गुर्जर युवक की हत्या पर दलितों का स्कूल ध्वस्त

कनावनी गाँव

चारों ओर खड़ी ऊँची रिहायशी इमारतों की परछाईं में बसा है मोहीउद्दीनपुर कनावनी गाँव. गाँव में घुसते ही पहला सामना बड़ी-बड़ी गाड़ियों की कत़ार से होता है.

अगले कुछ पलों में हथियारबंद पुलिसवालों की भारी मौजूदगी 'तनावग्रस्त शांति' का अहसास कराती है. गाँव के मुहाने पर ही उस युवक का घर है जिसकी बीते मंगलवार संपत्ति विवाद को लेकर हुई हिंसा में मौत हो गई थी.

बंगलेनुमा घर के बड़े आँगन में संवेदना व्यक्त करने पहुँचे गुर्जर समुदाय के लोग जुटे थे. आँगन में ही ऑडी, फॉर्च्यूनर, एंडेवर जैसी गाड़ियाँ परिवार की आर्थिक संपन्नता का प्रमाण दे रहीं थी. पीछे घर से रह-रहकर आ रही महिलाओं के विलाप की आवाज़ों ने माहौल को और ग़मगीन बना दिया था.

घटना के बारे में पूछने पर मृतक राहुल के भाई ने बताया, "अभी गाँव की प्रधानी हमारे परिवार के पास है. पहले यह जाटवों के पास थी. उस दौरान उन्होंने कुछ सरकारी ज़मीन पर अवैध क़ब्ज़ा कर लिया था जिसके ख़िलाफ़ मृतक के पिता ने हाईकोर्ट में केस किया था. तब से ही रंजिश थी जिसमें हमारे भाई की हत्या कर दी गई."

कुछ लोगों का यह भी कहना था कि हिंसा मृतक के घर के पास ही स्थित 70 ग़ज़ ज़मीन को लेकर हुए विवाद से हुई हैं. हालाँकि मृतक का परिवार इस बात को नकारते हुए कहता है कि रंजिश सरकारी ज़मीन पर क़ब्ज़े को लेकर है.

मृतक के पिता सत्यवीर घटना के दिन को याद करते हुए कहते हैं, "हमने विवाद होते ही सौ नंबर पर फ़ोन किया था. लेकिन फ़ोन ग़ाज़ियाबाद में लग गया जबकि हमारा इलाक़ा नोएडा में आता है. हमने संबंधित थाने के इंस्पेक्टर को फ़ोन किया तो कहा गया कि वे अभी बाहर हैं. पुलिस क़रीब एक घंटे बाद पहुँची, तब तक मेरे बेटे की जान जा चुकी थी."

हत्या के मामले में पुलिस ने फ़िलहाल तीन लोगों को हिरासत में लिया है और बाक़ी नामज़द अभियुक्तों की तलाश जारी है.

जिस युवक राहुल की मौत हुई है वह गुर्जर समुदाय से है और हत्या का आरोप दलितों पर है. 23 वर्षीय राहुल की मौत के बाद गुर्जर समुदाय ने कुछ दलित परिवारों के घरों पर हमला किया था और वाहनों में तोड़फोड़ की थी. कुछ दलित परिवारों ने बदले की हिंसा के डर से गाँव छोड़ दिया है. दलितों के किराएदार भी मकान छोड़ गए हैं.

हालाँकि प्रशासन और नेता दलितों के पलायन की बात को नकारते हैं. गाँव के दौरे पर गए स्थानीय विधायक नरेंद्र भाटी कहते हैं, "ऐसा महसूस हो रहा है कि कुछ लोग दोनों पक्षों के बीच विवाद को हवा देने की कोशिश कर रहे हैं. पलायन जैसा कुछ नहीं है. जो मीडिया छाप रहा है वैसा नहीं है. दोनों पक्षों को साथ बिठाकर शांति स्थापित करने की कोशिश की जाएगी."

दलितों के कुछ मकान और गाड़ियाँ तोड़फोड़ की गवाही दे रहे हैं तो कई घरों पर अब भी ताले लगे हैं. अपने घर में दादी के साथ अकेली रह रही एक दलित युवती ने कहा, "गाँव में ख़ौफ़ और सन्नाटा है. कोई बाहर भी नहीं जा सकता है. लेकिन अभी पुलिस है तो थोड़ा डर कम है. वे कहते हैं कि पुलिस कब तक गाँव में रहेगी. जब पुलिस नहीं होगी तब कौन बचाएगा."

दिल्ली से क़रीब बीस किलोमीटर और राष्ट्रीय राजमार्ग 24 से क़रीब एक किलोमीटर दूर बसे इस गाँव की आबादी पाँच हज़ार से ज़्यादा है. गाँव में थोड़ा और आगे बढ़ने पर गंदे पानी से भरी बेहद ख़राब सड़क है जिसे पैदल पार करना नामुमकिन सा है. जिस गाँव के हर घर में गाड़ी खड़ी हो वहाँ इतनी ख़राब सड़क देखकर आश्चर्य होता है.

गाँव के दूसरे छोर पर बने दलित समुदाय के एक स्कूल को भी बुलडोज़र चढ़ाकर ज़मींदोज़ कर दिया गया. जहाँ स्कूल था वहाँ अब मलबा है. सलामत बची एक दीवार पर अंबेडकर और गौतम बुद्ध की तस्वीरें हैं. पास ही कुछ सिपाही पहरा दे रहे हैं. यहाँ मौजूद लोगों में डर का माहौल है.

स्कूल के मुंशी बताते हैं, "उस रात क़रीब 11 बजे हथियारबंद लोगों ने आकर पहले हमारे मोबाइल फ़ोनों की बैटरी निकाल ली और फिर स्कूल और घर पर बुलडोज़र चढ़ा दिया. हथियार दिखाकर उन्होंने ख़ामोश रहने के लिए कहा लेकिन किसी के साथ मारपीट नहीं की. हमलावरों ने किरायदारों को भी धमकी दी जिससे डरकर वे घर छोड़कर चले गए."

तोड़े गए सिद्धार्थ पब्लिक स्कूल में क़रीब डेढ़ सौ छात्रों की पढ़ाई बंद हो गई है. एक बुजुर्ग महिला कहती है, "छोटे-छोटे बच्चे हैं ये पढ़ने कैसे जाएंगे. इनमें दहशत इतनी बैठा रखी है स्कूल पर हमला करके कि ये पढ़ने नहीं जा सकते."

कनावनी गाँव के चारों तरफ़ ऊँची रिहायशी इमारतें हैं. बीते कुछ सालों में अस्तित्व में आई इन इमारतों ने यहाँ ज़मीन के दाम आसमान पर पहुँचा दिए हैं. इस इलाक़े में पिछले कुछ सालों में ज़मीन की क़ीमतें इतनी बढ़ीं हैं कि इंसानी ज़िंदगी सस्ती सी हो गई है.

यहाँ एक गज़ ज़मीन की क़ीमत बीस हज़ार रुपए से अधिक है. शायद इस महंगी ज़मीन ने ही आपस में मिलजुलकर रहने वाले गाँववालों को एक दूसरे का दुश्मन बना दिया है. गाँव की बुज़ुर्ग महिला कहती हैं, "इंसान मर जाए उसका कुछ नहीं है. बस उन्हें ज़मीन चाहिए. कैसे भी ज़मीन हड़प लो."

मैं जब गाँव से निकलता हूँ तो दो महीने पहले दूल्हा बने युवक की मौत का मातम कर रही महिलाओं की आवाज़ ऐसे ही गुम हो जाती है जैसे महंगी ज़मीन पर बनी ऊँची रिहायशी इमारतों के साए में मोहीउद्दीनपुर कनावनी गाँव और उसका भाईचारा गुम सा हो गया है.

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