हो जाए चुनाव बनारस वाला...

नरेंद्र मोदी, अरविंद केजरीवाल, अजय राय इमेज कॉपीरइट Getty Atul Chandra

2014 आम चुनावों के नौंवे और अंतिम चरण के मतदान के लिए जिन 41 सीटों के लिए मतदान हो रहा है उसमें सभी की नज़र वाराणसी पर है.

भारतीय लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शायद ही कभी इस तरह से किसी सीट पर लोगों का और मीडिया का ध्यान एक लंबे समय तक केंद्रित रहा हो.

यहाँ सीधा मुक़ाबला है भाजपा के नरेंद्र मोदी और आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल के बीच और तीसरी ताक़त बन कर उभरे हैं कांग्रेस के अजय राय.

इस चुनाव से बनारस को क्या हासिल होगा?

वाराणसी या बनारस का चुनाव महज़ चुनाव नहीं रहा, जिसमें एक जीतता है और दूसरे हारते हैं. बल्कि बनारस में लड़ाई अहम के साथ-साथ वर्चस्व और देश में संदेश पहुंचाने की है.

इस सब के बीच थोड़ा ठहर कर ये भी देखने की ज़रूरत है कि बनारस के लिए इस चुनाव के क्या मायने हैं.

ये भी देखना होगा कि इस प्राचीन शहर के लोग अपने को हर अख़बार, टेलीविज़न चैनल और ड्राइंग रूम में होने वाली बहस में पाकर कैसी प्रतिक्रिया दे रहे हैं.

मोदी, केजरीवाल और राय

कहानी की शुरुआत हुई भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के बनारस से चुनाव लड़ने के ऐलान से.

आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने भी ठान ली मोदी को चुनौती देने की.

सिर्फ़ कांग्रेस पार्टी ने वक़्त लगाया और समीकरणों को देखते हुए अपना दांव खेला स्थानीय विधायक अजय राय पर. इस दांव की गोटियां थीं बनारस में भूमिहार-मुस्लिम मतदाताओं की अच्छी-ख़ासी तादाद.

सबसे पहले तो बनारस के निवासियों को दाद देने की ज़रूरत है कि इस राजनीतिक उठा-पटक के बीच उन्होने अपना संपूर्ण संयम बनाए रखा. आपसी राजनीतिक द्वंद्व न तो कभी सड़कों पर उतरा और न ही हिंसक हुआ.

निजी विचार और मताधिकार

Image caption वाराणसी के निवासी असलम खलीफा कहते हैं कि हमारे पड़ोसी हिन्दू हैं और हम मन्दिर-मस्जिद में भेद नहीं करते.

असलम ख़लीफ़ा बनारस में व्यापार करते हैं और यही पर जन्मे हैं. वो कहते हैं, "हमारे पड़ोसी हिन्दू हैं और हम मन्दिर-मस्जिद में भेद नहीं करते. रहा सवाल मत का तो हर एक की अपनी निजी राय है और मताधिकार है. झंझट क्यों हो?"

बनारस में पिछले कुछ महीनों से भगवा गमछे वाले अक्सर नारेबाज़ी करते हुए आप पार्टी के 'झाड़ू' लगा रहे समर्थकों से दो-चार हुए लेकिन शालीनता से दूरी बनाए रहे.

अस्सी घाट और दशाश्वमेध घाट पर हुई एक छोटी सी घटना के अलावा न तो कभी पत्रकारों की फ़ौज को परेशानी हुई और न ही बगल में बह रही गंगा में स्नान करने वालों को.

बनारस को है 12 मई का इंतज़ार और मोदी को?

रहा सवाल चुनाव के विशालकाय होने का तो बनारस वालों ने ये भी दिखा दिया कि उनके लिए राजनीति ज़्यादा ज़रूरी है न कि व्यक्ति विशेष, चाहे वो बाहर का ही क्यों न हो.

मोदी और केजरीवाल दोनों बाहर से आए हुए उम्मीदवार हैं और उनके प्रचार को पूरा सम्मान भी मिला और अहमियत भी.

जनता का संदेश

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इस मिसाल से एक संदेश मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ राजनेताओं के लिए भी गया, जिन्हें जनता महज़ पाँच साल में इसलिए भुला देती है क्योंकि उसे लगता रहा कि वे जीतने के बाद कभी पलट कर यहाँ नहीं आए.

वैसे भी बनारसी संस्कृति बाहर से आए लोगों को लेकर बेहद उदार रही है और यही वजह है कि काशी विश्वनाथ मंदिर के मुहाने वाली गली पर कचौड़ी-जलेबी के साथ-साथ इडली-सांभर बराबरी से बिकता है.

शहर में जितने पुराने बनारसी दिखते हैं उनसे थोड़ी ही कम तादाद दक्षिण भारतीयों या बंगालियों की है.

ये बनारस का ही मिज़ाज है कि यहाँ चुनावी दंगल में कूदने के बाद मोदी या केजरीवाल ने भी मंदिरों में शीश झुकाए या मदन मोहन मालवीय जैसों की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया.

जब राहुल गांधी अपने उम्मीदवार के लिए एक आख़िरी कोशिश करने पहुंचे तो उन्होंने भी यही किया.

दिल भी है, दिमाग़ भी

Image caption आटो चालक राधे श्याम गुप्ता कहते हैं कि यह बनारस ही है बाबू जहाँ आकर हर बड़ा नेता पहले तो मंदिर और गंगा की बात करता है.

ये बात और है कि चुनाव प्रचार की मियाद को देखते हुए राहुल अपने स्वर्गीय पिता राजीव गांधी की प्रतिमा पर माल्यार्पण करने के लिए नहीं उतर सके.

राधे श्याम गुप्ता पिछले दस वर्षों से मुगलसराय जाने वाली सड़क पर टेम्पो चला रहे हैं लेकिन बातचीत में किसी भी दूसरे बनारसी से कम जागरूक नहीं लगे.

बनारसः केजरीवाल, राहुल और अब अखिलेश यादव

उन्होंने बताया, "ये बनारस ही है बाबू जहाँ आकर हर बड़ा नेता पहले तो मंदिर और गंगा की बात करता है, फिर उसे भी गंदगी और बुनकरों की दिक्कत दूर करने के वादे करने पड़ते हैं".

बहरहाल इस सब के बीच 12 मई को जब बनारस की जनता वोट करने निकली है तो उसको पिछले एक महीने से चल रहे चुनावी घमासान को याद दिलाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी.

क्योंकि बनारस का एक दिल है और उससे भी तेज़ दिमाग़.

जिसका प्रतिबिम्ब 16 मई को आने वाले नतीजों और सभी पार्टियों को यहाँ मिलने वाले मतों के प्रतिशत में साफ़ दिखाई पड़ेगा.

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