बलात्कार, ताले और राजनीति...

  • 8 मई 2014
भगाणा की दलित लड़कियां

दिल्ली में जंतर मंतर की चौड़ी सड़क, मोटी ज़ंजीरों से बंधे दिल्ली-पुलिस के बैरिकेड और उनसे कुछ गज की दूरी पर लगे एक टेंट में हरियाणा के एक गांव के दलित आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं.

भीड़ के पीछे, आदमियों से पर्दा कर एक झु़ंड में बैठी औरतें सारी बात ध्यान से सुन रही हैं. भले ही 16 अप्रैल से शुरू हुए इस धरने के बाद अब तक ये भाषण और बातचीत उन्हें लगभग रट चुके हैं.

इस सबसे दूर एक कोने में 13 से 18 साल की चार लड़कियां पानी के बर्तनों और चूल्हे से घिरी चुपचाप खाना बनाने में जुटी हैं. ये वो नाबालिग दलित लड़कियां हैं जिनके साथ 23 मार्च 2014 को हिसार ज़िले के भगाणा गांव के पांच लड़कों ने सामूहिक बलात्कार किया.

सामूहिक बलात्कार

उस दिन क्या हुआ, इस सवाल का जवाब 13 साल की अंजू (नाम बदला हुआ) एक सांस में दे गईं, "अपनी तीन सहेलियों के साथ मैं घर से बाहर घूमने के लिए निकली थी. छोड़ी दूर जाने पर एक गाड़ी हमारे पास आई जिसमें जाटों के लड़के बैठे थे. पहले उन्होंने हमारी सहेली से बात करने की कोशिश की फिर हमें गाड़ी में खींच लिया. हम तीनों को कुछ सुंघा दिया था. हमारी एक सहेली होश में रही. उसके साथ एक सुनसान जगह पर लड़कों ने बलात्कार किया और हमारे साथ भी बेहाशी में ग़लत काम किया. इसके बाद जब हमें होश आया तो हम भटिंडा के स्टेशन पर थे."

घटना की जांच कर रही एसएसपी मनीषा चौधरी के मुताबिक़ मामले में एफ़आईआर हो चुकी है. मेडिकल जांच में दो लड़कियों के साथ बलात्कार की पुष्टि हुई है. पांच लड़कों को गिरफ़्तार किया गया है और उन पर नाबालिगों के साथ बलात्कार, अपहरण और एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला बनाया गया है.

'गांव वापस नहीं जाना चाहते'

हर सवाल के जवाब में अंजू दोहराती है कि उन्हें इंसाफ़ चाहिए लेकिन इंसाफ़ का मतलब पूछने पर उसे कुछ नहीं सूझा.

दो-चार मिनट की चुप्पी के बाद वो बोली, ''हम गांव वापस जाना नहीं चाहते, लड़के हमें परेशान करते हैं. उन्होंने कहा था हमारा नाम लिया तो तुम्हारे परिवार को मार देंगे."

एफ़आईआर के मुताबिक़ ये लड़कियां पांचवीं, आठवीं और नौवीं तक पढ़ी हैं. इनका नाम स्कूल से क्यों कटा इसकी वजह भी कई सवालों के बाद सामने आती है. लड़कियों की एक रिश्तेदार ने बातचीत में बताया, ''जाटों के लड़के रोज़ स्कूल आते-जाते इनके साथ छेड़छाड़ करते थे. तेज़ मोटरसाइकिल चलाकर आस-पास फिरते थे. हमने लड़कों के दादा से शिकायत की तो उसने कहा कि लड़कों की तो उम्र है जोश दिखाने की, उन्हें कैसे रोका जाएगा. दो साल से अब लड़कियां स्कूल नहीं जातीं.''

दलितों की मांग है कि गांव के सरपंच सहित एक अन्य व्यक्ति को डराने-धमकाने के आरोप में गिरफ़्तार किया जाए. पीड़ित परिवारों के बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का इंतज़ाम हो और चारों परिवारों को मुआवज़े सहित गांव से बाहर बसाया जाए.

'उन्हीं की सरकार, उन्हीं का कानून'

लड़कियों में से एक के पिता विरेंदर कहते हैं, ''ज़ोर शुरू से जाटों का ही रहा है, दलितों का ज़ोर नहीं रहा तो उनकी बहू-बेटियों की इज़्ज़त भी नहीं रही है. हमारे साथ उनकी कोई बात-मनमुटाव हो जाए तो वो हमारे घर आकर हमें पीट कर जाते हैं. उन्हीं की अदालत है, उन्हीं की सरकार है, उन्हीं का क़ानून है.''

भीड़ में कुछ नौजवान हैं, कुछ बच्चे और कुछ छोटे लड़के भी. ज़्यादातर बच्चों का कहना है कि गांव में वो स्कूल जाते थे, लेकिन अब अपनी बहनों के साथ घर-बार छोड़कर यहां बैठे हैं.

इन बच्चों को भी 'इंसाफ़ चाहिए' लेकिन वो स्कूल भी जाना चाहते हैं.

'अब डर किस बात का'

जंतर-मंतर पर इन लोगों के रहने खाने का इंतज़ाम और आगे की रणनीति तय करने में सर्वसमाज संघर्ष समिति के कर्ताधर्ता वेदपाल तंवर की मुख्य भूमिका है. वेदपाल तंवर भगाणा गांव के उन 70 परिवारों का नेतृत्व भी कर रहे हैं जो गांव में दलितों और जाटों के बीच ज़मीन के कब्ज़े को लेकर हुए एक विवाद के बाद 2012 से हिसार सचिवालय परिसर में धरने पर बैठे हैं.

जुलाई 2012 में लगभग 50 दलित झुलसती गर्मी में हिसार से पैदल चलकर इस उम्मीद में दिल्ली आए थे कि उनकी बात सुनी जाएगी. उस मामले में भी अब तक कुछ नहीं हुआ है. जिन लड़कियों के साथ बलात्कार हुआ है उनके परिवार उस वक़्त आंदोलन में शामिल नहीं थे. उन्होंने गांव में रुकने का फैसला किया था, लेकिन अब इस घटना के बाद सभी दलित परिवार एक हो गए हैं.

'दलितों को न्याय मिले', 'बलात्कारियों को फांसी हो', इन नारों के बड़े-बड़े बैनरों के बीच जंतर-मंतर पर हर दिन कई मीटिंग होती हैं. दलितों के कई संगठन इस मुद्दे से जुड़ने के लिए सामने आए हैं. हर कोई बात की शुरुआत इस जुमले से करता है कि 'मामले को राजनीति से दूर रखना है', लेकिन ये बात इतनी बार दोहराई गई है कि लोग अब इसे अनसुना कर आगे सुनते हैं.

मामला बलात्कार का हो या ज़मीन का, खाना पेट की ज़रूरत है. भीड़ और भाषणों से दूर हर-दिन, सुबह-शाम चारों लड़कियां खाना बनाने में जुटी रहती हैं.

जिस दिन मैं पहली बार पहुंची उस दिन आम आदमी पार्टी के ख़िलाफ़ नारे लगे. अरविंद केजरीवाल हिसार से हैं और अगले ही दिन योगेंद्र यादव ने इन पीडितों से मुलाकात की लेकिन उनके अलावा कोई बड़ा नेता अभी तक जंतर-मंतर नहीं पहुंचा है.

नेता आएं न आएं लेकिन विरेंदर कहते हैं कि उनके अब ये आर या पार की लड़ाई है, ''इज़्ज़त से बढ़कर क्या है. जब इज़्ज़त ही चली गई तो अब डर किस बात का. गांव में तो अब घुस नहीं सकते अब चाहे मार-काट हो, चाहे सरकार हिल जाए, चाहे सत्ता पलट जाए, दलितों को एक होना पड़ेगा. तभी काम चलेगा. इन्होंने ऐसी हालत कर दी है हमारी कि कहीं का नहीं छोड़ा.''

बंट गया है गांव

इस बीच भगाणा में घुसते ही एहसास होता है कि गांव में एक लकीर सी खिंच गई है. बातचीत के दौरान तीन तरह के लोग ही मिलते हैं एक वो जो दलित समुदाय से हैं और खुलकर जाटों पर ज़ुल्म और अत्याचार के आरोप लगाते हैं. दूसरे वो जो ख़ुद को ‘दंबग’ कहते हैं और अपने को जातिवादी राजनीति का शिकार बताते हैं और तीसरे वो जो हर सवाल के जवाब में केवल चुप रहना जानते हैं.

गांव के सरपंच राकेश का कहना है, ''लड़कियां तो अपनी मर्ज़ी से हंसते-खेलते लड़कों के साथ गई थीं. हमें जब मामले की जानकारी मिली तो हमने चारों लड़कों को पुलिस के हवाले कर दिया. आजकल हर जगह जातिवाद का ज़हर फैल गया है. चुनाव हो वो जातिवाद पर, कोई छोटी-मोटी वारदात हो वो जातिवाद पर. इनकी गली में कुत्ता भी मर जाए तो कह देंगे कि दबंग मार गए. हिसार में इतनी हालत ख़राब है.'

गांव में हर पक्ष के पास दिखाने को अलग सबूत हैं. अख़बार से कोई आया है, ये ख़बर आग की तरह फैलती है और दोनों पक्ष बड़ी से बड़ी भीड़ जुटाकर अपनी बात का वज़न रखते हैं.

दलितों का कहना है कि भगाणा प्रकरण के बाद उनके ज़्यादातर लोग गांव छोड़कर भाग गए हैं. जो रह गए हैं वो या तो साल भर के बंधुआ मज़दूर यानी सीरी हैं या इतने ग़रीब की और कहीं कमा-खा नहीं सकते. जाटों का कहना है दलितों के बीच विजेंदर भगोरिया जैसे कुछ नेता पैदा हो गए हैं जो इस मुद्दे के बल पर राजनीति चमकाना चाहते हैं.

तभी मेरे साथ चल रही दलित टोली के एक नौजवान ने एक घर के दरवाज़े पर लगे ताले की ओर इशारा कर मुझसे कहा कि मुझे ताले की तस्वीर लेनी चाहिए.

इसे गांव के हालात कहें या आंदोलन की मजबूरी, भगाणा में अब ताले भी जाट-दलित राजनीति का हिस्सा हैं. प्रशासन से नाउम्मीद दलितों की आस अब आंदोलन पर टिकी है और आंदोलन को मज़बूत रखने के लिए ये साबित करना ज़रूरी है कि गांव में दलितों के घर खाली पड़े हैं.

निर्भया कांड से तुलना?

इस बीच जंतर-मंतर पर दलित संगठनों का सुझाव है कि ‘16 दिसंबर क्रांति’ की तरह छात्रों को इस आंदोलन से भी जोड़ा जाना चाहिए. एसएमएस, फ़ेसबुक और सोशल मीडिया पर ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को जोड़ने की ज़िम्मेदारी कुछ लोगों को सौंप दी गई है. दबे-ढके रूप से कुछ कार्यकर्ता ये भी मानते हैं कि निर्भया मामले में इंसाफ़ इसलिए हुआ क्योंकि पीड़िता की मौत हुई और मीडिया की एक ‘हवा सी बन गई’.

शायद यही वजह है कि संगठन के नेता और धरने पर जुट लोग सभा में बार-बार ये बात उठाते हैं कि ये मामला निर्भया-कांड से ज़्यादा गंभीर है और इस बार आवाज़ और ऊंची होनी चाहिए.

आंदोलन की तैयारी के बीच चारों लड़कियां हर वक़्त भीड़ की निगरानी में हैं. वो तभी बोलती हैं जब संगठन का इशारा हो या माता-पिता रज़ामंदी दें. सोते-जागते, उठते-बैठते, काम करते हुए दुपट्टा एक मिनट भी मुंह से नहीं हटता. ग़लती से हट जाए तो कोई न कोई झिड़क देता है.

लड़कियों में से एक की ताई कमलेश कहती हैं, ''संगठन और अख़बार के लोग आते-जाते रहते हैं. कोई-कोई फ़ोटो खींच लेता है चुपके से. गांव में तो इज़्ज़त चली गई है लड़कियों की. यहां-वहां फ़ोटो छपेगा तो आगे कैसे ज़िंदगी निभेगी इसलिए मुंह छिपाकर बैठना पड़ता है.''

दिल्ली बहुत दूर है...

मैंने कमलेश से पूछा कि आपने निर्भया कांड के बारे में सुना था? जवाब मिला, ''अख़बारों में रोज़-रोज़ दामिनी-दामिनी का नाम छप रहा था. पूछने पर हमें पता लगा कि दिल्ली में एक लड़की के साथ बलात्कार हुआ है. ये तो दिल्ली है यहां तो हर बात की ख़बर बनती है हमारे उधर तो इन सब बातों की ख़बर नहीं बनती. हमारा तो हरियाणा का देश है, दिल्ली बहुत दूर है हमारे लिए.''

गांव-देहात में औरतों से बात करना आसान नहीं. वो तैयार हो भी जाएं तो आदमी उन्हें भीड़ से अलग होने या अकेले कुछ कहने नहीं देते. जंतर-मंतर पर बैठी दलित महिलाएं भी इससे अलग नहीं.

'हम पीछे हटने वाले नहीं'

रात के नौ बज रहे थे. सड़क किनारे, खुले टेंट में सोने के लिए महिलाएं एक तरफ़ इकट्ठा होने लगीं गईं और पुरुष बाहर निकलकर दूसरी तरफ सोने की तैयारी करने लगे.

रिकॉर्डिंग का सामान समेटते मैंने एक औरत से पूछा कि अनजान शहर में रात को खुले में डर नहीं लगता? वो बोलीं, ''अभी किसी ने औरतों का दम देखा नहीं है. जब हम पहले दिन एक मंत्री से मिलने को निकले तो पुलिस वालों ने रस्सी से रोक दिया था. उमर भले ही मेरी साठ की हो लेकिन घुटनों के बल चढ़कर सौ औरतों के साथ मैं बैरिकेड पर चढ़ गई थी. दिल में जब गुस्सा फूटता है तो हाड़ में जान आ जाती है. 11 तारीख को आना तब देखना लुगाइयों की ताक़त. इस बार हम पीछे हटने वाले नहीं.''

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