तमिलनाडु: मुफ़्त टीवी सेट, टीवी चैनल और विचार भी!

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तमिलनाडु में लोकप्रिय नाश्ता डोसे के लिए पिसाई कराते वक्त कृष्णा कुमारी कहती हैं कि अब उनकी ज़िंदगी काफ़ी आसान है. अब उनके पास गैस स्टोव, फ़ूड प्रोसेसर जैसे रोज़मर्रा की ज़रूरत के उपकरण हैं.

लेकिन उन्होंने इन्हें ख़रीदा नहीं है.

यह तो उन्हें पिछली सरकारों ने दिए हैं जिन्होंने अपने घोषणापत्रों में वायदा किया था कि वह जीते तो ये उपकरण देंगे- पार्टी नेताओं की तस्वीरों के साथ.

और उनके परिवार की एक महत्वपूर्ण वस्तु है - कलर टीवी. यह भी एक राजनीतिक दल ने ही मुफ़्त दिया है ताकि वह सत्ता में आ सके.

यह सभी चीज़ें वोट देने का पुरस्कार है और कृष्णा कुमारी कहती हैं कि उन्हें इसमें कुछ ग़लत नहीं लगता.

Image caption कृष्णा कुमारी सभी तोहफों का पूरा इस्तेमाल करतीं हैं.

वह कहती हैं, "मैं घरों में सहायिका का काम करती हूं और करीब 1,500 रुपये कमाती हूं. हम कलर टीवी या अन्य उपकरण कैसे ले पाते? वैसे तो यह उपकरण हमारी पहुंच से बाहर हैं."

आसान और तेज़

पिछली सरकार के मुफ़्त टीवी देने की वजह से तमिलनाडु में लगभग हर व्यक्ति के पास केबल कनेक्शन भी है, जो कि देश में सबसे ज़्यादा है. लेकिन टीवी सेट देना एक बात है - यहां हर पार्टी का अपना टीवी स्टेशन तक है.

उसका इस्तेमाल वह लोगों के घरों तक संगीत, फ़िल्म, बहसें और अपने राजनीतिक विचारों को पहुंचाने के लिए करते हैं.

इसमें समाचार भी शामिल हैं. जैसे कि कृष्णा कुमारी के टीवी में चल रहे समाचार बुलेटिन में कांग्रेस की ओर झुकाव साफ़ नज़र आता है.

वसंत टीवी के मालिक एक स्थानीय कांग्रेस पार्टी नेता हैं जो बड़े खुदरा व्यापार के मालिक भी हैं.

लेकिन सैटेलाइट टीवी चैनल का मतलब है भारी निवेश. तो क्या एक टीवी स्टेशन शुरू करना व्यावसायिक रूप से सही है?

वसंत टीवी के निदेशक वसंत कहते हैं, "एक व्यापारी के रूप में मुझे लगता है कि दीर्घकाल में यह अर्थक्षम है. क्योंकि व्यापार करते हुए होर्डिंग्स, अन्य चैनलों में विज्ञापन के लिए हमें काफ़ी निवेश करना पड़ता है. इसलिए हमने लोचा कि क्यों न हम अपना मीडिया शुरू करें जिससे हम अपना विज्ञापन भी कर सकें और हमारे पास बिना रोक-टोक के विकल्प भी ज़्यादा होंगे."

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"क्योंकि मेरे पिताजी कांग्रेस से जुड़े हैं इसलिए वह राजनीतिक प्रचार भी चाहते थे. इसलिए हम व्यापार के साथ ही पार्टी का भी प्रचार करते हैं."

हालांकि राजनेता अब भी पुराने ढंग से प्रचार करते हैं लेकिन टीवी चैनलों के माध्यम से सीधे लोगों के घरों में घुस जाना इसके मुकाबले कहीं आसान और तेज़ तरीका है.

यह चलन क्षेत्रीय दलों ने शुरू किया था और उनके प्रचार का मुख्य ज़रिया भी यही रहता है. मशहूर अभिनेता विजयकांत की पार्टी डीएमडीके मानती है कि चुनावी जीत में टीवी चैनलों की मुख्य भूमिका होगी. हालांकि तमिलनाडु जैसे राज्य में जहां 35 टीवी चैनल हैं, दर्शक मिलने की गारंटी नहीं है.

'ज़रूरत'

डीएमडीके के कैप्टन टीवी के सीईओ, दिलीप कुमार, कहते हैं, "इस तरह के प्रतियोगी माहौल में टिके रहना आसान नहीं है, लेकिन हम इसे पार्टी के मुखपत्र की तरह इस्तेमाल करते हैं, फ़ायदा कमाने के लिए नहीं. हम डीएमडीके का प्रचार करना चाहते हैं. हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि हमारे नेता तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बनें, इसिलए हम इससे पैसा कमाने की नहीं सोचते."

तमिलनाडु में राजनीतिक टीवी की सफ़लता का मतलब यह हुआ कि अब यह दूसरे राज्यों में भी फैल रही है. आंध्र प्रदेश, पंजाब में भी राजनेता ऐसे ही उद्यम शुरू कर रहे हैं. और चूंकि चैनलों को नियंत्रित करने की कोई योजना नहीं है इसलिए यहां सबको खुली छूट है.

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मद्रास हाईकोर्ट में वकील सुहरित पार्थसार्थी कहते हैं, "राजनीतिक दलों द्वारा मीडिया के मालिकाना हक को नियंत्रित करने को लेकर कोई कानून नहीं है. पश्चिम के लोकतांत्रिक देशों में राजनीतिक दलों के मालिकाना हक़ के साथ ही अंतर-मीडिया मालिकाना हक़ को नियंत्रित किया जाता है, जो यहां नहीं है."

"और इसका मतलब यह हुआ कि आप एक मीडिया चैनल या टीवी चैनल के मालिक हो सकते हो. यह एक व्यावहारिक बात है और एक ज़रूरत बन गई है."

भारत का निर्वाचन आयोग यह जांच कर रहा है कि क्या राजनीतिक दलों को मुफ़्त उपहार बांटने चाहिए या नहीं.

लेकिन इसका इन चुनावों में कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा जहां लैपटॉप से लेकर बकरी और गाय तक उपहार के रूप में देने के वायदे किए जा रहे हैं.

और जहां हज़ारों लाख गरीब भारतीय रोज़ी-रोटी के लिए संघर्ष कर रहे हों, राजनीतिक दल जानते हैं कि वह उपभोक्ता वस्तुएं लोगों के घरों में पहुंचाकर उनका ध्यान खींच सकते हैं. यकीनन वह अपना राजनीतिक संदेश भी उनके घरों तक पहुंचाएंगे.

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