सेल्फ़ी से क्यों हिचकिचाते हैं भारतीय राजनेता

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कहा जा रहा है कि भारत के इस चुनाव में पहली बार सोशल मीडिया और डीजिटल साधनों का इस्तेमाल इतने बड़े पैमाने पर हो रहा है. नेतागण ट्विटर फेसबुक का ख़ूब इस्तेमाल कर रहे हैं. रैलियों में जुटी लोगों की संख्या के साथ-साथ ट्विटर पर फ़ॉलोअर्स की संख्या पर भी ज़ोर है.

लेकिन आपने कितने भारतीय राजनेताओं को सोशल मीडिया के ताज़ा ट्रेंड सेल्फ़ी को आज़माते हुए देखा है?

शायद इक्का-दुक्का. हाँ नरेंद्र मोदी ने ज़रूर वोट डालने के बाद सेल्फ़ी पोस्ट की है जिसे कई बार रिट्विट किया जा चुका है. कुछ दिन पहले लेखक चेतन भगत के ट्विटर पर भी एक सेल्फ़ी देखी थी जिसमें वो नरेंद्र मोदी के साथ थे. पर इसे अपवाद कहा जा सकता है.

जबकि विदेशों में माजरा दूसरा ही है. पिछले साल ऑस्ट्रेलिया में हुए प्रधानमंत्री चुनाव की एक बड़ी सुर्खी वो थी जिसमें चुनावी बहस के बाद दोनों बड़े प्रतिदंद्वियों केविन रड और वर्तमान प्रधानमंत्री टोनी एबट ने वहाँ आई एक महिला के साथ सेल्फ़ी क्लिक की.

पाकिस्तान में बिलावल भुट्टो ज़रदारी भी कुछ दिनों पहले बच्चों की फ़ुटबॉल टीम के साथ सेल्फ़ी में नज़र आए तो खूब चर्चा हुई. जब कुछ महीने पहले ट्विटर पर उनसे पूछा गया था कि क्या उनकी जगह ट्विटर पर कोई और पोस्ट करता है तो जवाब में उन्होंने अपनी सेल्फ़ी पोस्ट करके भेजी.

सोचिए अगर राहुल गाँधी, नरेंद्र मोदी, लालू यादव, जयललिता,...ये सब नेता चुनावी दंगल की या किसी भी कार्यक्रम की सेल्फ़ी डालनी शुरु कर दें तो कैसी कैसी दिलचस्प फ़ोटो देखने को मिलेगी...रैलियों, सभाओं की पुरानी ढर्रे वाली तस्वीरों के बीच कुछ नया.

शायद अरविंद केजरीवाल उस सेल्फ़ी को ख़ूब पोस्ट कर सकते हैं जब चुनाव अभियान के दौरान कुछ विरोधियों ने उन पर स्याही छिड़क दी थी. हो सकता है ये विरोधियों पर ‘प्वाइंट स्कोरिंग’ करने का ज़रिया बन जाए!

टीवी पर पत्रकारों को दिलचस्प मुहावरे और कहावतें मुहैया करवाने वाले लालू यादव से सेल्फ़ी के इस्तेमाल के और बढ़िया आइडिया की उम्मीद की जा सकती है.

सेल्फ़ी से दूर रहते हैं भारतीय नेता

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राहुल गांधी अपने उन अचानक से किए गए दौरों के लिए जाने जाते हैं जो पहले से तय नहीं होते और जहां वे बिन बताए पहुँच जाते हैं.

कुछ साल पहले मोटरसाइकिल पर सवार होकर भोर में पुलिस को चकमा देकर राहुल गांधी भट्टा परसौल में किसानों के पास पहुँच गए थे. एक बार तो मेट्रो में भी सफ़र कर चुके हैं. अगर ये सारी सेल्फ़ी पोस्ट होतीं तो वायरल हो जाती.

लेकिन ज़्यादातर भारतीय नेता न चुनावों में और न ही रोज़मर्रा की ज़िंदगी में सेल्फ़ी का इस्तेमाल करते हैं.

सिंगापुर के प्रधानमंत्री @leehsienloong ली सीन लूंग तो अक्सर तरह तरह की सेल्फ़ी अपने अकाउंट पर डालते रहते हैं. पिछले साल श्रीलंका में राष्ट्रमंडल राष्ट्राध्यक्षों की बैठक थी तो तपाक से राष्ट्रपति ली ने मलेशिया के राष्ट्रपति के साथ हँसती हुई सेल्फ़ी पोस्ट कर डाली और ये तस्वीर सिंगापुर और मलेशिया के अख़बारों में खूब छाई रही.

यूरोपीय नेता अपने परिवार, राजनीति, रोज़ाना की ज़िंदगी, कामकाज के बारे में ख़ुद ही ली गई तस्वीरें ख़ूब पोस्ट करते हैं. 2012 में लंदन ओलंपिक की एक वोलन्टियर के साथ सेल्फ़ी लेने में ब्रितानी प्रधानमंत्री डेविड कैमरन को कोई हिचकिचाहट नहीं हुई.

ब्रितानी प्रधानमंत्री की वो सेल्फ़ी भी ख़ूब चर्चा में रही थी जो उन्होंने यूक्रेन संकट पर बराक ओबामा से फ़ोन पर बात करते हुए गंभीर मुद्रा में खींची थी. जो बाइडन, हिलेरी क्लिंटन ...सेल्फ़ी वाले नेताओं की लिस्ट लंबी है. और तो और पोप भी सेल्फ़ी लेने वालों की फेहरिस्त में शामिल हो गए हैं.

सेल्फ़िएस्ट सिटी ऑफ़ द वर्ल्ड

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टाइम पत्रिका ने पिछले महीने एक लिस्ट निकाली है जिसमें उन शहरों का ज़िक्र है जहाँ सबसे ज़्यादा सेल्फ़ी ली जाती है - ‘सेल्फ़िएस्ट सिटी ऑफ़ द वर्ल्ड’.

भारत के शहर भी इस मामले में काफ़ी पीछे हैं. नई दिल्ली का रैंक 131 है - प्रति एक लाख लोगों में 25 सेल्फ़ी लेने वाले हैं, चंडीगढ़ में तीन लोग और बंगलूर में प्रति एक लाख लोगों के पीछे एक सेल्फ़ी.

तकनीकी रूप से ज़्यादा विकसित होने के साथ-साथ ये शायद संस्कृतियों का भी फ़र्क है. पश्चिमी देशों में चुनावी प्रचार की तासीर भारत जैसे देश से काफ़ी अलग होती है. नेताओं की छवि और काम काज का तरीका भी भारत में जुदा है. अभी सेल्फ़ी को अपनाने में शायद भारतीय नेताओं को थोड़ा वक़्त लगेगा.

वैसे एक ज़माना था जब ट्विटर पर शशि थरूर जैसे इक्का दुक्के नेता ही थे. देखते देखते नेताओं ने जनता से जुड़ने के लिए फ़ेसबुक, टविटर, गूगल हैंगआउट के दरबार में हाज़िरी लगाई.

ये पहला आम चुनाव है जब इंटरनेट और सोशल मीडिया भी चुनाव भी भूमिका निभा रहा है. क्या पता अगले चुनाव तक सेल्फ़ी भी ‘चुनावी हथियारों’ की लिस्ट में शामिल हो जाए. और ये जानना भी दिलचस्प होगा कि जनता जनार्धन नेताओं को इस रूप को पचा पाती है या नहीं.

तब तक कल्पना कीजिए कैसी होगी आपके नेता की सेल्फ़ी ! यहाँ ये ख्याल मन में ज़रूर आता है कि अगर महात्मा गाँधी, जवाहर लाल नेहरू, जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी के ज़माने में सेल्फ़ी होती तो क्या वे इसे अपनाते और अगर अपनाते तो कैसी-कैसी तस्वीरें निकल कर आतीं!

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ख़ैर ये तो हुई हवाई बातें, वास्तविकता ये है कि भारतीय नेता अभी सेल्फ़ी नाम की इस बला से ज़रा दूरी ही बनाए हुए हैं. आख़िर ये सेल्फ़ी किसी दोधारी तलवार से कम नहीं है - मंडेला की स्मृति सभा में ली गई इसी सेल्फ़ी की वजह से ओबामा, कैमरन और डेनमार्क की प्रधानमंत्री को ख़ूब ताने सुनने पड़े थे.

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