कानपुर: श्रीप्रकाश जायसवाल की दावेदारी में कितना दम?

  • 28 अप्रैल 2014
श्रम शक्ति एक्सप्रेस, कानपुर से दिल्ली Image copyright ROHIT GHOSH

साल 2002 में कानपुर से सीधे नई दिल्ली के लिए एक नई ट्रेन चली थी, श्रमशक्ति एक्सप्रेस. यह ट्रेन देर रात कानपुर से चलती है और सुबह दिल्ली पहुँचती है. दिल्ली से भी रात को रवाना होती है और भोर में कानपुर पहुँच जाती है.

उस ट्रेन से एक व्यक्ति 2002 से ही करीब-करीब हर शनिवार की सुबह कानपुर आता है और दो दिन कानपुर में बिताने के बाद वह व्यक्ति श्रमशक्ति एक्सप्रेस से ही रविवार की रात दिल्ली के लिए रवाना हो जाता है.

ऐसा कौन है जो हर हफ़्ते कानपुर आता है और दो दिन बिताने के बाद वापस दिल्ली चला जाता है?

तो इसका जवाब है श्रीप्रकाश जायसवाल, वर्तमान में कानपुर के सांसद और केंद्रीय कोयला मंत्री. एक सितंबर, 2002 को जायसवाल ने ही हरी झंडी दिखा कर श्रमशक्ति एक्सप्रेस को कानपुर स्टेशन से रवाना किया था.

कानपुर के मुद्दे

साल 1999 से कानपुर से लगातार तीन बार लोकसभा चुनाव जीत चुके जायसवाल चौथी बार फिर चुनावी मैदान में हैं.

इस बार जायसवाल को चुनावी अखाड़े में चुनौती दे रहे हैं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के मुरली मनोहर जोशी, जो पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में से एक हैं.

कानपुर में इस समय सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा क्या है? इस सवाल के जवाब में कानपुर के चुनाव विश्लेषक मनोज त्रिपाठी कहते हैं, "घर वाला बनाम बाहर वाला."

वे कहते हैं, "जायसवाल ठेठ कनपुरिया हैं. शहर से और उसके लोगों को अच्छी तरह से परिचित हैं. कानपुर ही में पले और बड़े हुए श्रीप्रकाश जायसवाल सांसद बन कर दिल्ली गए, केंद्रीय मंत्री भी बने पर अपने शहर को नही भूले. वे हर हफ़्ते कानपुर आते हैं."

ज़मीनी माहौल का हाल

मनोज बताते हैं, “वे यहाँ हर छोटे-बड़े कार्यक्रम में शिरकत करते रहें हैं. मोहल्लों में घूमते हैं. रुक कर लोगों से हाथ मिला लेते हैं, हाल-चाल पूछ लेते हैं. यहाँ के हर गली कूचे को अपने पैरों से नाप चुके हैं. ये सब इस चुनाव में उनके पक्ष में जा रहा है."

दूसरी तरफ़ सांसद के तौर पर जोशी ने सबसे पहले अपनी जीत दर्ज़ की अल्मोड़ा से और फिर इलाहबाद से. साल 2009 में वह वाराणसी लडे और जीते. इस चुनाव में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के लिए वाराणसी सीट छोड़ कर कानपुर से चुनाव लड़ रहे हैं.

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मनोज त्रिपाठी कहते हैं, "मुरली मनोहर जोशी की छवि कानपुर में इस समय एक बाहरी व्यक्ति की है. कभी अल्मोड़ा से चुनाव लड़े, कभी इलाहाबाद से तो कभी वाराणसी से. कानपुर से कोई लेना देना ही नही है उनका."

प्रत्याशी घोषित किए जाने के बाद मुरली मनोहर जोशी 16 मार्च को पहली बार कानपुर आए. वे एक खुली जीप में बीजेपी के कार्यालय पहुंचे. रास्ते में उन्होंने हाथ हिलाकर लोगों का अभिनंदन किया.

कानपुर का विकास

शहर में तुरंत एक जुमला चल पड़ा - एक हाथ मिला कर वोट मांग रहा है, दूसरा हाथ हिला कर.

त्रिपाठी आगे कहते हैं, "पूरे देश की तरह कानपुर में भी मोदी एक मुद्दा है. जोशी के पक्ष में यही सबसे बड़ी बात है."

वे कहते हैं, "इसलिए, जायसवाल खुद चुनाव लड़ रहे हैं पर जोशी के लिए भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ लड़ रहे हैं."

उनके अनुसार तीसरा मुद्दा है कानपुर का विकास. "जायसवाल 15 साल से सांसद हैं. कानपुर को बहुत कुछ दिया है. पर जोशी के पास अभी सिर्फ़ वायदे हैं."

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Image caption श्रीप्रकाश जायसवाल का स्थानीय लोगों से जुड़ाव चुनाव क्षेत्र में उनकी स्थिति मजबूत करता है.

जातिगत वोट की राजनीति हालांकि उत्तर प्रदेश से ही शुरू हुई पर कानपुर उससे अछूता रह है.

कानपुर में न ही कभी जाति के नाम पर उम्मीदवार खड़े किए गए और न कभी जाति के नाम पर वोट मांगे गए.

वोटों की जातिगत राजनीति

कानपुर में वोटरों की संख्य़ा 16 लाख से थोड़ी ज़्यादा है. ब्राह्मण वोटरों की संख्या छह लाख होने की वज़ह से कानपुर एक ब्राह्मण बाहुल्य क्षेत्र है. मुस्लिम वोटरों की संख्या क़रीब चार लाख और दलित और अन्य पिछड़े वर्ग के वोटरों की संख्या करीब दो लाख है.

चुनाव विषलेषक मनोज त्रिपाठी बताते हैं, "कानपुर हमेशा जातिगत राजनीति से ऊपर रहा है. एक समय कानपुर मिलों और मिल मज़दूरों की नगरी थी तो यहाँ से मज़दूर नेता जीतते थे."

वे कहते हैं, "ट्रेड यूनियन नेता सत्येन्द्र मोहन बनर्जी यहाँ से चार बार सांसद चुने गए. कानपुर ब्राह्मण बाहुल्य है पर यहाँ के पिछले तीन चुनाव जायसवाल जीते जो बनिया हैं."

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Image caption कुछ चुनाव विश्लेषक मानते हैं कि मोदी का मुद्दा होना जोशी के पक्ष में जाता है.

जायसवाल के चुनाव प्रचार की कमान संभाल रहे वरिष्ठ नेता शंकर दत्त मिश्र कहते हैँ, "कानपुर में सिर्फ़ उमीदवार की पृष्ठभूमि, उसकी काबिलियत देखी जाती है."

कानपुर के लिए नया क्या है?

कानपुर के वरिष्ठ पत्रकार महेश शर्मा कहते हैं, "कानपुर में चुनाव दो पार्टियों के बीच नहीं बल्कि दो शख्सियतों के बीच लड़ा जा रहा है.”

वे कहते हैं, “दोनों कद्दावर नेता हैं. एक तरफ हैं जायसवाल जो कानपुर के हैं, मिलनसार हैं, ज़मीनी मुद्दों की बात करते हैं, कानपुर में काम किया है.

तो वहीं दूसरी तरफ हैं जोशी जो एक राष्ट्रीय नेता हैं और सिर्फ़ राष्ट्रीय मुद्दों पर ही बात करते हैं पर वे कानपुर के लिए नए हैं और कानपुर उनके लिए नया है."

कानपुर में चुनाव 30 अप्रैल को हैं. देखना है कि वोटर जायसवाल को चौथी बार जीता कर उनका रिकॉर्ड सत्येन्द्र मोहन बनर्जी के बराबर करते हैं या फिर संसद में कानपुर का प्रतिनिधित्व जोशी जैसे एक राष्ट्रीय नेता को देते हैं.

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