चाय की चुस्की पर मोदी और गांधी परिवार की बात

  • 5 मई 2014
चुनावी रैली Image copyright AP

भारत में चाय की दुकानों पर अक्सर लोग स्थानीय राजनीति पर चर्चा करने के लिए इकट्ठा होते हैं. देश में जब आम चुनाव हो रहे हैं तो चुनाव की चर्चा होना तय है.

भारतीय जनता पार्टी को उम्मीद है कि क़रीब पांच हफ़्ते तक चले मतदान के नतीजे जब 16 मई को घोषित होंगे तब उसके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनेंगे. उन्हें इस बात का गर्व है कि उन्होंने एक चाय की दुकान पर काम कर अपनी ज़िंदगी की शुरुआत की थी और संभव है कि उनमें वहीं से राजनीति की समझ पैदा हुई होगी.

(क्या दलित वोटरों को लुभा पाएगी भाजपा?)

इस वजह से मैंने उत्तर प्रदेश के मध्य इलाके के चार चुनाव क्षेत्रों की चाय की दुकानों का जायज़ा लेने की कोशिश की जहां अभी मतदान होना है. सबसे ज़्यादा आबादी वाले इस राज्य में 20 करोड़ से ज़्यादा लोग रहते हैं. इस प्रदेश में मतदान के रुझान से चुनाव के परिणाम तय हो सकते हैं.

मैंने जिस इलाक़े को चुना था उसी क्षेत्र से नरेंद्र मोदी के दो प्रमुख प्रतिद्वंद्वी चुनाव लड़ रहे हैं. ये प्रतिद्वंद्वी हैं, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके बेटे राहुल गांधी.

मैं इन दोनों नेताओं के लोकसभा क्षेत्र में जाने से जानबूझकर बचा क्योंकि ये दोनों सीटें फ़िलहाल प्रदेश में जो राजनीतिक माहौल है उसका प्रतिनिधित्व नहीं करतीं. मैंने राज्य की राजधानी लखनऊ से बाहर ग्रामीण इलाक़ों का रुख़ किया जहां अब भी भारत की बड़ी आबादी रहती है.

मोदी बनाम गांधी

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इस इलाक़े में क्षेत्रीय दलों की मौजूदगी भी है लेकिन मीडिया उन पर ध्यान नहीं देता. मीडिया की सुर्ख़ियों में एक तरफ़ गांधी परिवार है और दूसरी तरफ़ नरेंद्र मोदी है. मीडिया के जनमत सर्वेक्षणों में मोदी को चुनावी मुक़ाबले में आगे दिखाया जा रहा है. कई टिप्पणीकारों ने तो उनको पहले ही भविष्य का प्रधानमंत्री घोषित कर दिया है और मीडिया भी 'मोदी लहर' की बात करता है.

(भारत का सबसे महँगा चुनाव?)

भाजपा के लिए मोदी 'एक' मुद्दा हैं. वे 'मोदी सरकार' की बात करते हैं और उनका दावा है कि वह आख़िरकार देश की कुख्यात भ्रष्ट और सुस्त व्यवस्था को बदलेंगे और देश का विकास तेज़ी से करेंगे.

मोदी देश के पश्चिमी राज्य गुजरात के मुख्यमंत्री हैं. कांग्रेस का दावा है कि राज्य में उनके कार्यकाल में हुए मुस्लिम विरोधी दंगों में उनकी भूमिका थी. हालांकि वह इन आरोपों को हमेशा नकारते रहे हैं.

मोदी का हिंदू राष्ट्रवादी समूह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के साथ एक गहरा रिश्ता है. गांधी परिवार का कहना है कि वह भारत की एकता के लिए उपयुक्त साबित नहीं होंगे क्योंकि उन्होंने देश के अल्पसंख्यकों ख़ासतौर पर मुसलमानों के प्रति नफ़रत को बढ़ाया है.

बाराबंकी संसदीय क्षेत्र में मेरे पहले चाय के ढाबे के पड़ाव में मुझे यह अंदाज़ा हुआ कि ग्रामीण इलाक़े में मोदी या गांधी परिवार अहम नहीं हैं बल्कि ग्रामीण भारत की अपनी पारंपरिक चिंताएं हैं जो जाति, उम्मीदवार और धर्म से जुड़ी हैं.

मिट्टी के कुल्हड़ में गर्म मीठी चाय पी रहे लोग विकास की बात तो ज़रूर कर रहे थे लेकिन उनकी बातों में मोदी का ज़िक्र नहीं था.

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उनकी चर्चा में विकास की जो बात हो रही थी उनमें वहां के मौजूदा कांग्रेस सांसद का ज़िक्र था जिन्होंने एक रेलवे क्रॉसिंग पर पुल बनाया है और गांवों का विद्युतीकरण कराया है. उस चर्चा में इस बात पर सहमति बनी कि इन वजहों से वह दोबारा सांसद चुने जा सकते हैं.

तो एक निर्वाचन क्षेत्र में एक उम्मीदवार के लिए सकारात्मक रुझान है जो उस पार्टी की जीत में भी योगदान दे सकते हैं जिसका चुनावी भविष्य लोग अच्छा नहीं मान रहे.

लेकिन मोहनलालगंज निर्वाचन क्षेत्र की एक चाय की दुकान में कांग्रेस के प्रत्याशी की हालत इतनी ख़राब थी चाय पीने वाले उनके नाम पर सहमत हो सकें, उससे पहले कुछ चर्चा होनी ज़रूरी थी.

(किसका पलड़ा भारी?)

उसी चाय की दुकान में मैंने यह पूछा कि नेहरू-गांधी परिवार की वफ़ादारी की अपील क्या अब भी प्रभावकारी है. इस पर एक ग्राहक ने दो टूक जवाब दिया, "वे अपने निर्वाचन क्षेत्र में जाने के लिए कई बार इस सड़क से गुज़रे हैं लेकिन वे हमारा हालचाल जानने के लिए कभी नहीं रुके."

जब मैंने मोदी के बारे में पूछा तब एक युवा ने अपनी आवाज़ बुलंद की, "उनका हमसे क्या लेना-देना है. वे यहां से चुनाव नहीं लड़ने जा रहे हैं."

वहीं एक शख्स ने बेहद उत्साहित और गर्व से भरे लहजे में कहा कि उन्हें मोदी का टेलीफोन कॉल आया था जो भाजपा के इलेक्ट्रॉनिक चुनाव अभियान का एक हिस्सा है.

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जब उनसे यह पूछा गया कि वह जिस तरह से मतदान करते हैं आए हैं क्या मोदी के कॉल से उस पर कोई असर पड़ेगा तब उन्होंने 'ना' में जवाब दिया.

हिंदू-मुसलमान का मसला नहीं

फ़ैज़ाबाद संसदीय क्षेत्र की एक चाय दुकान पर मुझे भाजपा कार्यकर्ताओं का एक समूह मिला जो एक सफल रैली का जश्न मना रहे थे. उन्होंने कहा कि उन्हें मोदी और केवल विकास के वादे का प्रचार करने का निर्देश दिया गया था, धार्मिक मुद्दों पर प्रचार की सख़्त मनाही है.

दूसरी चाय की दुकानों में मौजूद ग्राहकों का कहना था कि भाजपा के चुनाव प्रचारकों ने हिंदू-मुसलमान से जुड़ा कोई मुद्दा नहीं उठाया था.

इसी वजह से मुझे ऐसे किसी ख़तरे का अहसास नहीं हुआ जो मोदी की छवि से जुड़ा हुआ है और जिसकी बात गांधी परिवार से जुड़े लोग करते हैं.

इस दौरे पर मेरे साथ मौजूद सहयोगी राज्य में पूर्व बीबीसी संवाददाता रामदत्त त्रिपाठी का कहना है कि भाजपा का चुनावी अभियान अब भी पार्टी के कट्टर हिंदू समर्थकों को काफी आकर्षित करता है.

आरएसएस के साथ अपने लंबे जुड़ाव की वजह से मोदी लोगों को लुभाते हुए दिखते हैं. इसके अलावा उन्होंने हिंदुओं के पवित्र शहर वाराणसी से चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया और अपने नामांकन भाषण में उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसा महसूस होता है जैसे वह पवित्र नदी गंगा मां की संतान हों.

मैंने जितने लोगों से बातचीत की उससे यह स्पष्ट हुआ कि हिंदू मत जाति के आधार पर विभाजित होंगे. इससे दो क्षेत्रीय दलों की स्थिति मज़बूत होनी चाहिए जो विशेष रूप से कुछ ख़ास जातियों के समर्थन पर निर्भर करते हैं.

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वहीं यह भी अंदाज़ा हुआ कि मुसलमान उन उम्मीदवारों को वोट दे सकते हैं जिनके बारे में उन्हें सबसे ज़्यादा भरोसा हो कि वे भाजपा को हरा सकते हैं.

जब मैं उन्नाव संसदीय क्षेत्र में आया जहां मेरे दौरे की आख़िरी चाय की दुकान थी वहां स्थानीय भाजपा प्रमुख बच्चा बाजपेयी में जाति, उम्मीदवार और धर्म के सभी तर्क एक साथ जुड़ते हुए दिखे.

उन्होंने नारंगी रंग की लुंगी पहनी हुई थी जो उनकी पार्टी और उनके हिंदू धर्म के रंग से जुड़ी है. एक बड़ी कड़ाही में से गर्मागर्म समोसे निकालते हुए वह कहते हैं, "यहां के उम्मीदवार साक्षी महाराज मुश्किल खड़ी कर रहे हैं. वह कह रहे हैं कि मुझे आख़िर चुनाव क्यों लड़ना चाहिए, मैं एक साधु हूं. यह मोदी का चुनाव है, मेरा नहीं."

जब मैंने उनसे पूछा कि क्या वहां कोई 'मोदी लहर' है तब उन्होंने जवाब दिया, "मोदी की लहर है लेकिन समस्या जाति से जुड़ी है."

भाजपा को उम्मीद है कि 'मोदी लहर' से जाति मतभेद दूर होंगे और हिंदू मत एकजुट होंगे.

हालांकि लगता नहीं कि उत्तर प्रदेश में ऐसा कुछ हुआ है लेकिन हमें चुनाव के नतीजों का इंतज़ार करना पड़ेगा ताकि यह अंदाज़ा मिल सके कि चाय की चुस्की के साथ मैंने कितनी सही बातें भांपने में कामयाबी हासिल की.

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