अगर गुजरात 'मॉडल' है, तो केरल-तमिलनाडु 'सुपर मॉडल' हैं

  • 14 मई 2014
गुजरात बाल कुपोषण

गुजरात एक मॉडल राज्य की बजाय मिडिल राज्य है. अगर गुजरात मॉडल है तो फिर जो राज्य असल में शीर्ष पर हैं, वे तो सुपर मॉडल हो जाएंगे.

इससे पहले प्रकाशित एक लेख गुजरात का गड़बड़झाला में मैंने लिखा था कि विकास के मामले में गुजरात की उपलब्धियाँ कहीं से भी 'मॉडल' की श्रेणी में नहीं आती हैं.

यह एक ठोस आधार है. इसी बिंदु को कई जाने माने अर्थशास्त्री पहले भी उठा चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद असमंजस बना हुआ है. इसलिए मैंने मौजूदा आंकड़ों का दोबारा अध्ययन किया ताक़ि सुनिश्चित कर सकूं कि कहीं मैं भावनाओं में तो नहीं बह गया था.

इस बार मैंने विभिन्न विकास संकेतकों पर आधारित सारांश सूचकांकों को देखा. मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) एक अच्छा और जाना माना उदाहरण है.

भारतीय राज्यों के लिए तैयार की गई नवीनतम एचडीआई संगणना, जिसे मैंने और रितिका खेड़ा ने 'इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली' में पेश किया है. इसमें बीस प्रमुख राज्यों की सूची में गुजरात नौवें स्थान पर है.

इसी रिपोर्ट में हमने बाल विकास संकेतकों के सारांश सूचकांकों पर भी ग़ौर किया है. हमने इसे अचीवमेंट्स ऑफ़ बेबीज़ एंड चिल्ड्रन (एबीसी) सूचकांक नाम दिया है.

यह सूचकांक चार संकेतकों पर आधारित है, जो क्रमशः बाल पोषण, जीवन प्रत्याशा (Survival), शिक्षा और टीकाकरण से संबंधित हैं. एबीसी सूचकांक में भी गुजरात बीस शीर्ष राज्यों की सूची में नौवें स्थान पर ही है.

नवां स्थान

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एक और उपयोगी सारांश सूचकांक है 'बहुआयामी ग़रीबी सूचकांक' (एमपीआई). संक्षेप में कहा जाए तो, इसके पीछे विचार यह है कि ग़रीबी में अभाव अलग-अलग तरह से दिखता है.

उदाहरण के तौर पर भोजन, रहने की जगह, स्वच्छता, स्कूल और स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव. मूल अभावों की बात की जाए तो एक परिवार को ग़रीब माना जाएगा यदि वह इनमें से एक तिहाई से अधिक अभावों से ग्रस्त है.

अपनी कमज़ोरियों के बावजूद एमपीआई ग़रीबी की तरफ़ संकेत करने के मामले में एक महत्वपूर्ण अनुपूरक है.

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की सबिना अलकिरे और उनके साथियों ने भी भारतीय राज्यों के लिए एमपीआई की जो रैंकिंग जारी की है, उसमें भी बीस प्रमुख राज्यों की सूची में गुजरात नौवें स्थान पर है.

इन आंकड़ों के परिवार में रघुराम राजन राजन कमेटी द्वारा विकसित 'समग्र विकास सूचकांक' नया है. इस सूचकांक के दस घटक हैं. मसलन, प्रति व्यक्ति खपत, घरेलू सुविधाओं, स्वास्थ्य, शिक्षा, शहरीकरण, कनेक्टिविटी, वित्तीय समावेशन आदि.

यह सूचकांक भी ताज़ा उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित है. इस सूचकांक के घटकों को ध्यान में रखते हुए इसकी रैकिंग में गुजरात शीर्ष राज्यों में होने की उम्मीद कर सकता है, लेकिन ऐसा नहीं है.

यहाँ भी बीस प्रमुख राज्यों की सूची में गुजरात नौवें स्थान पर ही है.

निस्पादन सूचकांक में भी पीछे

इस ढर्रे में कुछ तो रहस्यमय है, क्योंकि सारांश सूचकांक काफ़ी भिन्न-भिन्न संकेतकों पर आधारित हैं और ऐसा भी नहीं है कि मैं ख़ासतौर से उन सूचकांकों पर ज़ोर दे रहा हूँ, जिनमें गुजरात प्रमुख बीस राज्यों में नौवें स्थान पर है.

मैंने उन सभी सारांश सूचकांक के ताज़ा संस्करणों का हवाला दिया है जिनके बारे में मैं जानता हूँ. यदि आपको ये पसंद नहीं हैं तो हम फिर से योजना आयोग के प्रति व्यक्ति ख़र्च पर आधारित मानक के ग़रीबी अनुमानों पर लौट सकते हैं.

लेकिन वर्ष 2011-12 के लिए नवीनतम अनुमानों के मुताबिक बीस प्रमुख राज्यों की सूची में गुजरात नौवें स्थान से खिसक कर दसवें पर पहुँच जाता है.

रघुराम राजन कमेटी ने एक और रोचक सूचकांक बनाया है. निष्पादन सूचकांक या परफॉरमेंस इंडेक्स, जो समग्र विकास सूचकांक के संदर्भ में समय के साथ राज्यों की प्रगति पर आधारित है.

यह एक महत्वपूर्ण सूचकांक है, क्योंकि गुजरात मॉडल के कई समर्थक तर्क देते हैं कि हमें गुजरात के विकास संकेतकों के स्तर को देखने की बजाए यह देखना चाहिए कि समय के साथ इनमें कितना सुधार हुआ है.

असल में 'निष्पादन सूचकांक' ख़ासतौर पर यही काम करता है. साथ ही यह सूचकांक 2000 के दशक के प्रदर्शन पर केंद्रित है. यही वह समय है जब गुजरात को अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना चाहिए था.

निश्चित रूप से इस बार गुजरात का प्रदर्शन बेहतर रहना चाहिए? इसके विपरीत, बीस प्रमुख राज्यों की सूची में गुजरात नौवें स्थान से फ़िसलकर 12वें पर पहुँच जाता है.

केरल व तमिलनाडु

संक्षेप में कहा जाए तो, आप किसी भी नज़रिए से देखें, गुजरात मॉडल राज्य कम और 'मिडिल राज्य' ज़्यादा लगता है. यह अंतर-राज्य की रैंकिंग में सबसे निचले पायदान से अगर दूर है तो शीर्ष पायदान से भी उतना ही दूर है.

यदि गुजरात मॉडल है तो फिर हरियाणा मॉडल भी होना चाहिए और कर्नाटक मॉडल भी होना चाहिए. संयोग से सभी सारांश सूचकांकों में महाराष्ट्र ने गुजरात से बेहतर प्रदर्शन किया है.

तो फिर गुजरात 'मॉडल राज्य' क्यों हैं और महाराष्ट्र क्यों नहीं है? जितना अनुमान मैं लगा सकता हूं उतना आप भी.

यदि गुजरात मॉडल है तो असली शीर्ष राज्यों जैसे केरल और तमिलनाडु को तो 'सुपर मॉडल' बोलना चाहिए. दरअसल, केरल और तमिलनाडु न सिर्फ़ लगातार सभी सारांश सूचकांकों में शीर्ष रैंकिंग के क़रीब रहते हैं, बल्कि सुधार की गति के मामले में भी बाकी राज्यों से आगे निकल जाते हैं.

उदाहरण के तौर पर, केरल और तमिलनाडु राजन कमेटी के समग्र विकास सूचकांक के स्तर और बदलाव के मामले में बाक़ी किसी भी प्रमुख राज्य से बेहतर प्रदर्शन करते हैं.

छवि निर्माण

एक रोचक सवाल उठता है, गुजरात की छवि को इतना बढ़ा-चढ़ा कर कैसे बनाया गया है? इसमें कोई शक़ नहीं है कि इस दृष्टि भ्रम में जनता को भ्रमित करने की नरेंद्र मोदी की ज़बरदस्त योग्यता झलकती है.

कुछ अर्थशास्त्री जो उनके प्रशंसक भी हैं, इस छवि को बनाने में उनकी थोड़ी मदद करते हैं, लेकिन शायद इसका इस तथ्य से भी लेना-देना है कि भारत के बारे में हमारी राय बड़े उत्तर भारतीय राज्यों से ज़्यादा प्रभावित है.

इन राज्यों का बुनियादी ढाँचा निराशाजनक है, सार्वजनिक सेवाएं दुखदायी हैं और सामाजिक संकेतक बहुत ख़राब हैं. निश्चित तौर पर इन राज्यों के मुक़ाबले गुजरात ज़रूर चमकता है, लेकिन बाक़ी कई राज्य भी तो चमकते हैं.

ध्यान रहे कि नौवां स्थान शुभ हो सकता है. विकिपीडिया के मुताबिक नौ नंबर 'हिंदू धर्म में पूजा जाता है और इसे सिद्ध, पूर्ण और दिव्य अंक माना जाता है.'

वहीं चीनी नंबर नौ को ड्रेगन से जोड़ते हैं जो कि 'शक्ति और जादू' का प्रतीक है और 'सम्राट का प्रतीक' भी है. यदि अंक शास्त्रियों की ये बातें सही हैं तो फिर नमो अच्छी जगह पर हैं.

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