करोड़पति की ज़िंदगी में भी 'कसक' है

  • 7 मई 2014
सुशील कुमार केबीसी विजेता

अमिताभ बच्चन के क्विज़ शो 'कौन बनेगा करोड़पति' में पांच करोड़ रुपए का इनाम जीतने वाले सुशील ने आज तक कार नहीं खरीदी, बिग बॉस में शामिल होने और चुनाव लड़ने से भी इनकार कर दिया.

पटना से लगभग 170 किलोमीटर दूर मोतिहारी में तीन साल पहले तब ख़ुशी की लहर दौड़ गई थी, जब सुशील कुमार ने ‘कौन बनेगा करोड़पति’ में जैकपॉट जीता था.

रातों-रात सुशील कुमार और उनके साथ-साथ मोतिहारी भी दुनिया भर में सुर्खियों में आ गया था.

चुनाव के इस मौसम में सुशील के लिए लोकतंत्र के मायने क्या हैं? करोड़पति बनने के बाद उनकी ज़िंदगी में क्या बदलाव आए हैं? कुछ ऐसे ही सवालों के जवाब जानने के लिए मैं उनसे मिलने मोतिहारी पहुंचा.

आम आदमी

मोतिहारी में फ़ोन पर संपर्क करने पर सुशील ने बताया कि वे घर पर नहीं हैं. इसके बाद मुझसे मिलने के लिए वो ख़ुद ही शहर के हेनरी बाज़ार इलाक़े में पहुंचे.

हल्के रंग की धारीदार कमीज़ और जींस पहने सुशील स्कूटर से आए थे. पांच करोड़ रुपए के मालिक का कार से नहीं चलना उत्सुकता पैदा करने वाला था. ख़ासतौर पर एक ऐसे भारतीय समाज में जहां पैसा आते ही घर में कार आ जाती है. घर में रखने की जगह न हो तो सड़कों पर, गलियों में पार्क की जाती है.

ऐसे में सुशील से हमारा पहला सवाल यही था कि क्या वे 'बे-कार' हैं. तो सुशील ने बताया कि स्कूटी भी उन्होंने 2013 में ही ख़रीदी है, वह भी दोस्तों और घरवालों के बहुत दबाव बनाने पर. केबीसी का जैकपॉट जीतने के बाद भी वे कई महीने साइकिल पर ही शहर नापा करते थे.

चुनाव के मौसम में लगभग सभी दल कई सीटों पर पुराने नेताओं-कार्यकर्ताओं को टिकट देने के बदले जिताऊ चेहरों को मौक़ा दे रहे हैं.

मशहूर होने के बाद सुशील के लिए भी यह पहला चुनाव है. सुशील ने बताया कि आम आदमी पार्टी ने उनसे मोतिहारी से लोकसभा चुनाव लड़ने का आग्रह किया था. इसके बाद वे पार्टी के नेताओं से मिले भी, लेकिन अंततः घर वालों और मित्रों की सलाह पर उन्होंने इनकार कर दिया.

नाम ही काफ़ी

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सुशील आजकल सुर्खियों में नहीं हैं जबकि 2011 में वे कई महीने लगातार चर्चा में बने रहे थे. सुशील बताते हैं कि लोकप्रियता का आलम यह था कि विदेशों से ऐसे पत्र आते थे जिन पर पते की जगह लिखा था, ‘सुशील कुमार, केबीसी विनर, इंडिया’ और चिट्ठी मिल जाया करती थी.

केबीसी का जैकपॉट जीतने के बाद वे महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोज़गार सुरक्षा क़ानून यानी मनरेगा के ब्रांड एंबेसडर बने. सुशील ने जब क्विज़ शो जीता था, तब वे मनरेगा योजना चलाने वाले विभाग में मामूली नौकरी कर रहे थे.

साथ ही दिसंबर 2011 में एक दिन के लिए क्षेत्रीय अखबार प्रभात ख़बर के अतिथि संपादक भी बने. इसी दौरान उन्होंने बिग बॉस में शामिल होने से इनकार किया.

2012 में वे डांस शो 'झलक दिखला जा' का हिस्सा बने.

सुर्ख़ियों से परे ज़िंदगी

सुशील कहते हैं, ''सिर्फ़ चर्चा में बने रहने के लिए बयानबाज़ी करना या कुछ भी कर गुज़रना मेरी फ़ितरत नहीं है, लेकिन चर्चा में नहीं रहते हैं, तो कुछ कमी सी भी महसूस होती है.''

सुशील अब ख़ुद को इस बात से तसल्ली दे लेते हैं कि अब वे जहां जाते हैं, उनकी बात सुनी जाती है, उनके विचारों को समाज में महत्व मिलता है.

क्या करोड़पति बनने से उनके सपने पूरे हो गए? इस सवाल के जवाब में सुशील कहते हैं कि पैसों से उनकी ज़रूरतें तो पूरी हो गई हैं, जीवन आर्थिक मोर्चे पर निश्चिंत हो गया है.

अब मोतिहारी में उनका अपना मकान है. केबीसी के पैसों के बड़े हिस्से का सुरक्षित निवेश उन्होंने बैंक में किया है. इससे जो ब्याज मिलता है, वह उनके परिवार की छोटी-बड़ी ज़रूरतें पूरी करने के लिए काफ़ी है.

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लेकिन उनके सपने अब भी अधूरे हैं और सुशील के लिए ज़्यादा बड़ी निराशा यह है कि अब उन्होंने अपने सपने पूरे करने की कोशिश करना भी छोड़ दिया है.

बदलते लक्ष्य

मनरेगा के तहत काम करते हुए सुशील प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी भी करते थे. आईएएस बनना उनका सपना था. केबीसी जीतने के कुछ दिनों बाद उन्होंने फिर से इसके लिए कमर कसी.

दिल्ली भी गए, लेकिन बकौल सुशील उनकी लोकप्रियता ने अब उन्हें एक आम छात्र नहीं रहने दिया था.

दिल्ली यह सोचकर गए थे कि दो साल में लक्ष्य हासिल कर लेंगे, लेकिन अपनी लोकप्रियता की वजह से शांत होकर दो महीने भी तैयारी नहीं कर सके और घर लौट आए.

फिर लेक्चरर बनने के लिए तैयारी शुरू की. राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा देने की ख़बर मीडिया को लगी तो वे कुछ ऐसे शीर्षक के साथ वह ख़बर बने, ‘आईएएस बनने वाला अब आईएएस बनाएगा’.

यह उन्हें तंज जैसा लगा और फिर इससे भी मन उचट गया. फिर लेखन के क्षेत्र में मुंबई किस्मत आज़माने पहुंचे, तो वहां कहा गया कि उनके चेहरे को तुरंत काम मिल सकता है, दिमाग़ को मुक़ाम हासिल करने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा. एक महीने बाद वे मुंबई से भी लौट आए.

फ़िलहाल सुशील अपने घर पर ही हैं. केबीसी के बाद उन्होंने अपने लिए कई लक्ष्य निर्धारित किए. नाकाम रहे और फ़िलहाल लक्ष्यविहीन होकर रह गए हैं.

यहां यह बताते चलें कि सुशील की मनपसंद फ़िल्म गुरुदत्त की 'प्यासा' है.

लोकतंत्र के मायने

उनके विचार में लोकतंत्र में ज़्यादातर काम जनता की भलाई के लिए किए जाते हैं. हर कोई अपनी पसंद का उम्मीदवार चुनने के लिए वोट कर सकता है और हर वोट का महत्व बराबर है, लेकिन सामाजिक-आर्थिक बराबरी आना अभी बाक़ी है और ऐसा होने पर ही हमारा लोकतंत्र पूरी तरह सफल माना जाएगा.

मत देने से, चुनावी प्रक्रिया से क्या बदलाव आते हैं?

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इस सवाल पर वह कहते हैं, ''मत डाल देने भर से बहुत ज़्यादा बदलाव नहीं आता. सरकारें ज़रूर बदल जाती हैं. मनपसंद उम्मीदवार और सरकार चुनने भर से ज़िंदगी में सारे अपेक्षित बदलाव नहीं आ जाते हैं. सरकारें अपने ढंग से काम करती हैं, चाहे जो भी हो.''

सुशील कुमार का कहना है, ''हमें बहुत आज़ादी है. हम अपना मनपसंद पेशा चुन सकते हैं, मन की बात बोल सकते हैं, लेकिन हमारी अब तक की सरकारें जनता की अपेक्षाओं पर पूरी तरह खरी नहीं उतरी हैं. फिर भी आसपास के देशों की ओर नज़र उठाकर देखता हूं, तो उनके मुक़ाबले हमारा लोकतंत्र ज़्यादा सफल नज़र आता है.''

सरकार से अपेक्षा

वो कहते हैं, "सांसद का व्यक्तिगत स्वभाव और प्रदर्शन मायने रखता है. साथ ही सरकार के मुखिया यानी प्रधानमंत्री का भी कर्मठ होना ज़रूरी है. सरकारों को दूरदृष्टि रखनी चाहिए और ऐसा काम करना चाहिए जिससे दुनिया में देश का नाम रोशन हो."

हमने पूछा कि जनप्रतिनिधि और सरकारें कब विफल रहती हैं?

सुशील कुमार कहते हैं कि सरकारें तब विफल रहती हैं जब वे किसी भी कारण से अपने वादे पूरे नहीं कर पातीं. वादे पूरे करने के लिए संसद में क़ानून नहीं बना पाती हैं.

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