करुणानिधि: राजनीति का बड़ा परिवार और परिवार की राजनीति

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कुछ हफ़्ते पहले जब तमिलनाडु में चुनाव अभियान शुरू हो रहा था, तो राजनीतिक गलियारों में यह माना जा रहा था कि द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) लोकसभा चुनाव में अब तक की सबसे कम सीटों पर सिमट कर रह जाएगी और राज्य में सत्तारूढ़ आल इंडिया द्रविड़ मुनेत्र कषगम (एआईडीएमके) को भारी जीत मिलेगी.

लेकिन मंगलवार शाम जब चुनाव प्रचार ख़त्म हुआ तो एआईडीएमके के एक सदस्य ने अपना नाम ज़ाहिर न करने की शर्त पर बताया कि जब चुनाव प्रचार शुरू हुआ तो उनकी पार्टी में कहा गया कि डीएमके के प्रदर्शन को बहुत कम करके आंका गया था. लेकिन एआईडीएमके के आधिपत्य के ख़िलाफ़ डीएमके सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आई है.

राजनीतिक विश्लेषक केएन अरुण ने बीबीसी से कहा, "इसकी एक संगठनात्मक संरचना है, जो ज़मीनी स्तर तक जाती है. यह बात पिछले हफ़्तों में हुई कुछ घटनाओं से साफ़ हो जाती है. पार्टी के पित्रपुरुष मुथुवेल करुणानिधि के लिए उतार-चढ़ाव पिछले छह दशक में बच्चों का खेल बन गया है. यहां तक की 91 साल की आयु में भी पार्टी कामकाज के लिए उनमें जितना जोश है, वैसा भारत के राजनीतिक आकाश में किसी और में नहीं दिखता."

अरुण कहते हैं, ''हम इस तथ्य की अनदेखी नहीं कर सकते कि उन्होंने राजनीति के सबसे विस्तारित परिवार का नेतृत्व किया है. वास्तव में किसी और परिवार ने लगातार 15 साल के लिए केंद्र सरकार की सत्ता का मज़ा नहीं उठाया जितनाडीएमके ने उठाया. करुणानिधि ने 1999 में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए से समझौता किया था और कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए सरकार का हिस्सा बनने के लिए वो दस साल पहले उसमें शामिल हो गए थे.''

राजनीतिक परिवार

एक और राजनीतिक विश्लेषक जी सत्यमूर्ति कहते हैं, ''करुणानिधि प्रमुख राजनीतिक रणनीतिकार बन गए हैं. उनका परिवार न केवल बचा हुआ है, बल्कि वह समृद्ध भी है. यह सब तब है जब वो करिश्माई विरोधियों से लड़ रहे हैं. एमजी रामचंद्रन जब तक मुख्यमंत्री थे, तब तक करुणानिधि उन्हें हटा पाने की स्थिति में नहीं थे, लेकिन उनके निधन के बाद से वो मुख्यमंत्री जयराम जयललिता के करिश्मे से लड़ रहे हैं. यह लड़ाई आज भी जारी है.''

दो चतुर प्रतिद्वंदियों के बीच की लड़ाई ख़तरनाक हो गई, लेकिन यह दक्षिण की राजनीति में हमेशा से होता रहा है. जैसे को तैसा का पुराना चलन है. लेकिन उनका ध्यान कभी नहीं भटका. यह सत्ता के लिए था. आपातकाल के दौरान भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करने वाले आयोग की सिफ़ारिशों के आधार पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने करुणानिधि की सरकार को बर्खास्त कर दिया था.

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सत्यमूर्ति कहते हैं, ''करुणानिधि आपातकाल से बुरी तरह प्रभावित हुए थे. उनके बेटे स्टालिन को उनके सामने जेल में प्रताड़ित किया गया. वह किसी भी समय रंग बदलने में सक्षम हैं. वह गिरगिट की तरह हैं.''

असाधारण संगठनकर्ता

एक पूर्व संपादक और विश्लेषक वासंती कहती हैं, ''वह एक असाधारण संगठनकर्ता हैं. डीएमके में पार्टी के प्रति वफादारी निर्विवाद है. यहां तक कि जब उनकी पहली पत्नी पद्मावती मृत्युशैया पर थीं तो वो पार्टी की एक महत्वपूर्ण बैठक में शामिल होने चल गए थे. इसने उन्हें पार्टी कार्यकर्ताओं में लोकप्रिय बना दिया, लेकिन पिछले कुछ सालों में उन्होंने पार्टी से ऊपर परिवार को रखा है. इससे पार्टी कार्यकर्ता वास्तव में परेशान हैं.''

क्या वह अन्य की तुलना में अवसरों को तेज़ी से पहचान लेते हैं, क्योंकि उन्होंने एक किशोर के रूप में बहुत बुरे दिन देखे हैं और क्या इस वजह से वो परिवार को पार्टी से पहले रखते हैं?

सत्यमूर्ति कहते हैं, ''उनकी कहानी रोड़पति से करोड़पति बनने की है. जब वो 14 साल के थे तो आठवीं की पढ़ाई छोड़कर राजनीति में शामिल हो गए थे. करुणानिधि की लिखी पटकथाओं पर सफल फ़िल्में बनीं. इन फ़िल्मों में एमजीआर ने अभिनय किया और सिल्वरस्क्रीन पर छा गए. डीएमके जब सत्ता में आई तो करुणानिधि ने अपनी पहली पत्नी पद्मावति से बेटे मुथु को फ़िल्मों में आगे बढ़ाना चाहा. लेकिन उनकी फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर सफल नहीं हुई. इससे ईष्या इतनी बढ़ी कि पार्टी टूट गई और एमजीआर ने एआईएडीएमके का गठन किया. ऐसा तब हुआ जब पार्टी के संस्थापक अन्नादुरई की कैंसर से हुई मौत के बाद एमजीआर ने मुख्यमंत्री के लिए करुणानिधि के नाम का ही प्रस्ताव किया था.

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लेकिन करुणानिधि की दूसरी पत्नी दयालु अम्माल से पैदा हुए बच्चों ने मुथु से बेहतर प्रदर्शन किया. एमके अलागिरि और एमके स्टालिन राजनीति में जाना-पहचाना नाम हैं. करुणानिधि की बेटी सेल्वी का विवाह उनकी बहन के बेटे मुरासोली सेल्वम से हुआ है, जो कि कलानिधि मारन के स्वामित्व वाले सन टीवी के कन्नड ऑपरेशंस का कामकाज देखते हैं. करुणानिधि के चौथे बेटे एमके तमिलारासू बहुत लो प्रोफ़ाइल व्यक्ति हैं. करुणानिधि के भांजे मुरासोली मारन एनडीए की सरकार में वाणिज्य मंत्री थे, जिनके दो बेटे हैं कलानिधि और दयानिधि मारन.

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सत्यमूर्ति कहते हैं, ''फ़िल्मों का मामला हो या मीडिया या एयरलाइंस (स्पाइसजेट) का या अन्य कंपनियों का, यह परिवार कई अरब डॉलर का मालिक है.''

तेज़ दिमाग

करुणानिधि की तीसरी पत्नी रजति अम्माल कनिमोझी की माँ हैं. एयरसेल-मैक्सिस विवाद के बाद जब दयानिधि मारन को इस्तीफ़ा देने के लिए मज़बूर किया गया तो कनिमोझी गठबंधन के सहयोगियों के साथ प्रमुख वार्ताकार थीं.

सत्यमूर्ति कहते हैं, ''यूपीए से समर्थन वापस लेने के बाद भी उनका दिमाग काम करता रहा, जब उन्होंने कनिमोझी को राज्यसभा का सदस्य बनवा दिया. वो यह जानते हैं कि चीजों को कैसे किया जाए, जैसा कि उन्होंने इस चुनाव में किया है.''

वासंती कहती हैं, ''वे बहुत चतुर लोग हैं. उनकी युवा पीढ़ी फ़िल्मों में है. मारन बंधु तो बहुत अधिक चालाक हैं. राजनीति और व्यापार का मिलना एक बहुत ही घातक गठजोड़ है. लेकिन कोई भी व्यक्ति इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि उनके परिवार को जितना नुक़सान 2जी घोटाले ने पहुँचाया है, उतना ही नुक़सान अलागिरि को पार्टी से निकाले जाने से हुआ है.''

वासंती कहती हैं, ''लेकिन उस समय कार्यकर्ताओं के लिए संदेश साफ़ था, वह यह कि उनके नेता ने एक बार फिर पार्टी को परिवार से पहले रखा है. यह पार्टी के युवा नेताओं को प्रभावित करता है. यही वजह है कि वे उन्हें प्यार करते हैं, उसी तरह करुणानिधि उनके विचारों को भी सुनते हैं. इससे पार्टी का संगठन मज़बूत होता है.''

करुणानिधि पर नज़र रखने वाले लोग इस बात पर ज़ोर देते हैं कि ईश्वर को मानने के बाद भी वो सच्चे धर्मनिरपेक्ष हैं. यही वो विशेषता है जिसकी वजह से विधानसभा चुनाव में एआईडीएमके को वोट देने वाले अल्पसंख्यक लोकसभा चुनाव में डीएमके के पास लौट आए हैं.

सत्यमूर्ति कहते हैं, ''तब भी इस बारे में कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि करुणानिधि जब 100 साल के होंगे तब भी वो अपने परिवार को सत्ता में बनाए रखने की रणनीति बना रहे होंगे. यह उनका व्यक्तित्व है.''

एआईएडीएमके के कार्यकर्ता कहते हैं, ''अलागिरि को पार्टी से बाहर कर दिया गया है, लेकिन परिवार देर-सबेर एक हो जाएगा. वह एक ही तरह का ख़ून है.''

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