता-पिता की सहमति से ही करती हैं. "

उन्होंने बताया, "एक पहलू ये भी है कि पूर्वोत्तर भारत में महिलाएं आज़ादी का ग़लत इस्तेमाल करती हैं. कई बार तो बच्चे पैदा करने के बाद उन्हें छोड़कर चली जाती हैं.''

ये अलग बात है कि दक्षिण भारत में सभी महिलाएं बेहद पढ़ी-लिखी नहीं हैं. कहीं-कहीं तो वो पूर्वोत्तर भारत की महिलाओं के समान धरातल पर ही दिखती हैं.

विवेक एक्सप्रेस के जनरल क्लास के डिब्बे में मेरे सामने की सीट पर बैठी एक मुस्लिम महिला नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बताया, "मैंने सातवीं तक पढ़ाई की थी. पति के पास चावल की मिल थी, जायदाद थी. लेकिन फिर मेरी बेटी के जेठ ने सब कुछ हड़प लिया. पति को दिल का दौरा पड़ा और वो चल बसे. दिन बहुत मुश्किल में बीते. अब बेटे नौकरी कर रहे हैं और उन्होंने सब संभाल लिया है.''

ज़ाहिर है दक्षिण भारत और पूर्वोत्तरी भारत की महिलाओं की पढ़ाई-लिखाई में मामूली फ़र्क हो सकता है, लेकिन ये कहना शायद ग़लत नहीं होगा कि सामाजिक और आर्थिक आधार पर दोनों की हालत बहुत जुदा नहीं है.

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