क्या होगा जब चुनावी वादे पूरे नहीं होंगे

  • 15 मई 2014
चुनाव प्रचार सामग्री

चुनाव एक ऐसा बड़ा मौका होता है जब राजनीतिक विचारधारा और विकास की तुलनात्मक नीतियां आम जनता की चर्चाओं का विषय बनती हैं.

2014 के आम चुनाव को कई लोग इस नज़रिए से भी देख रहे हैं कि यह चुनाव देश में विकास और राजनीति की समस्याओं को दूर कर देगा.

लेकिन तमाम शब्दाडंबरों और तड़क-भड़क के बावजूद विकास और राजनीति के असल मुद्दों को राजनीतिक भाषणों में कोई ख़ास जगह नहीं मिली.

चुनावों को एक भव्य आयोजन में बदलकर यह बात छुपा ली जाती है कि राजनीतिक दल आज के भारत को प्रभावित करने वाले असली मुद्दों और ज़मीनी प्रतिस्पर्धाओं पर बात नहीं करना चाहते. इस आयोजनधर्मिता के सहारे ही इस बात को दबा दिया जाता है कि राजनीतिक गठजोड़ विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं के आधार पर होना चाहिए.

कोई भी राजनीतिक गठबंधन सत्ता में आए यह बिल्कुल भी साफ़ नहीं है कि उसकी नीतियाँ क्या होंगी. किसी भी राजनीतिक गठबंधन ने कोई 'न्यूनतम साझा कार्यक्रम' बनाने का प्रयास नहीं किया है.

यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि यह चुनाव बाज़ार राजनीति पर हावी रहा. चुनाव को एक उत्पाद की तरह बेचा गया और इस पूरी कवायद में मीडिया इवेंट मैनेजर की भूमिका में था.

'पैकेजिंग के अंदर ग़रीबों का विकास कहां?'

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पहली बार बाज़ार और चुनाव की मार्केटिंग के बीच का गठजोड़ साफ़ दिख रहा है. कॉरपोरेट जगत की चुनाव प्रक्रिया को अराजनीतिक बनाने की कोशिशें इस बार सफल होती दिखीं. कॉर्पोरेट घराने उनके कारोबारी हितों को चुनौती देने वाली नीतियों को हाशिए पर रखने में सफल रहीं.

इस नए परिप्रेक्ष्य में बिना किसी संदर्भ या प्रसंग के 'विकास' शब्द का प्रयोग किया गया. 'विकास' शब्द का प्रयोग जानबूझकर एक ऐसे पर्दे की तरह इस्तेमाल किया गया जिससे 'विकास' की विभिन्न और परस्पर विरोधी परिभाषाएँ सामने नहीं आ सकें.

प्रमुख राजनीतिक चर्चाओं में बाज़ार के हित की चर्चा ही छाई रही. ज़ाहिर है इन चर्चाओं में ग़रीबी एवं भेदभाव दूर करने और समाज के हाशिए पर रह रहे उन लाखों लोगों की बात नहीं हो सकती.

बड़े-बड़े अमूर्त अतिसरलीकृत जुमलों के पीछे असली मुद्दों को छिपाने की मार्केटिंग की चाल 2004 के 'इंडिया शाइनिंग' कैंपेन के समय से ही प्रयोग की जा रही है.

यूपीए ने पिछले कुछ सालों में जिस तरह शासन चलाया है उसके प्रति लोगों की नाराज़गी को कुछ लोग उस 'मोदी मॉडल' के समर्थन के रूप में पेश कर सकते हैं जिसका प्रचार उसके कैंपेन मैनेजर करते रहे हैं.

एक ख़तरा यह भी है कि सामाजिक नीतियों को लागू करने के प्रति लोगों में जो नाराज़गी है उसे ख़ुद उन नीतियों के प्रति नाख़ुशी के रूप में देखा जाए.

क्या है आख़िर मोदी मॉडल!

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चुनाव शुरू होने से पहले ही मोदी को विजेता घोषित कर दिया गया था. उनके कैंपेन मैनजरों ने यह पहले से ही तय कर लिया था कि उनके कैंपेन से ठोस बातें गायब रहें. यहाँ तक कि भाजपा का घोषणापत्र भी एक चालू सतही दस्तावेज बनकर रह गया.

दरअसल, मोदी के 'विकास मॉडल' को कॉर्पोरेट जगत के सपनों से अलग करके नहीं देखा जा सकता है. इस सपने का मतलब होगा ऐसा विकास जिससे बेरोज़गारी बढ़ेगी. एक ऐसा सपना जो मनुष्यों और प्राकृतिक संसाधनों की क़ीमत पर विकास की हिमायत करता है.

विकास के इस मॉडल में प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन की वकालत की जाती है. और इन संसाधनों पर निर्भर लाखों लोगों की जीविका पर पड़ने वाले इसके दुष्प्रभावों की चर्चा नहीं की जाती. उम्मीद की जा रही है कि देश की आर्थिक नीतियां अब इस तरह बनाई जाएंगी जिससे कारोबारी जगत को फ़ायदा पहुँचे.

इस मॉडल में इस बात के लिए कोई जगह नहीं कि देश के बहुसंख्यक वंचितों के हितों का ख़्याल रखना सरकार की प्रमुख ज़िम्मेदारी है.

मोदी सरकार का महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी योजना (मनरेगा) जैसे सामाजिक कार्यक्रमों को लेकर रिकॉर्ड बेहद ख़राब है. सामाजिक सुरक्षा पेंशन के मामले में गुजरात सबसे पिछड़ा है. भ्रष्टाचार के मुद्दे पर मोदी सरकार का रिकॉर्ड काफ़ी ख़राब रहा है.

'यूपीए बचाव की मुद्रा में'

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बाज़ार की तकनीक की सफलता इस बात में है कि उसने देश के राजनीतिक विमर्श में घुसपैठ करके उसका कारगर उपयोग किया है. यूपीए ने भी बाज़ार की तकनीक की मदद ली लेकिन वो यह बतान में विफल रहा है कि उसकी विकास की अवधारणा एनडीए से किस तरह अलग है.

यूपीए ने चुनाव में 'मानवीय विकास' का नारा दिया था. यूपीए-1 को सामाजिक क्षेत्रों की उसकी नीतियों के लिए समर्थन मिला था. लेकिन यूपीए-2 अपने कार्यकाल के आख़िर दौर में कारोबारी जगत की उम्मीदों के अनुरूप विकास दर को कायम रखने में सफल नहीं रहा. वहीं सामाजिक क्षेत्र की नीतियों को लेकर भी यूपीए-2 ज़ुबानी जमाखर्ची ही करता रहा.

यूपीए अपने दस साल के कार्यकाल में जिन सिद्धांतों पर काम करता रहा उसे अपने कैंपेन के दौरान जनता को समझाने में विफल रहा. आम जनता को विभिन्न अधिकार देने वाले क़ानूनों की दबे स्वर में चर्चा की गई. इनकी चर्चा कमज़ोर क्रियान्वयन और अनियंत्रित भ्रष्टाचार से उपजे असंतोष में दब गई.

'आप' तीसरे मोर्चे की रीपैकेजिंग

बाज़ार की ताक़तें चुनाव के दौरान सतर्क रहीं. ग़रीबों के लिए मददगार 'मनरेगा' और वन अधिकार क़ानून जैसे क़ानूनों को लगातार नकारात्मक ढंग से दिखाया जाता रहा जबकि बड़ी संख्या में ग़रीब और वंचित लोगों को राहत देने में इन क़ानूनों की महत्वपूर्ण भूमिका है.

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'आम आदमी पार्टी' के बारे में माना जाता है कि वो भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ रही है. लेकिन अपने प्रचार के दौरान उनकी भी यही कोशिश थी कि वो सभी मतदाताओं तक पहुंच बनाएं. इसके लिए उसने पार्टी की छवि को नया रूप दिया.

पार्टी शुरू करते वक़्त वो भ्रष्टाचार दूर करने के लिए चरणबद्ध उपाय लागू करने की बात करते थे. लेकिन बाद में उन्होंने अपनी पुरानी नीति को छोड़ते हुए 'भ्रष्ट शासकों को सत्ता से हटाने' के युगों पुराने भ्रष्टाचार-विरोधी नारे को अपना लिया. उनका दावा था कि जब वो सत्ता में आएंगे तो राजनीतिक मजबूरियों के जाल में नहीं फंसेंगे.

तीसरा मोर्चा भी विकास को लेकर कोई नज़रिया पेश नहीं कर सका. यानी भाजपा और अन्य पार्टियों के बीच अंतर करने का एक ही आधार रह गया, वो है धर्मनिरपेक्षता. भाजपा अपने चुनावी कैंपेन में यह कहती रही है कि उसकी प्राथमिकता विकास है, वो विकास के सभी सपनों को पूरा करेगी लेकिन हिंदुत्व के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को भी वह सुनियोजित तरीके से बीच-बीच में जताती रही.

बीजेपी चुनाव प्रचार के दौरान हिंदुत्व के प्रति अपने समर्पण को सावधानी से इस्तेमाल करने में कामयाब रही, जबकि पार्टी लगातार इस पर ज़ोर देती रही कि उसका ज़ोर सिर्फ़ विकास पर है और विकास को लेकर सभी उम्मीदें पूरी होंगी.

'युवा निराशा की प्रतिक्रिया होगी'

इस बार बड़ा ख़तरा यह भी है कि अच्छी नौकरी, आसान किस्तों में क़र्ज़ों का भुगतान और बाज़ार का उपभोग करने के युवा मध्य वर्ग के सपने अगर पूरे नहीं हुए तो उनके लिए इस निराशा को झेलना आसान नहीं होगा.

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अगर बड़-बड़े सपने दिखाए जाएंगे तो सच का सामना होने पर उसके परिणाम भयानक हो सकते हैं.

हो सकता है कि ऐसी स्थिति से बहुत ज़्यादा गहरी निराशा उपजे और उतनी ही तीखी उसकी प्रतिक्रिया हो.

'ग़रीबी बाज़ार के लिए भी अच्छी नहीं'

एक संभावना यह भी है कि चुनाव के इस कैंपेन के परिणामस्वरूप ग़रीबों से जुड़े मुद्दे फिर से परिदृश्य से ग़ायब हो जाएं.

लेकिन यह ख़तरनाक बात होगी क्योंकि अपना अस्तित्व बचाना ही ग़रीबों और वंचितों का एकमात्र उद्देश्य है. वे इसके लिए आख़िरी दम तक संघर्ष करेंगे. न सिर्फ़ जो थोड़ा-बहुत उनके पास है उसे बचाने के लिए, बल्कि इसलिए भी कि उनकी आवाज़ सुनी जाए.

लगातार कायम भारी ग़रीबी के कारण बाज़ार को वह स्थायीत्व नहीं मिल सकेगा जिसकी वह कामना करता है. जो भारत को उपभोक्तावादी बाज़ार नियंत्रित कॉर्पोरेट सपने के देश में बदलने के लिए ज़रूरी है.

2009 में मनरेगा, आरटीआई, एफ़आरए और सामाजिक क्षेत्र के कार्यक्रम को मज़बूती देने वाले विधेयक आम चर्चाओं में प्रमुखता से छाए रहे थे. लेकिन यूपीए-2 ने इस शुभेच्छा को खो दिया. सामाजिक नीतियों के क्षेत्र में हासिल की गई उपलब्धियों को देश की गिरती विकास दर की वजह बताया जाने लगा.

वित्त मंत्रालय इन कार्यक्रमों के लिए धन देने के ख़िलाफ़ हो गया और यूपीए-2 के आख़िरी दो सालों में बजट घाटा कम करने के लिए सामाजिक क्षेत्र के कार्यक्रमों में अभूतपूर्व कटौती की गई.

लोगों में यूपीए को लेकर असंतोष है. ग़रीब लोग नीतियों के क्रियान्वयन की आलोचना कर रहे हैं और मध्य वर्ग के लोग इन नीतियों से ही नाराज़ हैं. भ्रष्टाचार की निंदा सब कर रहे हैं.

'जवाबदेही की मांग बढ़ेगी'

विडंबना यह है कि भारत आम जनता को अधिकार संपन्न बनाए जाने के मामले में विश्व में अगुआ है. जिसके तहत ग़रीबी मिटाने, ग़रीबों के लिए योजनाएं बनाने और भागीदारी वाले लोकतंत्र में जनता के सशक्तिकरण पर ज़ोर दिया जाता है.

भारत के आम नागरिक वस्तुतः पिछले दशक में सशक्त हुए हैं, आरटीआई और अन्य अधिकार देने वाले विधेयकों के माध्यम से. अधिकार देने वाले ढांचे को खोखला या नष्ट करना सत्ताधारी दल या सरकार के लिए जोखिम होगा.

नई सरकार के लिए एक परीक्षा यह भी होगी कि वह सरकार की जनता के प्रति जवाबदेही की मांग को किस तरह लेती है. आरटीआई आंदोलन की ताक़त से बने लोकपाल और व्हिसलब्लोअर क़ानून नागरिकों के लिए नए हथियार बनेंगे.

ऐसे में अपने चुनावी वादे पूरा न करना किसी भी नई सरकार के लिए अब आसान नहीं होगा.

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