'ज़मीन तो अच्छी है पर क्या मिट्टी खाऊँ'

  • 5 मई 2014
 नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार Image copyright AFP AP

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, दोनों को ही उनके समर्थक 'विकास पुरुष' के तौर पर पेश करते हैं. इस आम चुनाव में दोनों अपने-अपने विकास मॉडल के साथ खड़े हैं.

एक ओर जहाँ नरेंद्र मोदी के विकास मॉडल की चर्चा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर है और आम तौर पर युवा उसकी तारीफ़ करते दिख जाएँगे वहीं नीतीश के विकास मॉडल को भी मीडिया में काफ़ी जगह मिली है.

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ऐसे में बिहार में बीबीसी कैंपस हैंगआउट की चर्चा का विषय भी था- 'बिहार को क्या चाहिए: नीतीश का मॉडल या मोदी का मॉडल.'

मोदी के विकास मॉडल में जहाँ औद्योगीकरण और महिलाओं को सुरक्षा की चर्चा प्रमुखता से होती है तो वहीं नीतीश के मॉडल में सभी वर्गों के विकास का नारा है.

बिहार में मुज़फ़्फ़रपुर के बाबा साहब भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं के लिए इन दोनों मॉडलों पर बहस का मौक़ा था. उन्होंने इसका बख़ूबी इस्तेमाल भी किया.

'मिट्टी खाकर जीएँगे?'

पूरी चर्चा में सर्वसम्मत तो नहीं मगर बहुमत तीन बातों पर स्पष्ट था. एक- राज्य में शिक्षा की स्थिति पर चिंता, दूसरी बात ये कि युवा गुजरात के विकास से प्रभावित थे और तीसरी ये कि नीतीश का पिछले 10 साल में किया गया काम दिख रहा है.

मगर कुछ युवाओं के तल्ख़ तेवर भी सामने आए. चर्चा में जब ए एन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ के निदेशक डी एम दिवाकर ने बिहार में उपजाऊ ज़मीन, मीठे पानी और उर्वर मस्तिष्क का ज़िक्र किया तो सदानंद झा की नाराज़गी फूट पड़ी.

सदानंद बोले, "बिहार में बेरोज़गारी है. यहाँ ज़मीन तो अच्छी है मगर मैं क्या मिट्टी खाऊँगा? मिट्टी में उपजाने के लिए पानी चाहिए, खाद चाहिए. यहाँ सिंचाई की व्यवस्था नहीं है, उद्योग-धंधे नहीं हैं तो क्या हम मिट्टी खाकर ज़िंदा रहेंगे?"

दिवाकर उनकी इस बात से सहमत थे कि राज्य में खेती के विकास के उपाय नहीं हुए हैं.

सदानंद का ग़ुस्सा अभी ठंडा नहीं हुआ था कि राज्य में बिजली की स्थिति की बात होने लगी. इस मुद्दे पर उनका कहना था, "हम जिस गाँव में रहते हैं वहाँ बिजली आज तक मयस्सर नहीं हुई है मगर बोर्ड ज़रूर लग गया कि इस गाँव का विद्युतीकरण हो गया है. क्या ख़ाली बोर्ड से बिजली मिल जाएगी गाँव को?"

नीतीश से प्रभावित

मगर ऋचा नीतीश के काम से प्रभावित थीं. उन्होंने कहा, "राज्य का 15 साल में जो रूप बिगड़ा था, उसे नीतीश कुमार ने 10 साल में सुधारा है. सड़कों पर जो काम हुआ है क्या हम उसे भूल सकते हैं? शिक्षा के मामले में मुझे नहीं लगता कि किसी अन्य राज्य में इतने सारे लोगों को काम दिया गया है."

उनका दावा था, "अगर बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिल जाए तो हम वो कर पाएँगे जो नरेंद्र मोदी तीन बार के शासन में नहीं कर सके."

लगभग हर युवा शिक्षा की चर्चा ज़रूर कर रहा था. प्रकाश कुमार ने कहा, "बिहार में विकास की लहर की बात हो रही है मगर बिहार में विकास के लिए हुआ क्या है? शिक्षकों की बहाली 5000-6000 रुपए पर हो रही है. क्या इस वेतन पर गुज़ारा हो सकता है?"

प्रकाश ने शिक्षकों की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा, "ऐसे शिक्षकों की बहाली हो रही है जिन्हें क से ज्ञ तक भी नहीं आता."

शिक्षा पर चिंता

अविनाश सिंह का कहना था कि बिहार में लोग शिक्षक बनना नहीं चाह रहे हैं, जो कि ठीक नहीं है. अविनाश ने कहा, "हमारे यहाँ लोग शिक्षक बनना नहीं चाहते. अच्छे लोग बिहार से बाहर चले गए. वहाँ जाकर शिक्षित हुए मगर लौटे नहीं. वे 'अर्थ' से जुड़े रहना ज़्यादा पसंद करते हैं."

चंद्रप्रकाश ने भी लोगों के बाहर जाने के मसले पर बात की. बोले, "हर साल हज़ारों छात्र बिहार से बाहर पढ़ने के लिए जाते हैं. यहाँ पर कभी शिक्षक नहीं होगा तो कभी प्रयोगशाला नहीं होगी. अगर राज्य में ही अच्छी व्यवस्था हो तो हम बाहर क्यों जाएँगे? बेहतर भविष्य के लिए बाहर जाना मजबूरी है."

Image caption इस चर्चा का संचालन किया बीबीसी संवाददाता मोहन लाल शर्मा ने.

अनु सिंह ने भी कहा कि उन्हें राज्य में अगर विकल्प नहीं मिले तो वह बाहर जाना पसंद करेंगी. अनु का कहना था, "अगर मुझे दूसरे राज्यों में बेहतर विकल्प मिले तो मैं ज़रूर चली जाऊँगी."

'शिलान्यास मॉडल'

मुकेश कुमार चाहते हैं कि बिहार में गुजरात मॉडल की अच्छी बातें ली जानी चाहिए. मुकेश ने कहा, "नीतीश कुमार के राज में हर गली-चौराहे पर शराब की दुकान खुल गई हैं. उसे रोकना होगा. गुजरात में औद्योगीकरण पर ज़ोर है, उसे अपनाना चाहिए."

अंत में रोशन कुमार ने एक चुभती हुई बात कही जिसने ज़्यादातर युवाओं की टीस उजागर की. रोशन ने कहा, "यहाँ पर रोज़गार मिलने में दो-तीन साल लग जाते हैं. ये मॉडल सिर्फ़ शिलान्यासों का मॉडल बन गया है. किसी जगह बोर्ड लग गया, शिलान्यास हो गया तो बस बात वहीं ख़त्म हो जाती है."

हर राज्य की तरह यहाँ भी युवा अपने अधिकारों और शिक्षा को लेकर चिंतित भी हैं और जागरूक भी और उनके यही सरोकार शायद उनके मतदान में झलकने वाले हैं.

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