'सत्यमेव जयते लेकिन सवालिया निशान के साथ'

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अस्सी के दशक के मध्य में बाबरी मस्जिद को ढहाकर वहां एक मंदिर बनाने के आंदोलन ने ज़ोर पकड़ा था. इस आंदोलन को ज़ोर राजीव गांधी सरकार के उस फ़ैसले से मिला जिसके तहत साल 1949 से बंद मस्जिद के दरवाज़े खोलने का फैसला लिया गया.

इस ऐतिहासिक बहस में न जाते हुए जो बात ध्यान उस वक़्त खींच रही थी वो थी उस वक़्त सार्वजनिक रूप से इस्तेमाल की गई भाषा.

बाद में बाबरी मस्जिद को 'विवादित ढांचा' और फिर, राम जन्मभूमि कहा जाने लगा. 16वीं सदी की मस्जिद कुछ साल के लिए 20वीं सदी का विवाद बन गई और फिर 6 दिसंबर, 1992 को कुछ घंटों के लिए फिर से मस्जिद. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि पूरा प्रचार बाबरी मस्जिद को ढहाने के महत्व के इर्द-गिर्द केंद्रित था.

फिर उस मलबे को एक कामचलाऊ मंदिर में बदल दिया गया जिसका महत्व केवल यह था कि वह ठीक उतनी जगह घेरे जहां मस्जिद हुआ करती थी. आजकल उस जगह पर ढहाई गई मस्जिद के 'जिन्न' और बनने वाले मंदिर के सपने का कब्ज़ा है.

भाषा का खेल तब से जारी है. 1989-91 के दौरान कश्मीर घाटी के लाखों पंडितों को सांप्रदायिक वैमनस्य और हिंसा के चलते अपना घर छोड़कर भागना पड़ा. फिर भी आधिकारिक रूप से उन्हें 'प्रवासी' कहा जाता है, शरणार्थी या विस्थापित नहीं.

झूठा और बेतुका बयान

दो साल पहले एक प्रमुख अख़बार ने हिमालय में बांधों के निर्माण को नियंत्रित करने के पर्यावरण मंत्रालय के प्रयासों को "हरा आतंक" क़रार दिया था. लेकिन जब उत्तराखंड में आपदा आई, तो उसी अख़बार ने सरकार पर पर्यावरण मानकों का पालन न करने के लिए हमला बोल दिया.

इस दोहरे मानदंड की ओर ध्यान दिलाते मेरे संपादक के नाम पत्रों को प्रकाशित नहीं किया गया.

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लोकसभा चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों के प्रवक्ता और प्रत्याशी बहुत भड़काऊ बयान दे रहे हैं. बीजेपी के अमित शाह ने सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील सीट पर मतदाताओं से 'बदला लेने' की बात की थी. हालांकि इस बयान पर आपत्ति जताए जाने के बाद उन्होंने माफ़ी मांग ली.

आम आदमी पार्टी की शाज़िया इल्मी ने मुसलमानों से 'और सांप्रदायिक' होने का आह्वान किया था. बाद में उन्होंने कहा कि वह व्यंग्य कर रही थीं.

समाजवादी पार्टी के आज़म ख़ान ने सेना के बारे में टिप्पणी करते हुए धर्म को भी उसमें खींच लिया. एक कांग्रेस प्रत्याशी ने नरेंद्र मोदी के टुकड़े करने की धमकी दे दी. मुलायम सिंह यादव ने हाल ही में मायावती की वैवाहिक स्थिति का मज़ाक उड़ाया है.

हालांकि ग़ैरज़िम्मेदार बयानों के मामले में नरेंद्र मोदी, अपनी दृश्यता और स्थिति के लिहाज से, सबसे आगे हैं. 31 मार्च को एक भाषण में उन्होंने कहा कि असम सरकार बांग्लादेशियों के लिए जगह बनाने के लिए गैंडों को मार रही है. इससे पहले उन्होंने कहा था कि उनके प्रमुख विरोधी 'पाकिस्तान की मदद' कर रहे हैं.

मोदी की सबसे ताज़ा टिप्पणी चुनाव आयोग के उनके ख़िलाफ़ एफ़आईआर के आदेश पर आई है. उन्हें यह कहते हुए उद्धृत किया गया है, "अगर कोई चाक़ू, पिस्तौल और बंदूक ताने तो समझ आता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि मेरे ख़िलाफ़ एफ़आईआर क्यों दर्ज की गई? क्योंकि मैंने लोगों को कमल दिखाया."

यह बयान झूठा और बेतुका है. और इससे यह संदेश जाता है कि चुनाव आयोग दुर्भावनापूर्ण है.

जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 126 मतदान से 48 घंटे पहले किसी भी सार्वजनिक सभा पर पाबंदी लगाती है. कोई भी चुनाव से संबंधित बैठक नहीं कर सकता; या चुनाव संबंधी सामग्री का प्रदर्शन नहीं कर सकता चाहे वह कैमरे, टीवी या ऐसे ही किसी माध्यम से हो; या मतदान क्षेत्र में चुनाव सामग्री का प्रचार नहीं कर सकता जिससे लोगों का ध्यान खींचा जा सके.

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अपने चुनाव चिन्ह को टीवी कैमरों के आगे दिखाकर मोदी ने धारा 126 का उल्लंघन किया है. उनका यह कहना कि एफ़आईआर का मतलब तभी बनता है जब वह हथियार लहरा रहे हों या फिर बीजेपी का यह कहना कि यह कोई 'आधिकारिक बैठक नहीं थी'- सिर्फ़ क़ानून का मज़ाक है.

क्योंकि पूरे दृश्य का सीधा प्रसारण हो रहा था इसलिए किसी आधिकारिक बैठक की ज़रूरत नहीं थी और ऐसा करना चुनाव की निष्पक्षता को प्रभावित करता है.

युधिष्ठिर का झूठ

अब भी कुछ अख़बार यह जनमत सर्वेक्षण कर रहे हैं कि क्या मोदी को माफ़ी मांगनी चाहिए. इंसाफ़ के प्रति हमारा नया नज़रिया यह है कि माफ़ी मांगो और क़ानून को भूल जाओ.

हम में से कितने हमारे दिमाग़ों पर हो रहे इस हमले को समझते हैं. इसे कर रहा व्यक्ति दो काम कर रहा होता है. वह संवैधानिक क़ायदों को बनाए रखने के ज़िम्मेदार अधिकारियों को बता रहा होता है कि मूर्खता और शक्ति के संयोग से क़ानूनों को तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है.

यह संदेश अफ़सरशाही, पुलिस और न्यायपालिका को धमकाने के लिए तैयार किया जाता है. ये लोगों को अपने दिमाग़ बंद करने के लिए प्रेरित करता है- एक संदेश जो कहता है- 'तुम्हें कुछ सोचने की ज़रूरत नहीं है, बस अपनी आंखें बंद कर लो और मेरे पीछे चलो.' संक्षेप में इस तरह का व्यवहार मूर्खता और भय का इस्तेमाल करता है.

इस स्थिति को जर्मन लेखक एनज़ेन्सबर्गर दिमाग़ का औद्योगिकीकरण कहते हैं. दिमाग़ के उद्योग का मुख्य व्यापार अपना उत्पाद बेचना नहीं है; बल्कि मौजूदा स्थिति को 'बेचना है', ताकि आधिपत्य के वर्तमान ढांचे को जारी रखा जा सके, चाहे समाज को कोई भी चला रहा हो. इसका मुख्य काम आपके चैतन्य को इस तरह तैयार करना है ताकि शासक जैसा चाहे वैसा इसका इस्तेमाल कर सके.

शिक्षा के औद्योगिकीकरण के चरम पर पूरा ध्यान तकनीकी ज्ञान पर होता है न कि समझदारी पर. मास मीडिया के ज़रिए हमारी आंखों के सामने ही आम राय को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है- ख़ास ढंग से तैयार संदेशों और तस्वीरों के ज़रिए हमें ख़ास तरीके से सोचने पर मजबूर किया जा रहा है. सच, एक कल्पना बन जाता है जिसे कॉर्पोरेट फ़ायदों के लिए गढ़ा जाता है.

महाभारत के बाद के हिस्से में युधिष्ठिर अपने गुरु द्रोण को उनके बेटे अश्वत्थामा की मौत की झूठी ख़बर देते हैं. शोकग्रस्त द्रोण लड़ना बंद कर देते हैं और मारे जाते हैं. इस तरह, युधिष्ठिर जीत के लिए सच का ग़लत इस्तेमाल करते हैं.

हम इस पर विचार कर सकते हैं कि हमारे नाटक में कौन से पात्रों की पांडवों से तुलना की जा सकती है. लेकिन दिमाग़ पर नियंत्रण करने वाला समूह मुझे उस ख़ामोशी की याद दिलाता है जिसका सामना द्रौपदी को तब करना पड़ा था जब उसका चीरहरण किया जा रहा था और उसने पूछा था कि क्या यह कृत्य धर्म के अनुरूप है,

कोई भी जवाब न मिलने पर उसने कहा था.

ज्ञानी लोगों से विहीन राजसभा, राजसभा नहीं है.

ऐसे ज्ञानी जो धर्म की रक्षा नहीं करते, वह ज्ञानी नहीं हैं.

जो धर्म सत्यविहीन हो, वह धर्म नहीं है.

और जो सत्य छल से भेद दिया गया हो, वह सच नहीं है.

भारत आज सच के राजनीतिक समापन का सामना कर रहा है. झूठ बोलना भाषण कला का सामान्य तरीक़ा बन गया है. हमारे लोकतंत्र का प्रतीक 'सत्यमेव जयते' रहना चाहिए लेकिन अब इसके साथ एक प्रश्नचिह्न भी लगाना पड़ेगा.

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