कहाँ होंगे मनमोहन सिंह 16 मई के बाद?

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भारत में चुनाव ज़ोर-शोर से जारी हैं और चर्चा सिर्फ़ यही है कि अगली सरकार कौन बनाएगा.

इस गाजे-बाजे में मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर से लोगों की नज़रें भी उठ चुकीं हैं और शायद दिलचस्पी भी. ज़्यादातर चुनावी शोर-शराबा दिल्ली के बाहर है और साउथ ब्लॉक स्थित प्रधानमंत्री कार्यालय में मनमोहन सिंह की मौजूदगी कम होती जा रही है.

(मैं किताब नहीं लिखूंगा...)

चूंकि आचार संहिता लगी है इसलिए न तो बड़े फ़ैसले हो रहे हैं और न ही तबादले. जानकार बताते हैं कि पीएमओ में इन दिनों मनमोहन सिंह का निजी सामान पैक किया जा रहा है, जिसमें उनकी किताबें शामिल हैं.

लेकिन इस बात का किसी को भी पता नहीं कि 16 मई के बाद मनमोहन सिंह क्या करेंगे या कहाँ होंगे? दरअसल इस सवाल का जवाब ख़ुद मनमोहन सिंह के परिवार वालों के पास भी नहीं है कि प्रधानमंत्री पद छोड़ने के बाद वो क्या करेंगे.

पढ़ाई से लगाव

उनके परिवार के एक सदस्य ने कहा, "उनमें आश्चर्य कर देने वाले फ़ैसले लेने की ज़बरदस्त क्षमता है. हमें लगता है कि वो ऐसा ही कुछ करने वाले हैं." उनके क़रीबी लोग इस बात को लेकर ख़ासे आश्वस्त हैं कि अब मनमोहन सिंह सक्रिय राजनीति में नहीं रहने वाले.

(सोनिया के हस्तक्षेप से...)

मनमोहन सिंह पहले भी कई दफ़ा इस ओर इशारा कर चुके हैं. हालांकि राज्य सभा सांसद के तौर पर अभी उनके पास पूरे चार वर्ष का कार्यकाल भी है. इस दौरान न चाहते हुए भी उन्हें संसद में होने वाली राजनीतिक सरगर्मियों से दो-चार तो होना ही पड़ेगा.

वैसे मनमोहन सिंह के पास एक लुभावना ऑफ़र केम्ब्रिज विश्वविद्यालय से मिला बताया जाता है. ख़ुद मनमोहन कैम्ब्रिज में अर्थशास्त्र की पढ़ाई कर चुके हैं और इसके प्रति उनका विशेष लगाव है.

सलाहकार की भूमिका

हो सकता है कि मनमोहन सिंह कैम्ब्रिज में जाकर कुछ दिन के लिए अर्थशास्त्र पढ़ाने के ऑफ़र पर गंभीरता से विचार कर रहे हों. अगर वे ये फ़ैसला लेते हैं तो उसके लिए उन्हें समय-समय पर ब्रिटेन में जाकर रहना होगा और ख़ुद-ब-ख़ुद वे सक्रिय राजनीति से और दूर हो जाएंगे.

(कहाँ हैं मनमोहन सिंह?)

मनमोहन सिंह के साथ पंजाब विश्वविद्यालय में काम कर चुके एक पूर्व प्रोफ़ेसर को इस बात का भरोसा है कि वो आगे चल कर लिखने-पढ़ने के काम से ही जुड़े रहने वाले हैं. उनके परिवार के सदस्य के अनुसार, "मनमोहन सिंह हमेशा से ही अख़बार-मैगज़ीन वग़ैरह पढ़ते समय भी नोट्स बनाते रहते हैं."

लेकिन इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है कि, "क्या मनमोहन सिंह अपने 10 वर्ष के कार्यकाल पर भी किताब लिख सकते हैं?" कुछ क़रीबी लोगों का मानना है कि बहुत संभव है मनमोहन सिंह, सोनिया और राहुल गांधी के लिए, परदे के पीछे से सलाहकार की भूमिका निभाएंगे.

ईमानदारी और 'निष्ठा'

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हालांकि कांग्रेस के एक बड़े नेता ने इस बात पर ज़्यादा वज़न तो नहीं दिया लेकिन उनकी तरह कई दूसरों को इस बात का पूरा यक़ीन है कि ख़ुद सोनिया गांधी मनमोहन सिंह को उनकी ईमानदारी और 'निष्ठा' के लिए एक ख़ास ओहदा देती रहीं हैं.

(किसका पलड़ा भारी...)

आर्थिक मामलों पर मनमोहन सिंह की पकड़ को देखते हुए इस बात की संभावना को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. सच ये भी है कि मनमोहन सिंह और उनके आस-पास के लोग इस बात से बिलकुल भी ख़ुश नहीं है कि 2014 के चुनावों के पहले कांग्रेस पार्टी के बड़े नेताओं ने मनमोहन कार्यकाल का बचते-बचाते ही ज़िक्र किया.

ज़्यादा ध्यान राहुल गांधी के नेतृत्व में 'पनप रही' एक युवा पार्टी पर ही रहा. स्वयं मनमोहन सिंह ने संसद से लेकर पार्टी बैठकों मैं राहुल के नाम पर मुहर भी लगाई है लेकिन चुनावों के ठीक पहले उन्हें 'रिटायर्ड' सा घोषित कर देने की बात से वे आहत ज़रूर होंगे.

बारु की किताब

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शायद यही वजह है कि हाल ही में उनके पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारु की किताब 'द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर' की किताब छपने के तुरंत बाद उनकी बेटियों ने अपने पिता के बचाव में बयान दिए.

(गाँवों और कस्बों में...)

मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल में मीडिया सलाहकार पंकज पचौरी ने एक प्रेस वार्ता में ज़ोर देकर कहा, "प्रधानमंत्री ने पिछले 10 वर्षों में 1,000 से ज़्यादा भाषण दिए हैं."

मनमोहन सिंह के साथ उनके वित्त मंत्रालय के दिनों में काम कर चुके लोग बताते हैं, "वे अपनी ईमानदार छवि को लेकर हमेशा से ही गंभीर रहे हैं इसलिए फ़ैसले लेने के पहले पूरा समय भी लेते हैं."

हालांकि ये फ़ैसला लेने में मनमोहन सिंह ने ज़्यादा समय नहीं लगाया कि 7, रेस कोर्स (प्रधानमंत्री आवास) छोड़ने के बाद वे दिल्ली में कहाँ रहेंगे. वैसे तो मनमोहन और उनकी पत्नी के नाम चंडीगढ़ और दिल्ली के वसंत कुंज में एक-एक फ़्लैट पहले से ही हैं.

मनमोहन का मूल्यांकन

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लेकिन उनके पद से जुड़े सुरक्षा कारणों के चलते उन्हें सरकारी आवास में तो रहना ही था. उन्होंने और पत्नी गुरशरण कौर ने चुनावों की घोषणा होने के पहले ही तय कर लिया था कि उन्हें बस एक चार बेडरूम वाला घर चाहिए. दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के तत्कालीन आवास 3, मोतीलाल नेहरू प्लेस को इसके लिए चुना गया.

(सवाल दलितों का...)

फिलहाल वहां मरम्मत जारी है और फर्श के साथ-साथ तीन एकड़ के बगीचे तक में कैमरे वगैरह लगाए जा रहे हैं क्योंकि प्रधानमंत्री के परिवार का मत है कि 16 मई को आम चुनाव के नतीजों के पहले ही उसमें शिफ्ट कर लिया जाए.

इस तारीख का एक और महत्व ये रहेगा कि इसके बाद से मनमोहन सिंह भारतीय इतिहास में लगातार दो कार्यकाल प्रधानमंत्री रहने वाले के तौर पर ही जाने जाएंगे. इतिहास को लेकर मनमोहन भी हमेशा सचेत रहे हैं.

जनवरी, 2014 में अपनी एक अहम प्रेस वार्ता में उन्होंने कहा था, "उम्मीद है कि इतिहास उदारता के साथ मेरा मूल्यांकन करेगा." मनमोहन सिंह कहीं भी रहें, कुछ भी करें, उनकी बारीक नज़र अपने बारे में लिखे जा रहे इतिहास पर ज़रूर रहेगी.

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