'मेरे गाँव तो नहीं पहुँचा गुजरात का विकास'

गुजरात विद्यापीठ

इस चुनाव में गुजरात के विकास की चर्चा काफ़ी सुनाई दे रही है. कितना उल्लेखनीय है ये विकास? इस पर गुजरात विद्यापीठ के छात्र-छात्राओं में बहुमत की राय आम धारणा से उलट मिली. पर क्यों है उनकी ये राय?

गुजरात विद्यापीठ की छात्रा कृपा के पापा राज्य में पुलिस विभाग में हैं. 1983 से नौकरी में हैं और 30 साल से ज़्यादा की नौकरी में सिर्फ़ साइकिल ले पाए हैं. कृपा कहती हैं, ''पुलिस में नई भर्ती वालों को 2400 रुपए मिलते हैं, उनका गुज़ारा कैसे होगा? भला ये कैसा विकास है?''

वहीं एक अन्य छात्र बालकृष्ण बोले कि उनके गाँव तक तो नहीं पहुँचा गुजरात का विकास, ''विकास हुआ है. फ़्लाईओवर बने हैं मगर हमारे गाँव में तो आज भी पानी की दिक़्क़त है.''

देखिए: क्या बोले गुजरात के छात्र

क्या गुजरात के विकास का मॉडल पूरे भारत के लिए अपनाया जा सकता है? इसी सवाल के साथ बीबीसी कैंपस हैंगआउट कार्यक्रम था अहमदाबाद स्थित गुजरात विद्यापीठ के परिसर में.

छात्र-छात्राएँ इस कार्यक्रम में बोले और काफ़ी बेबाक़ी से बोले. उनकी राय मिली-जुली थी.

विकास पर सवाल उठाने वाले लगातार औद्योगिक और ग्रामीण विकास का अंतर दिखाते रहे. वहीं इस मॉडल का समर्थन करने वालों की राय थी कि अगर गुजरात में विकास नहीं हुआ है तो आख़िर नरेंद्र मोदी लगातार तीन बार चुनकर कैसे आ गए?

विद्यापीठ के सामाजिक कार्य विभाग के छात्र हर साल कुछ समय ग्रामीण क्षेत्रों में गुज़ारते हैं. वे उनके मसले समझने की कोशिश करते हैं. जब वे बोलने उठे तो उनके अनुभव बोले.

विकास पर सवाल

भरत मकवाना ने कहा, ''विकास तीन तरह का होता है. आर्थिक, सामाजिक और मानवीय. विकास तीनों क्षेत्रों का होना चाहिए. बड़ी-बड़ी इमारतें बनी हैं मगर सामाजिक या लोगों का विकास नहीं हुआ है.''

भरत ने शिक्षा का मसला उठाया, ''गुजरात में स्कूल की इमारतें बनी हैं मगर उनमें 7वीं तक के बच्चे पढ़ना ही नहीं जानते. शिक्षकों को 5300 रुपए वेतन मिलता है. उसमें उनका गुज़ारा कैसे होगा?''

एक अन्य छात्र किशोर ने भी सवाल उठाते हुए कहा, ''गुजरात में दलितों या आदिवासियों का कितना विकास हुआ है? नरेंद्र मोदी के विकास का मॉडल पूरे देश पर लागू नहीं हो सकता. विकास हुआ है मगर जिन वर्गों का होना चाहिए था उनका नहीं हुआ है.''

विकास के लिए संसाधन

मगर श्याम उनकी बात से सहमत नहीं थे, ''कई लोग कहते हैं कि गुजरात तो 1980 में ही विकसित था. तो क्या उस विकास को आगे बढ़ाने की ज़रूरत नहीं थी? आज आदिवासी महिलाओं के पास अस्पताल की सुविधाएँ हैं. किसानों की ज़मीन पर उद्योग लगाए गए हैं ये बात सही है मगर कभी-कभी विकास के लिए ऐसे संसाधनों की ज़रूरत पड़ती है.''

वह टाटा के गुजरात आने के समर्थन में बोले. उनका कहना था कि जो लोग टाटा के गुजरात में आने का विरोध कर रहे थे अगर टाटा उन्हीं के राज्य में जाते तो वे उसे एक तमग़े के रूप में पेश करते मगर गुजरात में ऐसा हुआ तो उसका विरोध करने लगे.

पारुल पटेल ने माना कि राज्य में विकास हुआ है मगर साथ ही वह उस विकास के स्वरूप से संतुष्ट नहीं थीं.

पारुल ने कहा, ''गाँवों तक सड़क पहुँची है मगर क्या उस पर बस भी चलती है, क्या वो बस गाँवों को शहरों से जोड़ पाई है?''

उन्होंने महिलाओं की सुरक्षा के दावों पर भी सवाल खड़े कर दिए. उनका कहना था, ''आँकड़ों के अनुसार ऐसा नहीं है कि गुजरात में बलात्कार नहीं होते मगर कहीं ऐसा तो नहीं कि ये मामले कम सामने आते हैं इसलिए आँकड़े कम हैं.''

ग़रीबों को फ़ायदा

ज़्यादातर छात्र-छात्राओं ने ये माना कि राज्य में औद्योगिक विकास हुआ है मगर साथ ही वे इस ओर इशारा करने से नहीं चूके कि इस विकास का फ़ायदा ग्रामीण या आदिवासी क्षेत्रों तक नहीं पहुँच रहा है.

एक छात्र बालकृष्ण ने तो सरदार वल्लभ भाई पटेल की स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी की भी चर्चा की. उन्होंने उस पर होने वाले ख़र्च पर सवाल उठाए और कहा कि ये धन विकास के काम में ख़र्च होता तो बेहतर होता.

मगर हितांश जैन ने गुजरात विकास मॉडल के आलोचकों से दूसरी बात कहीं. हितांश के मुताबिक़, ''हमें ये स्पष्ट होना चाहिए कि किसकी सरकार नहीं बननी चाहिए. गुजरात में ई-गवर्नेंस ने जनता और सरकार के बीच की दूरियाँ कम की हैं.''

हितांश ने भी वही तर्क दिया कि 'अगर गुजरात की जनता नरेंद्र मोदी को तीन बार से सत्ता दे रही है तो आख़िर राज्य में कुछ तो विकास हुआ होगा.'

अन्य राज्यों से तुलना

कैंपस हैंगआउट में आईआईटी दिल्ली की अर्थशास्त्री रीतिका खेड़ा भी शामिल थीं. उन्होंने गुजरात के विकास को असाधारण मानने से इनकार किया.

रीतिका का कहना था, ''आप अगर उत्तर प्रदेश, बिहार या मध्य प्रदेश जैसे राज्यों से गुजरात की तुलना करेंगे तो आपको गुजरात जापान या अमरीका जैसे लगेगा. पर यदि आप यही तुलना तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक या हिमाचल प्रदेश तक से करेंगे तो ऐसा नहीं होगा.''

रीतिका का कहना था कि दलितों या महिलाओं के विकास के मामले में गुजरात हिमाचल प्रदेश से भी पीछे हो गया है.

उनके मुताबिक़ सार्वजनिक वितरण प्रणाली या पीडीएस के मामले में छत्तीसगढ़ ने भी उल्लेखनीय प्रगति की है जबकि गुजरात उसमें सबसे पिछड़े राज्यों में खड़ा है.

छात्र-छात्राओं ने इस बात से इनकार नहीं किया कि गुजरात में औद्योगिक विकास हुआ है. मगर साथ ही वे इस ओर ध्यान खींचने से भी नहीं चूके कि विकास की ये बयार अभी सबको नहीं छू पाई है.

एक छात्रा जलपा की इस बात में आम सहमति नज़र आई कि सिर्फ़ औद्योगिक विकास से क्या होगा? समाज के सबसे अग्रणी ही नहीं बल्कि सबसे पिछड़े व्यक्ति के विकास की बात करनी होगी.

(बीबीसी हिंदी का एंड्रॉयड ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें. आप बीबीसी हिंदी से फ़ेसबुक या ट्विटर जैसे सोशल मीडिया माध्यमों पर भी जुड़ सकते हैं)

संबंधित समाचार