पहले मुसहर सांसद के टोले में भी शौचालय नहीं

मुरहो गांव का मुसहर टोला इमेज कॉपीरइट MANISH SHANDILYA

मुरहो गांव के दक्षिणी हिस्से तक पहुंचते ही पक्की सड़क समाप्त हो जाती है. आगे कच्चा रास्ता भी नहीं है. ख़ाली पड़ी ज़मीन और झोपड़ियों के बीच से ही आगे बढ़ा जा सकता है.

चुनाव के मौसम में बिहार के मधेपुरा ज़िले के मुरहो गांव इस कारण जाना हुआ क्योंकि इसी गांव के किराई मुसहर 1952 में मुसहर जाति से चुने जाने वाले पहले सांसद बने थे. किराई तब सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर भागलपुर सह पूर्णिया क्षेत्र से सांसद चुने गए थे.

किराई मुसहर का परिवार और उनकी जाति के लोग गांव के उसी दक्षिणी हिस्से में रहते हैं जहां आज भी कोई सड़क नहीं है.

यह भी एक विडंबना ही है कि किराई के संसद बनने के बाद ही यह गांव 1950 के दशक में सड़क से जुड़ा था लेकिन आज भी उस टोले तक सड़क नहीं पहुंची है जहां किराई के जाति के लोग रहते हैं.

दोपहिए से उतरकर थोड़ी दूर चलने के बाद किराई मुसहर के घर तक पहुंचना संभव हो पाया. गांव पहुंचने के पहले ही किराई के पोते उमेश ऋषिदेव से मोबाइल पर संपर्क हो गया था.

ऐसे में वह कुर्ते-पायजामे में अपने घर के बाहर स्थित बांस के मचान के पास दूसरे लोगों के साथ इंतज़ार कर रहे थे.

टीन की छत

उमेश का पहनावा वहां उपस्थित लोगों के मुक़ाबले थोड़ा व्यवस्थित इस कारण था चूंकि वह अभी सक्रिय राजनीति में हैं. चुनाव की तारीख़ों की घोषणा के बाद वह जदयू से राजद में शामिल हुए हैं.

मचान के पीछे खेत में मकई की फ़सल लहलहा रही थी और मचान के आगे उमेश का कच्चा मकान खड़ा था, जिसकी छत टीन की थी.

आज के ज़माने में एक सांसद के परिवार का फूस का घर होना हैरानी भरा था. लेकिन यह सच था. उमेश के अनुसार झोपड़ी से टीन की छत का यह बदलाव भी एक उपलब्धि ही है.

किराई के गांव के मुसहर टोले में आज भी कोई मकान पक्का नहीं है. लेकिन पक्का मकान नहीं होना ज़्यादा हैरान नहीं करता.

यह सच्चाई ज़्यादा चैंकाने वाली थी कि किराई मुसहर और कुछेक दूसरे परिवारों को छोड़ तीन सौ घरों वाले इस दलित टोले में बाक़ी सभी लोग आज भी भूमिहीन हैं. ये लोग सरकारी या फिर बड़े किसानों की ज़मीनों पर बसे हुए हैं.

आज़ाद भारत में बिहार भूमि सुधार की दिशा में पहल करने वाले पहले राज्यों में से एक था. वर्तमान राज्य सरकार ने भी महादलितों को ज़मीन देने की योजना शुरू की थी और मुसहर जाति को भी महादलित में शामिल किया गया है.

लेकिन ग्रामीणों के अनुसार इस योजना का लाभ अब तक किसी मुसहर परिवार को नहीं मिला है.

मूलभूत सुविधाएं

सड़क के साथ-साथ मुसहर टोला अब भी कई मूलभूत सुविधाओं से लैस नहीं है.

टोले में बिजली का ट्रांसफार्मर पिछले छह महीने से ख़राब पड़ा है जबकि गांव के दूसरे हिस्सों में बिजली आती-जाती रहती है.

टोले के किसी भी घर में शौचालय नहीं है जबकि बिहार ही नहीं देशभर में घरों को शौचालय से लैस करने के लिए योजना चल रही है.

शौचालय नहीं होने के कारण होने वाली परेशानियों के बारे में मुसहर टोले की सुजान देवी कहती हैं, "हमारे टोले के सभी महिलाओं को शौच के लिए थोड़ी दूरी पर स्थित नहर तक जाना पड़ता है. ऐसे में रात के समय हमें काफ़ी डर लगता है."

वहीं किराई मुसहर के पोते उमेश ऋषिदेव शौचालय निर्माण के लिए चलाई जा रही सरकारी योजनाओं की असफलता का कारण यह बताते हैं, "सरकारी अफ़सर कहते हैं कि पहले अपने पैसे से शौचालय बना लो, उसके बाद भुगतान कर दिया जाएगा. लेकिन मेरे टोले के लोगों के लिए ऐसा करना संभव नहीं है."

इस सबके बीच उमेश ने अपने ख़र्च पर घर के लिए शौचालय का निर्माण शुरू किया है. लेकिन पैसे की कमी से उसका काम भी अभी अधूरा पड़ा है.

अब चूहे नहीं खाते

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शिक्षा की रोशनी धीरे-धीरे ही सही लेकिन मुरहो गांव के मुसहर टोले तक भी पहुंच रही है और इसके सहारे लोग आगे बढ़ रहे हैं.

उमेश ऋषिदेव के अनुसार उनके समुदाय के लोगों के बीच अब जो शिक्षित हो गए हैं वह अपनी ज़िम्मेदारियों को बेहतर ढंग से समझ रहे हैं और बच्चों की शिक्षा पर भी ध्यान दे रहे हैं.

लेकिन अब भी मैट्रिक के आगे पढ़ाई करने के लिए इन्हें कई तरह का परेशानियों का समाना करना पड़ता है. ख़ासकर लड़कियां अब भी दसवीं के बाद पढ़ाई नहीं कर पाती हैं.

मुसहर जाति के लोगों की एक छवि यह है कि यह चूहे खाने वाला समुदाय है.

ग़ौरतलब है कि स्थानीय भाषा में "मूस" चूहे को कहते हैं और चूहे बिल में रहते हैं.

ऐसे में मुसहर उपनाम और इस जाति के लोगों के बिलवा जैसे नाम अप्रत्यक्ष रूप से मुसहर समुदाय की छवि से भी जुड़े हैं.

लेकिन अब किराई गांव के मुसहरों ने चूहा खाना तो छोड़ ही दिया है साथ ही उस छवि से जुड़े नाम और उपनाम वाली पहचान को भी झटक दिया है.

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जैसा कि 40 साल के राहुल ऋषिदेव कहते हैं, "अब हमारे समुदाय के लोग चूहे नहीं खाते हैं. मैंने और मेरे उम्र के लोगों ने कभी चूहा नहीं खाया है. साथ ही साक्षर और शिक्षित होने से आई जागरूकता के बाद हमने अपने बाप-दादा को भी चूहे खाने से मना कर दिया है."

भेदभाव

गांव में पहले की तरह दलितों के साथ अब भेदभाव नहीं होता है. बदलते दौर के साथ प्रत्यक्ष जातीय उत्पीड़न में काफ़ी कमी आई है.

अपने समुदाय से सबसे पहले मैट्रिक की परीक्षा पास करने वाले सेवानिवृत शिक्षक महेश्वरी ऋषिदेव के शब्दों में उत्पीड़न सोलह आना में बारह आना कम हो गया है.

वह बताते हैं कि पहले उनके समुदाय के साथ मारपीट की जाती थी, खेतों में बग़ैर मज़दूरी के ज़बरन काम कराया जाता था. लेकिन यह सब बीते ज़माने की बात हो गई है.

लेकिन वह यह भी जोड़ते हैं कि कुछ लोग अब भी दलितों को देखना नहीं चाहते हैं, उनके साथ छुआछूत करते हैं.

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