बेटियों की उड़ान से रोशन चायवाली मांएं

  • 10 मई 2014
रत्नागिरी महाराष्ट्र

महाराष्ट्र के रत्नागिरि ज़िले के पठारों में बनी पतली-सर्पीली सड़कों पर हम रास्ते से भटक गए हैं. मोबाइल में जीपीएस सिग्नल नहीं है. मेरे बगल की सीट पर बैठे वरिष्ठ पत्रकार मधुकर उपाध्याय के पास एक विस्तृत नक़्शा है, लेकिन हमें यह नहीं मालूम कि हम कौन सी सड़क पर हैं.

कोई नहीं है जिससे रुककर हम रास्ता पूछ लें. सड़क के एक ओर वीरान पठार हैं और दूसरी ओर इन वीरान पठारों को हरा-भरा करने की कोशिश में लगाए गए आम के बाग़. आम के कुछ बौराए पेड़ों का क़द इंसान से भी छोटा है.

हम कई किलोमीटर तक आगे बढ़ते जाते हैं. मैं यह सोच ही रहा होता हूं कि इन बाग़ों को पानी देने का काम कितना मुश्किल होगा कि उसी समय एक अधनंगा व्यक्ति टैंकर से पेड़ों को पानी देता दिख जाता है.

कुछ आगे बढ़ने पर एक साइनबोर्ड दिखता है जिस पर नज़दीकी क़स्बों की दिशाएं लिखी हैं. यह साइनबोर्ड एक चौराहे पर लगा है. इसी चौराहे पर एक चाय की दुकान है. वीरान रास्ते के एक सुनसान चौराहे पर यह चाय की दुकान रुकने के लिए एक अच्छा पड़ाव थी.

हम यहां रुके, चाय पी, बातें कीं और रास्ता पूछा. कुछ ड्राइवर यहां मौजूद थे उनसे चुनावी चर्चा करने की कोशिश की. लेकिन वे सिर्फ़ इतना ही कह पाए कि किसी की भी सरकार बने, हमें तो रोज़ मेहनत करनी है, रोज़ पेट भरना है.

रत्नागिरि ज़िले के राजापुर क्षेत्र के नाणार गांव के रास्ते पर बनी यह चाय की दुकान शुभांगी राणे की है. कई बार आग्रह करने पर शुभांगी बात करने को तैयार होती हैं.

'राजनीति हमारा काम नहीं'

वोट के बारे में पूछने पर इतना ही कहती हैं, "राजनीति के बारे में हमें कुछ समझ नहीं आता है. काम करते हैं तो हमारा पेट भरता है. राणे साहब जीतेंगे तो हमें फ़ायदा होगा. बाक़ी से हमें क्या फ़ायदा. इससे ज़्यादा राजनीति को हम नहीं जानते. न यह हमारा काम है और न हमें इससे कोई मतलब."

सुबह चार बजे से रात दस बजे तक दुकान चलाने वाली शुभांगी राणे रोज़ाना औसतन दो-तीन सौ रुपए कमा लेती हैं. लेकिन शुभांगी खुश हैं और उनकी खुशी की वजह है उनकी बेटी, जो रत्नागिरी के एक कॉलेज में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही है. शुभांगी का बेटा भी हॉस्टल में रहकर विज्ञान वर्ग में पढ़ाई कर रहा है.

राजनीतिक रूप से अशिक्षित शुभांगी राणे के जीवन का यह पक्ष मुझे एक नई उम्मीद देता है. यहां जानना सुखद था कि एक मां जिसे देश के चुनावों में कोई दिलचस्पी नहीं है, अपनी बेटी की शिक्षा को लेकर न सिर्फ़ चिंतित हैं बल्कि उसे बेहतर शिक्षा देने के लिए हरसंभव प्रयास भी कर रही हैं.

शुभांगी कहती हैं, "बेटी को पढ़ता देखकर मुझे बहुत अच्छा लगता है. जब वो नौकरी करेगी, तो हमारा जीवन भी अच्छा हो जाएगा."

बेटी की पढ़ाई के बारे में पूछते ही शुभांगी का चेहरा खिल जाता है. मानो वो कह रहीं हों कि दुनिया की सबसे खुश मां वो ही हैं. लेकिन क़रीब दस हज़ार किलोमीटर लंबे सागरनामा के सफ़र में शुभांगी ऐसी पहली चायवाली नहीं थीं, जो अपने बच्चों को बेहतर भविष्य देने की कोशिशों में जुटी हैं.

पढ़ाई का ख़र्च उठाने को पैसा नहीं

तमिलनाडु में सेलम से अत्तुर के रास्ते पर हाईवे किनारे शोभा करनराजे की चाय की दुकान है. शर्मीली शोभा चाय बनाने में मशगूल हैं और पास ही चार-पांच लोग, जिनमें एक उनके पति भी हैं पुराने छोटे रंगीन टीवी पर रजनीकांत की कोई फ़िल्म देखने में मशगूल हैं.

चुनावी चर्चा छेड़ने पर ये लोग अम्मा और अन्ना में कौन बेहतर है, इस बहस में भिड़ जाते हैं. ज़्यादातर लोग अम्मा के पक्ष में हैं. शोभा करनराजे का वोट भी अम्मा (जयललिता) के लिए ही है.

शोभा के चार बच्चे हैं और सभी पढ़ाई कर रहे हैं. बड़ी बेटी पास के एक क़स्बे में पॉलीटेक्निक की पढ़ाई कर रही है. शोभा तमिल में अपने बेटी के बारे में बताती हैं. मैं बस इंजीनियरिंग शब्द ही समझ पाता हूं. बेटी के बारे में बात करते हुए उनके चेहरे पर भी ठीक वैसी ही मुस्कान थी जैसी शुभांगी राणे के चेहरे पर थी.

सीमांध्र के पश्चिम गोदावरी ज़िले के हाईवे किनारे बसे भीमाडोले गांव में 17 साल की कल्याणी अपने पिता की चाय की दुकान पर काम में हाथ बंटा रही हैं. यह चाय की दुकान एक झोंपड़ी में है जिसमें कल्याणी का परिवार भी रहता है.

कल्याणी ने इस साल इंटर की परीक्षा दी है और वो उच्च शिक्षा लेकर शिक्षिका बनना चाहती हैं. पिता तेलुगुदेशम पार्टी के पक्ष में बोलते हैं तो कल्याणी बीच में ही रोक देती है.

कल्याणी कहती है, "वाईएसआर ने नर्सरी से स्नातक तक छात्रवृत्ति दी है. यह छात्रवृत्ति न होती तो शिक्षक बनने की सोचना तो दूर मैं स्कूल भी नहीं जा पाती."

कल्याणी का चौदह वर्षीय भाई प्रदीप कुमार इंजीनियर नहीं बनना चाहता. वजह कल्याणी बताती हैं, "दरअसल परिवार के पास इंजीनियरिंग की महंगी पढ़ाई का ख़र्च उठाने का पैसा नहीं है."

पश्चिम बंगाल, झारखंड, बिहार और यूपी में भी मुझे कई ऐसी चाय बेचने वाली मांएं मिलीं जिनके सभी प्रयास अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देने पर ही केंद्रित हैं.

चाय की दुकानों पर तपती ये मांएं उस किसान की तरह ही हैं जो रत्नागिरि के पठारों पर आम के बाग़ सींचने में जुटा है. आम के पेड़ों का क़द अभी छोटा ज़रूर है, लेकिन उम्मीदें ऊंची हैं.

ये ऊंची उम्मीदें और अपनी मेहनत पर भरोसा इनके बच्चों के अच्छे भविष्य की बुनियाद हैं. मैं आश्वस्त हो जाता हूं कि इनके जीवन में अच्छे दिन ज़रूर आएंगे, शिक्षा और मेहनत के दम पर.

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