क़र्ज़ की फ़सल से आत्महत्या के आंकड़ों तक

किसान, ख़ुदकुशी, आत्महत्या, पंजाब

‘‘उस दिन आढ़तिया आकर गया था. हमारे ट्यूबवैल का बोर टूट गया था. हमने क़र्ज़ लिया था. आढ़तिए ने कहा कि उठाकर ले जाएंगे. इसके बाद बलविंदर सिंह खेत में चले गए और वहां स्प्रे पी ली. मुझे पता भी नहीं चला.’’

यह 26 फ़रवरी 2009 की बात है, तब अमरजीत कौर की बेटियां 10 और 11 साल की थीं, बेटा गोद में था.

हम संगरूर में मूनक इलाक़े के गांव चोटियां में अमरजीत कौर के घर पर थे.

अंदाना ब्लॉक का वही गांव जहां अकेले इसी साल आठ किसानों और खेत मज़दूरों ने क़र्ज़ के चलते ख़ुदकुशी की है. पिछले 20 साल में ख़ुदकुशी का यह आंकड़ा 63 तक चला गया है.

इनमें से 55 की मौत के पीछे क़र्ज़ वजह थी, इसकी तसदीक गांव पंचायत ने अपने एफ़िडेविट में की है.

बलविंदर सिंह ने भी क़र्ज़ की खेती की थी. उनकी बेवा अमरजीत इस फ़सल को अपने आंसुओं से काट रही हैं.

बलविंदर की मौत को पांच साल बीत चुके हैं, पर अमरजीत कौर के घर के बाहर अक्सर खड़े आढ़तिए (साहूकार) उन्हें उस मनहूस दिन की याद ताज़ा करा जाते हैं.

पांच लाख रुपए का क़र्ज़ा जिसकी वजह से बलविंदर ने जान दी, आज भी खड़ा है. ब्याज चुकाते-चुकाते अमरजीत और उनका परिवार अब बेदम हो चला है.

पांच एकड़ ज़मीन औने-पौने दामों पर बेच दी ताकि वह और उनके बच्चे ज़िंदा रहें. आढ़तिए भी नहीं चाहते कि वो ख़ुदकुशी करें, ब्याज और मूलधन अभी बाक़ी है.

कहती हैं, ‘‘कभी यहां कभी वहां मज़दूरी करके बच्चों को पाल रही हूं. उसके बाद हमें ब्याज भी देना है और वो लोग आते हैं, पर हम कहां से दें. पूरा घर क़र्ज़ में दबा है. हमें तो समझ नहीं आ रहा कि क्या करें?’’

मैंने जब पूछा तो बोलीं, ‘‘क़र्ज़ा हमने घर चलाने के लिए, ट्यूबवैल के लिए, दाना-तूड़ी के लिए और रिश्तेदारी के लिए लिया था, पर कभी उतरा ही नहीं. हमने साढ़े तीन कीले खेत बेच दिए. ज़मीन बेचते गए और खाते गए. ज़मीन 40-40 हज़ार और 35-35 हज़ार रुपए में बेच दी जबकि लाख रुपए की थी.’’

36 साल के बलविंदर के भाई ने भी एक साल पहले स्प्रे पीकर आत्महत्या कर ली थी. उनकी पत्नी और लड़की अब अमरजीत के साथ ही रह रही हैं.

दुख साझा हो सकता है, मगर साझा करने के लिए घर में रोटी नहीं है. अमरजीत कौर के भाई अब उनके बच्चों की देखभाल कर रहे हैं.

‘सानूं कौन पुछदा ए जी?’

‘‘अब तो टाइम पास ही है. कुछ नहीं बचता. आढ़ती आते हैं और पैसे मांगते हैं. कहते हैं-थोड़े-थोड़े करके दो. एक बेटी की पढ़ाई छुड़वा ली है. दिहाड़ी करते हैं. बेटी सिलाई करती है तो थोड़ा कमा लेती है.’’

अमरजीत ने पहले भी वोट दिया है, पर अब उन्हें लगता है कि ये बेकार की बातें हैं.

उनका कहना था, ‘‘इस साल कोई नहीं आया. सरकार की तरफ़ से कोई मुआवज़ा भी नहीं दिया गया. इस बार भी अगर कोई पूछेगा तो दे देंगे. हमारे वोट से क्या बदलेगा. कुछ नहीं बदलता. हम तो बस अपना काम साध लेते हैं. ये भी चलते हुए लोगों को पूछते हैं. हमें क्यों पूछेंगे. सानूं कौन पुछदा ए जी.’’

इलाक़े के पूर्व विधायक और मूवमेंट अगेंस्ट स्टेट रिप्रैशन के संयोजक इंदरजीत सिंह जेजी बताते हैं कि संगरूर ज़िले में भी सुनाम, लहरागागा, मूनक सब डिवीज़न किसान और खेत मज़दूरों की आत्महत्या से सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं.

इंदरजीत सिंह कहते हैं, "पुलिस कहती है कि पिछले पांच साल में सात ख़ुदकुशी हुई हैं, जबकि किसान आयोग कहता है कि साल भर में 6000 ख़ुदकुशी होती है. सीधे सात से छह हज़ार के बीच अंतर कितना बड़ा है. ऊपर से अब सरकार मुआवज़े के पैसे दे रही है जो साहूकार के पास ही जाएगा. बेहतर तो यह होता कि सरकार पेंशन लगा देती, तो किसान का परिवार बच जाता."

नौकरी छोड़ी, ज़मीन पकड़ी, जान दी

इसी गांव के कृशन सिंह ने नौकरी छोड़कर खेती का दामन थामा था. मगर क़र्ज़ ने उन्हें मज़दूर बनाकर छोड़ दिया.

वह पिछले साल की 10 मई थी. मोहिंदर कौर घर के काम में लगी थीं. तभी कृशन सिंह ने कपड़े का फंदा बनाया और लटक गए. कृशन की उम्र तब 45 साल थी, आढ़तिए का क़र्ज़ था पांच लाख रुपए.

‘‘देनदार को पैसे नहीं दे पाए तो उन्हें लगा कि मैं किसे मुंह दिखाऊंगा. ब्याज पर ब्याज बढ़ते-बढ़ते पैसा काफ़ी हो गया था.’’

मोहिंदर मुझसे बात करते-करते रो पड़ती हैं. उनका जवान बेटा बिट्टू पास ही बैठा है.

वह बताती हैं, ‘‘पहले वो नौकरी करते थे, पर क़र्ज़ा उतरता ही नहीं था, चढ़ता जाता था. उन्होंने कहा कि नौकरी छोड़कर ठेके पर ज़मीन ले लेते हैं. तीन साल तक वो ठेके पर ज़मीन लेते रहे, पर क़र्ज़ा फिर भी नहीं उतरा. उसी दौरान हमने बेटी का ब्याह किया. फिर क़र्ज़ा लेना पड़ा. बैंकों से पैसा मांगा तो उन्होंने दिया नहीं. वह पैसे को उधर से इधर घुमाते रहे पर कुछ नहीं हो पाया. जाने से पहले मुझे कुछ नहीं बताया.’’

मोहिंदर की छोटी बेटी दसवीं के पेपर दे रही है और बड़ा बेटा बीए की पढ़ाई बीच में छोड़ बैठा है, दिहाड़ी के लिए. उसे गांव में ही कभी-कभी मिस्त्री का काम मिल जाता है. वह सुनाम के कॉलेज से बीए कर रहा था.

बिट्टू बताते हैं, ‘‘क़र्ज़ा भी माफ़ नहीं हुआ है. कई बार पता चलता है कि इसका देना है, उसका देना है. वो (आढ़तिए) अभी भी बोलते हैं कि मेरा इतना पैसा देना है. यहां तो नहीं आते, पर हमारे चाचा को बोलते हैं.’’

मोहिंदर को टीबी की बीमारी थी. वह अब भी बीमार रहती हैं. मगर मज़दूरी करने जाती हैं क्योंकि रोटी रोज़ खानी है.

क्या उन्हें यक़ीन है कि उनका वोट उनकी ज़िंदगी में कुछ तब्दीली ला पाएगा?

मोहिंदर का दो-टूक जवाब है, ‘‘मेरा तो कोई यक़ीन नहीं कि कोई आएगा या कुछ करा सकता है. न लेना न देना सरकार का. 30 साल हो गए वोट देते पर किसी ने कभी हमारी मदद नहीं की. हमें कुछ फ़ायदा नहीं हुआ वोट देने का. वो तो मीठी गोलियां देते रहते हैं, बाद में कोई किसी को नहीं पूछता.’’

अब भी आते हैं आढ़तिए

चोटियां गांव में ही मेरी मुलाक़ात सुलोचना से हुई. जिनके हाथ पर रखी रोटी बता रही थी कि वो उस क़तार में कहां हैं, जहां लोकतंत्र उनसे वादा करता है. दूसरी बेवाओं की तरह सुलोचना का भी वोट है.

उनके पति दर्शन सिंह ने पिछले साल 10 जुलाई को ख़ुदकुशी की थी.

मैंने पूछा तो उन्होंने बताया, ‘‘पिछली बार बादल को दिया था. बादल सरकार ने कुछ नहीं किया. कोई पेंशन नहीं दी. आठवां महीना हो गया है. राशन कार्ड है, जिस पर गेहूं मिलता है. बीपीएल में नंबर भी लगा है. फिर भी क़र्ज़ा अभी वही तीन लाख रुपए है, जो वो छोड़ गए थे. आढ़तिए आते हैं मांगने. बहुत ब्याज चुकाया है. हमारे पास कोई ज़मीन नहीं है. यह घर है बस, इसके पैसे भी नहीं कटे हैं. ज़मीन बेच दी थी बहुत सस्ते में. दो लाख रुपए का कीला एक लाख रुपए में बिक गया था.’’

दर्शन सिंह की चार बेटियां हैं और एक बेटा. पिछले साल वह 55 साल के थे, और उन पर क़र्ज़ था ढाई लाख रुपए, जब उन्होंने खेतों में छिड़कने वाला स्प्रे पीकर मौत को गले लगाया था.

सुलोचना बताती हैं, ‘‘पहले मकान ले लिया था, उसके बाद ठेके पर ज़मीन ली और इसके बाद बेटी का ब्याह किया. बाद में बेटी का तलाक हो गया. ज़मीन बेच दी. बेटा मेरा बीमार रहता है. कुछ पैसा उसमें लग गया. इसके बाद क़र्ज़ा बहुत हो गया और उसकी टेंशन में कर गया खुदकुशी.’’

हालात नहीं बदलने थे, न बदले. दर्शन सिंह को घर के लोग डॉक्टर के पास ले गए, जहां उन्हें सात दिन भर्ती रखा गया. इस बीच उनके 45 हज़ार रुपए और ख़र्च हो गए.

सुलोचना की बेटियां अब पढ़ने नहीं जातीं. घर में ही रहती हैं. सुलोचना और उनका बेटा दिहाड़ी मज़दूरी करते हैं. अगर वह पढ़ने जाता है तो ग़ैरहाज़िरी बढ़ती है. इसलिए पढ़ाई को अलविदा कह दी.

भारतीय किसान यूनियन एकता के सूबा अध्यक्ष जोगिंदर उगराहां बताते हैं कि आढ़तियों की ब्याज दर 24 फ़ीसदी से 36 फ़ीसदी तक चली जाती है. उग्राहां कहते हैं, "ज़्यादा ब्याज लेने के साथ आढ़तिए सरचार्ज लगाते हैं, नक़द पैसा नहीं देते हैं, पर्ची चलती है. पर्ची पर मर्ज़ी के दाम दुकानदार लगाता है. वे दिन पर दिन अमीर होते जा रहे हैं जबकि किसान मकड़जाल में फंसा है."

चोटियां के सरपंच भान सिंह के दस्तख़त से निकले एफ़िडेविट सुबूत हैं कि क़र्ज़ कैसे जीते-जागते इंसानों को महज़ दिवंगत नामों में बदल रहा है.

भान सिंह बताते हैं कि सरकार ने कभी उनसे जानकारी नहीं मांगी कि आख़िर लोग क्यों जान दे रहे हैं?

‘‘सरकार ने हमसे नहीं पूछा कभी. वोट ले जाते हैं पर पूछता कोई नहीं. रोज़ आ रहे हैं कांग्रेसी और अकाली. आकर कहते हैं कि हमें वोट दो तो हम ये करेंगे, वो करेंगे.’’

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