अल नीनो से आतंकित न हों, बस सतर्क रहें

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Image caption इस साल अल नीनो प्रभाव के कारण मानसून कमजोर रहने की संभावना है

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार भारत में इस साल अल नीनो फैक्टर के सक्रिय होने के कारण मानसून सामान्य स्तर से कम रह सकता है.

हालांकि भारतीय कृषि विशेषज्ञों ने सरकार को सलाह दी है कि वह अभी इससे जुड़ी कोई चेतावनी जारी ना करे.

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार कृषि लागत और मूल्य आयोग के पूर्व प्रमुख अशोक गुलाटी ने कहा, "हमें सतर्क रहने की और आने वाली परिस्थितियों के लिए तैयार रहने की जरूरत तो है लेकिन आतंकित होने की जरूरत बिलकुल नहीं है. क्योंकि साल 1997 में भी अल नीनो फैक्टर सक्रिय हुआ था मगर इसके प्रभाव से देश सफलतापूर्वक बाहर निकल आया था."

भारत के मौसम विज्ञान विभाग ने एक बयान जारी कर कहा, "मानसून के मौसम में इस बार पहले के मुकाबले करीब 95 फ़ीसदी बारिश होने की संभावना है. इसमें 5 प्रतिशत का बदलाव हो सकता है."

मौसम विभाग के अधिकारियों ने कहा था कि इस साल अल नीनो प्रभाव के कारण मानसून कमजोर रहने की संभावना है.

वैसे गुलाटी, जो आईसीआरआईईआर में प्रोफेसर हैं, ने कहा है कि सामान्य स्तर से कम बारिश का मतलब ये नहीं कि देश में सूखे जैसे हालात पैदा हो जाएंगे. उन्होंने आगे कहा, "बल्कि हमें ये देखना होगा कि देश भर में बारिश कहीं ज्यादा, कहीं कम न होकर सामान्य स्तर पर हो."

खरीफ फसल

अल-नीनो एक ऐसी मौसमी परिस्थिति है जो प्रशांत महासागर के पूर्वी भाग यानी दक्षिणी अमरीका के तटीय भागों में महासागर के सतह पर पानी का तापमान बढ़ने की वजह से पैदा होती है.

इसकी वजह से मौसम का सामान्य चक्र गड़बड़ा जाता है और बाढ़ और सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाएँ आती हैं.

अल नीनो की स्थिति हर 4 से 12 साल में आती है. पिछली बार इसने साल 2009 में भारतीय मानसून पर गहरा असर डाला था जिससे देश को चार दशकों के सबसे खराब सूखे का सामना करना पड़ा था.

रेटिंग एजेंसी 'क्राइसिल' के मुख्य अर्थशास्त्री डीके जोशी ने कहा, "इसमें कोई शक नहीं है कि आईएमडी की भविष्यवाणी उत्साहजनक नहीं है, लेकिन मेरे अनुसार घबड़ाने की कोई जरूरत नहीं क्योंकि मानसून के सामान्य रहने की संभावना अधिक है."

उन्होंने आगे कहा, " सामान्य स्तर से कम बारिश का मतलब सूखा नहीं होता. ज्यादा फर्क इस बात से पड़ता है कि पूरे देश में बारिश एक समान होती है या नहीं. हम चिंता तो करें, लेकिन साथ ही आने वाली परिस्थितियों के लिए तैयार भी रहें. ताकि अचानक किसी तरह की घबड़ाहट का सामना ना करना पड़ें."

सामान्य तौर पर लगभग चार महीने तक चलने वाला मानसून जून से शुरू होता है. यह चावल, सोयाबीन, कपास और मक्के जैसी खरीफ फसलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश में कृषि योग्य 60 फ़ीसदी भूमि सिचाई के लिए मानसून पर निर्भर है.

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