क्या ये मुलायम का सबसे बड़ा 'जुआ' है ?

मुलायम सिंह यादव, समाजवादी पार्टी, अखिलेश यादव इमेज कॉपीरइट PTI

शाम के चार बज रहे हैं और आज़मगढ़ शहर के बाहर स्थित समाजवादी पार्टी लोक सभा कार्यालय में हलचल हर पल बढ़ रही है.

एक कमरे में मुखिया मुलायम सिंह के भाई राम गोपाल यादव बैठे हैं और दूसरे में भतीजे धर्मेन्द्र सिंह यादव.

एक-एक करके नेतागण आते हैं, कमरे में दाखिल होते हैं, दरवाज़ा बंद होता है और फिर 10 मिनट बाद दूसरा कोई दाखिल होता है.

माहौल गर्म भी है और अनिश्चित भी.

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पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव यहाँ के चुनावी मैदान में छलांग लगा चुके हैं और उन्हें टक्कर मिल रही है भारतीय जनता पार्टी के मौजूदा सांसद रमाकांत यादव से.

एक ज़माने में मुलायम सिंह के ख़ास लोगों में शुमार किए जाते थे रमाकांत यादव. रमाकांत 1996 और 1999 में इस सीट से समाजवादी पार्टी टिकट पर सांसद रह चुके हैं.

लेकिन बाद में वो मुलायम सिंह का साथ छोड़कर बसपा में शामिल हो गए और उसके बाद इसी सीट से 2009 में भाजपा के टिकट पर सांसद चुने गए.

'यादवों का नेता'

Image caption रमाकांत यादव का मानना है कि मुलायम सिंह यादव अब यादवों के नेता नहीं रहे

रमाकांत यादव ने बीबीसी से हुई ख़ास बातचीत में कहा, "बहुत ख़ुशी की बात है कि मुलायम यहाँ आ गए, लेकिन मुलायम सिंह अब न तो पिछड़ी जातियों के नेता रह गए हैं और न ही यादवों के. वे अब सिर्फ़ मुसलमानों के नेता हैं और इस चुनाव में मुस्लिमों ने भी उनका साथ छोड़ दिया है."

हालांकि एक प्रत्याशी का अपने विरोधी के ख़िलाफ़ इस तरह की बातें करना कोई नई बात नहीं, लेकिन कुछ तो बौखलाहट ज़रूर है समाजवादी पार्टी में इन दिनों.

शायद इसीलिए समाजवादी पार्टी का पूरा अमला जैसे आजमगढ़ में उतर सा आया है.

आज़म ख़ान प्रचार तो नहीं कर पा रहे हैं लेकिन शहर के पुराने इलाक़े में एक मित्र के घर रुक कर माहौल पर पूरी नजऱ ज़रूर बनाए हुए हैं.

उत्तर प्रदेश सरकार के कम से कम नौ मंत्री रात-दिन प्रचार में लगे हैं और सुशीला सरोज जैसे कई सांसद अपने अपने वोट बैंकों पर काम कर रहे हैं.

शहर के गिने-चुने होटलों में कमरे दूने दाम पर मिल रहे हैं और महंगी से महंगी गाड़ियों को खड़ा करने की जगह नहीं मिल रही.

बड़ा सवाल यही है कि, "नेताजी जीत तो रहे हैं न?"

मुस्लिम समुदाय का रुख

Image caption उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ में समाजवादी पार्टी के दफ़्तर के आगे गाड़ियों और लोगों का तांता लगा हुआ है.

इन दिनों प्रदेश में सत्ताधारी सामाजवादी पार्टी का ज़िक्र भी कम ही होता है और मुलायम सिंह के सामने चुनौतियां अनेक हैं.

मुज़फ़्फ़रनगर और दूसरे दंगों के चलते मुस्लिम समुदाय सपा से खीझा नज़र आता है.

हिन्दू समुदाय, ख़ासतौर से ब्राह्मण-ठाकुर-कायस्थ और साहूकार, इस बात से नाराज़ बैठा है कि अखिलेश सरकार ने अल्पसंख्यक समुदाय की मदद के लिए एक नहीं दो क़दम आगे बढ़ाया है.

प्रदेश के दलित वोटर कभी भी मुलायम की झोली में नहीं थे.

'मोदी के मोहताज नहीं आज़मगढ़ के मुसलमान'

इन सब समीकरणों के बीच जो बात साफ़ दिखती है वो ये कि आम लोगों को प्रदेश में सपा शासन बहुत पसंद नहीं आ रहा.

मुलायम के आज़मगढ़ से चुनाव लड़ने के पीछे शायद एक नहीं कई संदेश हैं.

पहला यह कि आज़मगढ़ में मुस्लिम मतदाता अच्छी खासी तादाद में हैं.

'आतंक का गढ़'

दूसरा यह कि आज़मगढ़ को बार-बार 'आतंक का गढ़' बताया जाता रहा है उससे सहानुभूति भी मिल सकती थी मुलायम सिंह और उनकी पार्टी को.

तीसरा यह कि आज़मगढ़ से अपना चुनावी बिगुल बजाकर मुलायम पूर्वाचंल में नरेन्द्र मोदी के बढ़ते प्रभाव को थामने की मंशा रखते हैं.

हालांकि समाजवादी पार्टी के आज़मगढ़ लोक सभा प्रभारी और प्रदेश के मंत्री राम आसरे विश्वकर्मा इन सभी बातों को ख़ारिज करते हुए कहते हैं कि सपा सरकार ने हमेशा से ही ज़िले के विकास पर ख़ास ध्यान दिया है.

आज़मगढ़ पर अमित शाह के बयान से बढ़ा विवाद

उन्होंने कहा, "न तो यादव समुदाय और न ही मुस्लिम समुदाय के मत बंटने जा रहे हैं. मुलायम सिंह ने आज़मगढ़ को अस्पताल से लेकर सड़कें तक, तब दे दीं थीं जब वे यहां से चुनाव लड़ने के बारे में सोच भी नहीं रहे थे. बहुत आराम से जीतेंगे नेताजी".

आज़मगढ़ में आम चुनावों के आख़िरी चरण में 12 मई को मतदान होना है.

मुलायम सिंह के प्रदेश में रहे दबदबे का सीधा मूल्यांकन इस चुनाव में उनके पक्ष या विपक्ष में पड़े मतों से हो ही जाएगा.

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