'शाज़िया इल्मी, बीजेपी में शामिल होने वाले लड़कों का बॉयकॉट क्यों?'

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चंद रोज़ पहले आम आदमी पार्टी की नेता शाज़िया इल्मी एक विवादास्पद वीडियो में यह कहते हुए दिखाई देती हैं कि मुसलमानों को सांप्रदायिक होना होगा. उनके मुताबिक़ मुसलमान सेक्युलर हैं.

इस बात के लिए उनकी काफ़ी निंदा की गई कि उन्होंने विवाद वाली बात क्यों कही. लेकिन मेरे विचार में उनकी आलोचना इस बात के लिए भी होनी चाहिए कि उनका यह बयान तथ्यात्मक रूप से ग़लत है.

इसमें कोई शक नहीं कि भारत के मुसलमान दूसरे कई मुस्लिम देशों के मुसलमानों की तुलना में कम कट्टर हैं लेकिन हकीकत ये है कि उनमें साम्प्रदायिक तत्वों की संख्या बहुत है. शाज़िया को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ और यह कह सकता हूँ कि खुद इस सफ़ में शामिल नहीं हैं.

लेकिन बिहार के गया शहर में वह मुस्लिम समाज असाम्प्रदायिक कैसे हो सकता है जिसने अपने दो युवाओं का सोशल बॉयकॉट इसलिए कर दिया है क्यूंकि वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए.

ये युवा काफी पारम्परिक मुस्लिम परिवार के हैं और शायद इसीलिए परिवार वालों को उनके इस कदम से इतना ज़बरदस्त झटका लगा कि वे भी अब इन लड़कों से मिलना नहीं चाहते. इन युवाओं को ऐसा लग रहा है कि भाजपा में शामिल होकर उन्होंने कोई बड़ा पाप किया है.

सफ़ल कारोबारी मुस्लिम और बीजेपी

यह बॉयकॉट बड़े शहरों में रहने वाले मुसलमानों के मुहल्लों में न होता हो लेकिन छोटे शहरों और कस्बों में भाजपा या नरेंद्र मोदी के साथ क़तार में शामिल होने से सामाजिक तौर पर कट जाने से कम की सजा नहीं मिलती.

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इन दिनों कुछ इसी तरह का ड्रामा मेरे घर और परिवार के अंदर भी चल रहा है. कुछ सप्ताह पहले कॉरपोरेट जगत में काम करने वाला मेरा भाई अपने कुछ मुस्लिम दोस्तों के साथ एक बड़े समारोह में भाजपा में शामिल हो गया. शामिल होने से पहले उसकी मुलाक़ात भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी से हुई थी.

इसका इल्म मुझे तो था लेकिन मेरी माँ और परिवार के अन्य सदस्यों को नहीं था. भाजपा में शामिल होने के बाद मेरे भाई ने जब ये ख़बर माँ और परिवार वालों को दी तो घर में मातम सा छा गया. मानो मेरे भाई ने ईशनिंदा की हो.

मेरे परिवार में पहली बार किसी ने भाजपा से हाथ मिलाया था. भाई को डर था कि इस कदम के बाद उसे परिवार से अधिक मोहल्ले और अपने शहर के मुसलमानों की निंदा का सामना करना पड़ेगा और ऐसा ही हुआ.

कुछ दिनों तक विरोध करने के बाद माँ और परिवार के लोग तो मान गए लेकिन मोहल्ले के मुसलमानों ने मेरे परिवार पर कीचड़ उछालना शुरू कर दिया.

पहले दबे शब्दों में एक-दूसरे को फोन करके मेरे भाई और परिवार को बुरा भला कहना शुरू किया. और जब मेरा भाई हाल में नरेंद्र मोदी की रैली की तैयारी के सिलसिले में अपने शहर गया तो वे खुल कर भाई के पीछे पड़ गए. उन्होंने उसे ललकारा और मोदी से अलग करने के हर तरीक़े इस्तेमाल किए.

मोदी की रैली के बाद वापस लौटने पर भाई ने इस कड़े विरोध का मुझ से ज़िक्र किया और इसकी जो वजह बताई इसका अंदाज़ा मुझे पहले से था. उसका कहना था कि भाजपा से अधिक मोदी नाम से मुसलमानों को घृणा है.

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कारण यह है कि मोदी को मुसलमान न केवल 2002 के गुजरात दंगों में मुसलमानों की हत्या का ज़िम्मेदार मानते हैं बल्कि उन्हें वे मुस्लिम विरोधी कट्टरवादी हिन्दू की तरह देखते हैं जो मुसलमानों का खुलेआम दुश्मन है.

भाई की बातों से मैंने यह भी महसूस किया कि मुसलमान मोदी की हिन्दू समाज में लोकप्रियता का कारण यह मानते हैं कि आम हिन्दू यह समझता है कि मोदी ने मुसलमानों को सबक़ सिखाया है और इसीलिए वह उनका हीरो है. वे मोदी की लोकप्रियता का कारण उनके विकासपुरूष होने की छवि को बिलकुल नहीं मानते.

दूसरी तरफ भाजपा के खेमे में भाई ने जिस तरह से प्रवेश किया मैं उससे भी हैरान था. मुझे मालूम है मेरे भाई और भाजपा के सिद्धांतों में कोई समानता नहीं है.

वह कॉरपोरेट जगत के उन लोगों में शामिल है जो समझते हैं कि मोदी के आने के बाद उनके व्यापार और पैसे बढ़ेंगे. जिस आसानी से उसकी मुलाक़ात मोदी से हुई और भाजपा में एंट्री मिली उससे ये भी समझ में आता है कि यह मिलाप दोनों के पक्ष में जाता है - भाजपा को कामयाब मुस्लिम चेहरे चाहिए और मेरे भाई को 'प्रधानमंत्री' मोदी.

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