बिहारी मज़दूर का सुख, पंजाबी किसान का दुख

पंजाब किसान

निर्मलजीत सिंह से मेरी मुलाक़ात जालंधर और होशियारपुर की सीमा पर एक गांव भंगुरनी में हुई. यह वही दोआबा का इलाक़ा है जिसके किसानों को हरितक्रांति का भूमिपुत्र कहा जाता था.

बुज़ुर्ग किसान निर्मलजीत हमसे मिलने अपनी साइकिल पर आए थे.

भंगुरनी होशियारपुर का गांव है, जहां निर्मलजीत कभी सात खेत यानी सात एकड़ ज़मीन के मालिक थे. आज उनके पास सिर्फ़ दो खेत बचे हैं.

वे ख़ुद नहीं जानते कि वे किसान हैं या खेत मज़दूर. उम्र के लिहाज़ से देखें तो उन्हें शारीरिक मेहनत की जगह आराम की ज़रूरत है, मगर वह ख़ुद मज़दूर की तरह काम करते हैं, तब जाकर उनके घर में दो वक़्त चूल्हा जल पाता है.

वो कहते हैं, ‘‘मज़दूरी बहुत महंगी है, खाद भी महंगी है. काम कराते हैं तो मज़दूर को देने के लिए हमारे पास पैसे नहीं होते. मज़दूर 200 रुपए दिहाड़ी मांगते हैं.''

वे बताते हैं, ''ये लोग बिहार और यूपी से आते हैं. हमारे गांव के लोग काम नहीं करते. पहले जो मज़दूर काम करते थे, वो सरकार की ग़लत स्कीमों की वजह से अब अपने सूबों में ही काम करने लगे हैं. वो यहां आकर हमारे खेतों में काम नहीं करना चाहते.''

'मनरेगा' की मुश्किल

हमने पूछा कि स्कीम से क्या उनका मतलब 'मनरेगा'(महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी योजना) से है?

निर्मलजीत बोले, ''हां जी. मनरेगा के कारण ज़्यादा मुश्किल है. सारे बंदे उधर ही रह जाते हैं. उनकी औरतें भी नहीं आतीं. किसी मज़दूर के परिवार में दो लोग हैं या फिर उनकी मां-बहन हैं, तो वो सभी स्कीम के काम में लग जाते हैं. बहुत दिक़्क़त है लेबर की.''

मज़दूरों पर निर्भरता कम करने की एक कोशिश निर्मलजीत ने की थी. उन्होंने लोन पर ट्रैक्टर लिया, मगर आढ़तिए का क़र्ज़ नहीं चुका पाए. आढ़तिए के लोग आए और उनका ट्रैक्टर उठा ले गए.

खेती की हालत और क़र्ज़ ने उन्हें बीमार कर दिया. निर्मलजीत अब डायबिटीज़ के मरीज़ हैं.

वे कहते हैं, ''बड़े ज़मींदार का तो काम चल जाता है. छोटे किसान की फ़सल मरेगी तो वो कहां जाए. जिसने क़र्ज़ ले लिया, वह कहां जाए.''

निर्मलजीत ही नहीं गांव के दूसरे किसानों के सामने सबसे बड़ी समस्या हर साल होने वाली मज़दूरों की किल्लत है, जो आसानी से मिलते नहीं, और मिलते हैं तो उनकी दिहाड़ी चुका पाना छोटे किसानों के लिए बेहद मुश्किल है.

सरकार से नाराज़गी

निर्मलजीत पूछते हैं, ‘‘ऐसे में हम किससे काम कराएं. कई बार तो हमें जो मिलता है उसे पकड़ लाते हैं. मगर कई बार मज़दूर मना कर देते हैं काम करने से.’’

क़र्ज़ के जंजाल में फंसे निर्मलजीत ने जैसे-तैसे अपनी दो लड़कियों की शादी कर दी है. खेती पर चढ़ा क़र्ज़ चुकाने के लिए उनका बेटा मैट्रिक के बाद पास के मेटियाना इलाक़े में एक फ़ैक्ट्री में काम करने लगा और क़रीब पांच हज़ार रुपए कमा लेता है.

खेती का रक़बा इतना कम है कि उसमें बेटे को खपाने के लिए गुंजाइश ही नहीं बची है.

वो कहते हैं, ‘‘फ़सल बोने और काटने के वक़्त चार-पांच मज़दूर चाहिए होते हैं. इनके लिए इनकम भी होनी चाहिए. इतनी उपज नहीं होती तो मज़दूरों का पैसा भी कहां से देंगे. फिर घर के बच्चों को काम में लगाओ. ऐसे में काम तो लेट होगा ही. बिजाई और रोपाई में भी देरी हो जाती है. फ़सल की कटाई के दौरान भी मज़दूर को बड़े ज़मींदार ले जाते हैं. हम छोटे किसान रह जाते हैं.’’

जैसे ही हम चुनाव और राजनीति की बात करते हैं, निर्मलजीत की नाराज़गी ज़ाहिर हो जाती है.

वो कहते हैं, ''बिजली तो माफ़ है पर तेल महंगा है, और चीजें महंगी हो गई हैं, टैक्स लगा दिए हैं. बिजली पांच-छह घंटे मिलती है, लेकिन किसान को दिन में बिजली चाहिए. यह फ़ैक्ट्री तो है नहीं. चाहे चार हो या छह घंटे, हमें वो दिन में बिजली दें. अब दिन में खेतों में काम करें और रात को पानी लगाने जाएं, तो सोएंगे कब?''

'पहले वो काम मांगते थे, अब हम बुलाते हैं’

निर्मलजीत अगर दो खेत के मालिक हैं तो जालंधर के पास संगवाल गांव के किसान मिजे सिंह के पास 16 खेत हैं यानी 16 एकड़. निर्मलजीत के मुक़ाबले कुछ संपन्न.

फिर भी मिजे सिंह और निर्मलजीत सिंह के बीच एक बात समान है. दोनों को खेती के लिए मज़दूर नहीं मिल रहे.

संगवाल गांव कई मायने में ऐतिहासिक गांव है. ग़दर आंदोलन के नेता करतार सिंह सराभा के साथी बंता सिंह संगवाल यहीं के रहने वाले थे, जिन्हें अंग्रेज़ों ने फांसी दे दी थी. गांव के दो लोगों अरुण सिंह और संता सिंह को उम्रक़ैद हुई थी.

इसके अलावा पंजाब का यह पहला गांव है, जहां की पंचायत ने 1914 में ऐलान किया था कि गांव का कोई केस अंग्रेज़ों की कचहरी में नहीं जाएगा. गांव के सभी केस पंचायत निपटाती थी.

मिजे सिंह कहते हैं, ‘‘पहले हम खेती करते थे, तो बिहार के मज़दूर आते थे. वो पूरे गांव में घूमते थे और पूछते थे हमको काम दो, काम दो. अब ज़माना पलट गया है. अब हम उनके पीछे-पीछे घूमते हैं कि हमारा काम कर दो. ऐसे में महंगाई तो बढ़ेगी ही.’’

मिजे सिंह भी मनरेगा के 'पीड़ित' हैं.

उन्होंने बताया कि जब कभी उनकी अपने पुराने खेत मज़दूरों से मुलाक़ात होती है तो उन्हें वो बताते हैं कि उन्हें उनके प्रदेश बिहार में ही काम मिल गया है. मिजे सिंह का कहना है कि इन मज़दूरों की शिकायत है कि यहां उतने दाम नहीं मिलते जितने वो अपने राज्य में कमा लेते हैं.

'अकालियों से कोई उम्मीद नहीं'

मनरेगा से सिर्फ़ 100 दिन काम की गारंटी मिलती है. उधर गेहूं और धान की बिजाई और कटाई के महीने भी तय हैं. अगर मज़दूर इन्हीं फ़सल के महीनों में मनरेगा का काम ले लेते हैं, तो वो पंजाब नहीं जाते और वहां के किसानों को मज़दूरों की किल्लत का सामना करना पड़ता है.

मिजे सिंह के मुताबिक़, ''जो मज़दूर हम 100 रुपए दिहाड़ी पर ख़रीदते थे, आज हमें ढाई सौ से तीन सौ रुपए में मिलते हैं, वह भी कभी-कभी नहीं मिलते. जब हमें काम की ज़रूरत होती है तो ज़्यादा पैसा देना पड़ता है. वो सारी ज़मींदार की कमाई है जो अब उसे नहीं मिलती.''

हमने पूछा, मौजूदा आम चुनाव में आपको सत्ताधारियों से क्या उम्मीद है? मिजे सिंह साफ़ कहते हैं कि ज़मींदारों का मसीहा बनने वाली अकाली-भाजपा सरकार ने उन जैसे किसानों के लिए कुछ नहीं किया है. उन्हें उससे कोई उम्मीद नहीं.

वे कहते हैं, ''सात साल से एक रुपए की मदद किसानों को नहीं की गई है. न उपज की सही क़ीमतें मिली हैं और न बोनस, जो कांग्रेस सरकार के दौरान मिला करता था. आज हम क़र्ज़ लेकर अपना जीवन निर्वाह कर रहे हैं. अंदर से खोखले हो चुके हैं. किसी के पास कोई पैसा नहीं.''

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