छत्तीसगढ़ में माओवादियों की रिहाई पर सवाल

माओवादी इमेज कॉपीरइट Alok Putul

छत्तीसगढ़ की जेलों में बंद 36 माओवादियों की ज़मानत और रिहाई के मामले में राज्य सरकार अदालत में विरोध नहीं करेगी.

मध्य प्रदेश सरकार की पूर्व मुख्य सचिव निर्मला बुच की अध्यक्षता वाली कमेटी की सिफारिश पर राज्य सरकार ने यह फैसला किया है. बुधवार को ही निर्मला बुच कमेटी ने यह सिफारिश की है.

इस फैसले से नाराज़ कांग्रेस पार्टी ने कहा है कि राज्य सरकार और माओवादियों के बीच क्या समझौता हुआ है, इसका विवरण सार्वजनिक होना चाहिए.

कांग्रेस के नेता और विधायक सत्यनारायण शर्मा ने आरोप लगाया है कि “पहले दिन से ही सरकार और माओवादियों के मध्यस्थों के बीच जिस तरह के समझौते की बात चर्चा में रही है, उसका खुलासा सरकार नहीं कर रही है. हमारा विश्वास है कि सरकार और माओवादियों के बीच कोई गुप्त समझौता हुआ है, जो सार्वजनिक होना चाहिए.”

कलेक्टर का अपहरण

इमेज कॉपीरइट alok putul
Image caption निर्मला बुच की अध्यक्षता में कमेटी की बैठक. सरकार ने यह कमेटी जेल में बंद आदिवासियों के मामलों की जांच के लिए गठित की है.

दो साल पहले 21 अप्रैल 2012 को माओवादियों ने सुकमा ज़िले के मांझीपारा गांव से कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन का अपहरण कर लिया था.

कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन के मामले में माओवादियों ने सरकार से बातचीत के लिए डॉक्टर ब्रह्मदेव शर्मा और प्रोफेसर हरगोपाल को अपना मध्यस्थ बनाया था.

डॉक्टर ब्रह्मदेव शर्मा बस्तर के कलेक्टर और भारत सरकार में आदिवासी मामलों के आयुक्त रह चुके हैं. दूसरी ओर, राज्य सरकार ने मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्य सचिव निर्मला बुच और छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्य सचिव एसके मिश्रा को इस मामले में बातचीत के लिए अधिकृत किया था.

इसके बाद 4 मई 2012 को जब प्रोफेसर हरगोपाल और ब्रह्मदेव शर्मा की पहल पर कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन की रिहाई की गई, उसके कुछ ही घंटों बाद निर्मला बुच की अध्यक्षता वाली कमेटी ने अपना कामकाज शुरु कर दिया.

सरकार ने यह कमेटी इसलिए बनाई थी कि राज्य के अलग-अलग जेलों में माओवादी होने के आरोप में बंद या सजा भुगत रहे आदिवासियों के मामलों की जांच की जाए और कानूनी समीक्षा करते हुए उनकी रिहाई की पहल की जाए.

कमेटी की अध्यक्ष निर्मला बुच कहती हैं, “हमारा काम केवल गुण-दोष के आधार पर फैसला लेना है. माओवादियों को लेकर अदालत का क्या रुख होगा, इससे हमारा लेना-देना नहीं है. आज हमने जिन 36 मामलों में सरकार को ज़मानत या रिहाई का विरोध करने की जो सिफ़ारिश की है, उसमें अदालत क्या निर्णय लेगी, इस पर हम कुछ नहीं कर सकते.”

कांग्रेस का आरोप

कांग्रेस पार्टी का मानना है कि एलेक्स पॉल मेनन की रिहाई के समय सरकार और माओवादियों के बीच कोई गुप्त समझौता हुआ था और सरकार उसी एजेंडे पर काम कर रही है.

कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन की रिहाई के तुरंत बाद माओवादियों के मध्यस्थ रहे डॉक्टर ब्रह्मदेव शर्मा और प्रोफेसर हरगोपाल ने भी कहा था कि सरकार ने जो वादा किया था, उसके अनुसार उसे तीन शीर्ष माओवादी नेताओं को तत्काल रिहा करना चाहिए और अन्य पांच माओवादियों को रिहा करने की दिशा में क़दम उठाना चाहिए.

माओवादियों ने भी इस मामले में सरकार पर वादा खिलाफी का आरोप लगाया था.

बीबीसी ने इस मसले पर राज्य के गृहमंत्री रामसेवक पैंकरा से भी बात करने की लगातार कोशिश की लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो पाया.

बहरहाल माओवादी होने के आरोप में जेलों में बंद आदिवासियों को सरकार के फैसले की कितना लाभ मिल पाता है, इसके लिये तब तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी, जब तक मामला अदालत तक न पहुंच जाए.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार