बनारस को है 12 मई का इंतज़ार और मोदी को?

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अगर आप रोज़ टीवी देखते हैं और अख़बार पढ़ते हैं तो आप में से कुछ लोगों को ये लग सकता है कि पूरा बनारस 'मोदीमय' हो चुका है.

आप सोच रहे होंगे कि जगह-जगह आपको नरेंद्र मोदी के होर्डिंग दिखेंगे, घरों की छतों पर भारतीय जनता पार्टी के झंडे लहरा रहे होंगे, बनारस का हर आदमी नरेंद्र मोदी की बात कर रहा होगा लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है?

(काशी में जीत या मोक्ष?)

कहा जाता है कि किसी भी शहर को जानने का सबसे अच्छा तरीका होता है, वहां पैदल घूमना. बनारस में आप ख़ूब घूम लीजिए, मोदी के प्रधानमंत्री बनने की वैसी चर्चा होती नहीं दिखती जैसी मीडिया में दिखाई जा रही है. बावज़ूद इसके कि वाराणसी में कुछ ही दिनों में मत पड़ने हैं.

पश्चिम की ओर से जीटी रोड पर चलते हुए जब आप वाराणसी में प्रवेश करेंगे तो पहला मोहल्ला पड़ेगा लहरतारा.

वहां जीटी रोड की बाईं तरफ़ आप को वाराणसी में कांग्रेस उम्मीदवार अजय राय का एक होर्डिंग दिखाई देगा. थोड़ी देर में आप कैंट बस अड्डे पहुँच जाएंगे और उसके ठीक सामने है रेलवे स्टेशन. हज़ारों लोगों का आना-जाना होता है बस अड्डे और रेलवे स्टेशन से. पर वहाँ आप को मोदी के होर्डिंग या पोस्टर नज़र नहीं आएंगे.

होर्डिंग 'नदारद'

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कैंट से शुरू करके आप कहीं भी चले जाइए, मलदहिया, लहुराबीर, लक्सा, भेलूपुर, रथयात्रा, महमूरगंज, एक भी होर्डिंग या बैनर नहीं मिलेगा जिसमें मोदी आपसे आप का वोट माँग रहे हों लेकिन शहर में कई मुख्य चौराहों पर आप को कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशियों के होर्डिंग ज़रूर दिख जाएंगे.

(गंगा में केजरीवाल की डुबकी)

भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता अशोक पांडेय कहते हैं, "चुनाव आयोग ने जितने होर्डिंग लगाने की इजाज़त दी थी, उतने होर्डिंग हमने लगाए हैं." लेकिन बनारस के मुख्य मार्गों और बाज़ारों में घूमने के बाद उनकी बात पर विश्वास करना थोड़ा कठिन लगता है.

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चुनाव विश्लेषक मनोज त्रिपाठी कहते हैं, "यह बात तो तय है कि भाजपा चुनाव में ख़ूब पैसा ख़र्च कर रही है. पर होर्डिंग लगाने के बजाय पार्टी पैसा किसी दूसरे मद में ख़र्च कर रही होगी जिसमें उनको ज़्यादा लाभ दिख रहा होगा."

(बनारस के नए बाबू?)

टोपी और टीशर्ट

चाय और पान की दुकानों पर भी चुनावी चर्चा न के बराबर है. संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के सामने 45 साल के अशोक चौरसिया की पान की दुकान है. उनकी दुकान के पास दो अख़बारों के दफ़्तर हैं. अशोक सुबह ही दोनों अख़बार शुरू से लेकर आख़िरी पन्ने तक पढ़ लेते हैं. वे आपसे किसी भी मुद्दे चर्चा कर लेंगे लेकिन चुनाव की बात पूछने पर शांत हो जाते हैं.

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बहुत कुरेदने के बाद वे झुंझला कर कहते हैं, "यहाँ तो मोदी ही जीतेंगे." आगे कुछ नहीं कहते. लखनऊ के पत्रकार पीयूष श्रीवास्तव जो मोदी के प्रत्याशी घोषित होने के बाद कई बार बनारस के चक्कर काट चुके हैं कहते हैं, "यह कहना ग़लत है कि मोदी की चर्चा नहीं हो रही है. आप बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के कैंपस में जाकर देखिए या फिर पप्पू की चाय की दुकान पर बैठ कर देखिए."

(चाय की चुस्की और गाँधी परिवार की बात)

अस्सी घाट पर पप्पू की चाय की दुकान वह जगह है जहाँ बनारस के बुद्धिजीवियों का जमघट लगता है और राजनीति पर ख़ूब गर्मागरम बहस होती है. पर यूनिवर्सिटी और पप्पू की चाय की दुकान में तीखी बहस साल के 365 दिन होती है. मोदी के आने से नया क्या हो रहा है?

काशी के घाट

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मनोज त्रिपाठी कहते हैं, "जब से मोदी ने वाराणसी से चुनाव लड़ने का ऐलान किया है तब से मीडिया, ख़ासकर टीवी ने, मोदी और बनारस को इतना तान दिया है कि शायद बनारस के लोग उकता गए हों और आपने आप को पूरे चुनाव से खींच लिया हो. अब वे 12 मई का इंतज़ार कर रहे हैं."

बनारस के घाट उसका दिल हैं. लेकिन घाटों पर भी न नरेंद्र मोदी की चर्चा है और न ही चुनावों की. दशाश्वमेध घाट पर दृश्य आम दिनों की तरह का है. कोई गंगा में डुबकी लगा रहा है तो कोई घाट पर अपने बच्चे के मुंडन करवा रहा है तो कोई पंडे के साथ बैठ कर, उसके इशारों पर पूजा कर रहे है.

बनारस में वोट 12 मई को पड़ेंगे. वोटों की गिनती 16 मई को होगी और उसी दिन पता चलेगा कि मोदी की कितनी लहर थी या नहीं थी.

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