जो औरतें अपने सिर पर ढोकर लाईं घरों में रोशनी

  • 13 मई 2014
केरल, सौर ऊर्जा महिलाएं इमेज कॉपीरइट P SAINATH

केरल के इडामालकुडी की 60 औरतों ने जब अपने सिर पर 100 सोलर पैनल ढो कर हाथियों से भरे 18 किलोमीटर लंबे जंगली रास्ते को तय किया तो उन्होंने एक तरह का इतिहास बना दिया था.

केरल के सुदूर इलाक़े में स्थित इडामालकुडी पंचायत में बिजली नहीं है. यहां सोलर पैनल (सौर पैनल) और बैटरियां ही 240 परिवारों के लिए ऊर्जा का एकमात्र स्रोत हैं. गांव के इक्का-दुक्का टीवी सेट भी सौर ऊर्जा से चलते हैं.

जब महिलाओं के ज़ोर देने पर पंचायत ने सभी लोगों तक सोलर पैनल पहुंचाने का फैसला किया तो इन सोलर पैनलों को लाने का काम इन महिलाओं ने अपने ज़िम्मे ले लिया.

उन्होंने नौ-नौ किलो के ये सोलर पैनल अपने सिर पर उठाए और पेट्टीमुडी से अपने गांव तक का सफ़र तय किया जो जंगली जानवरों, ऊबड़-खाबड़ रास्तों और जीव-जंतुओं से भरा पड़ा है.

केरल के इडुक्की ज़िले के इडामालकुडी पहुंचने का और कोई रास्ता नहीं है. इडामालकुडी केरल की पहली आदिवासी पंचायत है. इन महिलाओं ने चुमाट्टू कोट्टम यानी सिर पर बोझा ढोने वाला समूह बनाया और बोझा ढोने के काम में स्थानीय पुरुषों के वर्चस्व को तोड़ दिया.

चुनौतियां

ये सभी औरतें आदिवासी हैं जो मुथावन कबीले से आती हैं. ये वो कबीला है जिसका केरल के अभूतपूर्व गरीबी उन्मूलन और लिंग न्याय आंदोलन कुडुंबश्री में महती योगदान रहा है.

स्थानीय कुडुंबश्री इकाई की चेयरमैन रमानी अर्जुनम मुस्कुराते हुए कहती हैं, "हमें इस काम में नौ घंटे लगे. जो मज़बूत थीं उन औरतों ने तो दो-दो पैनल एक साथ उठा लिए थे."

महिलाएं इस आंदोलन को कुडुंबश्री की बजाय सीडीएस यानी कम्युनिटी डेवलपमेंट सोसायटी ही बुलाती हैं.

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Image caption 18 किलोमीटर तक सौर पैनल उठाकर लाने में इन महिलाओं को नौ घंटे लगे थे.

इन पैनलों को ढोने के लिए उन्हें 85 रुपए का कुली चार्ज मिला और साथ ही नरेगा के तहत एक दिन की मज़दूरी 180 रुपये भी मिले. ये कोई बहुत बड़ी राशि नहीं है इतने कठिन काम के लिए. लेकिन ऐसे बीहड़ इलाक़े में शायद ही वे एक दिन में इतना पैसा कमा सकें.

रमानी कहती हैं कि औरतें इस तरह के और कामों में रुचि रखती हैं और ऐसे काम खोजती हैं.

कुडुंबश्री या सीडीएस सिर्फ ये काम ही नहीं करती बल्कि उनकी चुनौतियां इससे कहीं बड़ी हैं. वो छोटे-छोटे प्लाटों में ‘सामूहिक खेती’ करती हैं. उनका फोकस होता है खाने वाली फ़सलें उगाना और वो भी आर्गैनिक तरीके से. वो फ़सल बदल-बदल कर खेती करने के उपाय को भी अपनाती हैं.

काम भले ही कठिन हो पर वो सफल किसान हैं. हालांकि ये बात और है कि जंगली इलाक़ा होने के कारण हाथी, जंगली सूअर और अन्य जानवर यदाकदा उनकी फ़सल नष्ट भी कर देते हैं. यहाँ जीवन निश्चित रूप से कठिन है और खेती के कारण शारीरिक नुकसान की भी संभावना रहती है.

इतना ही नहीं, चूंकि यह ज़मीन जंगल में है तो इन औरतों को इन ज़मीनों का मालिकाना हक़ न तो है और न ही कभी मिलेगा.

रमानी कहती हैं, "इडामालकुडी पंचायत में 40 सीडीएस ग्रुप हैं. इसमें से 34 खेती में लगे हैं. हर ग्रुप में पांच लोग हैं या फिर पांच परिवार के लोग हैं."

रमानी सौम्य हैं, मधुर स्वर में बोलती हैं लेकिन मज़बूत नेता हैं. उनके साथ 30 से अधिक कुडुंबश्री सदस्य हैं, जिसमें अलग-अलग सदस्य अपनी बात रखते हैं.

वे कहती हैं, "हमारा कृषि संघ रागी, धान और अन्य खाद्य पदार्थ उगाता है. हम तपियोका और अन्य पौधे भी लगाते हैं. कभी-कभी हम इलायची की खेती भी करते हैं लेकिन ज़्यादातर हम खाने वाली फसलें ही उगाते हैं."

उनका कहना है, "फ़सल अच्छी होती है लेकिन दो समस्या है. एक-जंगली जानवरों की. हमारी पहली फसल पचास फ़ीसदी बेकार कर दी है जानवरों ने. दूसरी, जब हम ज़्यादा फ़सल पैदा करते हैं तो उसके लिए बाज़ार नहीं है. हमें 18 किलोमीटर पैदल जाना पड़ता है जंगलों से होकर अपनी फ़सल बेचने के लिए."

बाज़ार की ज़रूरत

मैंने पूछा, बाज़ार कितना ज़रूरी है?

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Image caption इदामालकुडी पंचायत में 40 सीडीएस समूह हैं. हर समूह में पांच सदस्य हैं.

वे कहती हैं, "हमारा पहला काम अपने परिवार को खिलाना है. जो बचता है वही हम बाज़ार में ले जाते हैं. हालांकि बाज़ार ले जाने से फ़ायदा है. फ़सल बेचने से जो पैसा मिलता है उससे हम दूसरा सामान ख़रीद पाते हैं. लेकिन यहाँ सड़क ही नहीं है. बाज़ार जाने का कोई साधन नहीं है."

वे कहती हैं, "हमें एक बैंक की शाखा चाहिए. हममें से बहुत सारे लोग बैंक अकाउंट खोलना चाहते हैं."

उनके लिए अधिक ज़रूरी क्या है: सामूहिक खेती? या अकेले अकेले खेती करना?

वह कहती हैं कि दोनों तरीकों की अपनी भूमिका है.

रमानी कहती हैं, "सामूहिक खेती बेहतर है." रमानी के इस वाक्य पर साथ बैठी महिलाएं हामी भरती हैं.

वह कहती हैं, "सामूहिक रूप से काम करने में ये फ़ायदा है कि अगर एक आदमी पीछे छूट जाता है तो दूसरा उसकी मदद कर देता है."

वहीं बैठी एक महिला कहती हैं, "मैं अकेले भी खेती करना चाहूंगी. इसके अपने फ़ायदे हैं लेकिन सामूहिक खेती में हमें अपने परिवारों के भरण-पोषण में अधिक मदद मिलती है. सामूहिक काम का प्रभाव खेती से आगे भी होता है."

वे कहती हैं, "ग्रुप के सदस्य एक-दूसरे के लिए मदद का ज़रिया बन जाते हैं और उनके साथ खड़े होते हैं. ये बात परिवारों तक भी फैलती है. ये बहुत महत्वपूर्ण है हम लोगों के लिए. इसलिए दोनों तरह की खेती होनी चाहिए."

हाईवे चाहिए

टोरंटो स्थित यॉर्क यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर अनन्या मुखर्जी ने इन समूहों के खाद्य सुरक्षा को लेकर अलग तरह के काम पर काफी कुछ लिखा है.

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Image caption केरल में कुडुंबश्री के ज़रिए ढाई लाख महिलाएं समूहों में खेती कर रही हैं.

वो लिखती हैं, "केरल में कुडुंबश्री के ज़रिए ढाई लाख महिलाएं समूहों में खेती कर रही हैं. लीज़ पर ज़मीन लेकर उस पर फ़सल उगा रही हैं. इसका उपयोग वो अपनी ज़रूरतें पूरा करने में करती हैं और ज़्यादा फ़सल होने पर उसे बेचती हैं."

अनन्या के अनुसार इससे खेती में महिलाओं की भागीदारी बढ़ती है और ये सुनिश्चित होता है कि उत्पादक होने के नाते महिलाओं का उत्पादन, इसे बांटने और भोजन करने में नियंत्रण बनता है.

इडुक्की की औरतें ये सारा काम कठिन परिस्थितियों में करती हैं.

क्या वो ख़ुद को उत्पादक की तरह देखती हैं या फिर पैसा लेकर काम करने वाले मज़दूरों की तरह?

हर एक महिला की इच्छा है कि उन्हें उत्पादक की तरह देखा जाए.

रमानी का तर्क है कि उनकी पंचायत के लिए प्रस्तावित नई सड़क से जंगल बर्बाद हो जाएंगे और मुथावन कबीला बर्बाद हो जाएगा.

मैंने पूछा कि लेकिन अभी आप लोगों ने शिकायत की है कि 18 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है माल बेचने और आप लोगों को सड़क चाहिए. क्या ये विरोधाभासी नहीं है?

रमानी पूरे विश्वास से जवाब देती हैं, "बिल्कुल नहीं. हम खुले बड़े हाईवे की मांग नहीं कर रहे हैं. हम ऐसी सड़क चाहते हैं जिस पर जीप चल सके और इस सड़क पर सबको खुली छूट न दी जाए. वन संरक्षण क़ानून लगे. इससे लकड़ी माफिया, खनन माफिया से इलाक़ा सुरक्षित रहेगा. इससे हम सुरक्षित भी होंगे और बाज़ार तक हमारी पहुंच भी रहेगी."

धुंधलका हो रहा है और हमसे मिलने आई महिलाओं को वापस अपने घरों को जाना है जो दूर हैं. ख़राब रोशनी में उन्हें जंगल के रास्ते लौटना है.

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