कंप्यूटर के जादूगरों को मिलती है यहां लाखों-करोड़ों की सैलरी

पश्चिमी देशों से जब नौकरियां कम होकर भारत आती हैं, तो वहां की पत्रिकाओं में कुछ इस तरह से लिखा जाता है– क़रीब दो हज़ार नौकरियां “बैंगलोर्ड” हो गईं.

बंगलौर कभी सिर्फ़ एक शहर का नाम था, पर वैश्विक अर्थतंत्र और अंग्रेज़ी में अब उसे एक क्रिया के तौर पर देखा जा रहा है.

कभी यह एक उनींदा, खुला हुआ, धीमा छावनी शहर था, अब धड़कती दुनिया के सबसे बड़े और अहम पतों में से एक है. बदलते भारत का शीर्ष प्रतीक. ग्लोबल विलेज़, कॉस्मोपॉलिटन.

दुनिया की सारी इन्फ़ॉर्मेशेन टेक्नोलॉजी का बैकरूम.

एक ऐसी जगह, जहां डॉलर के मुक़ाबले रुपए के लुढ़कने की ख़ुशी ज़्यादा होती है, क्योंकि डॉलर की मज़बूती का मतलब होता है नई नौकरियां.

जहां भारत के बजाय दुनिया के बड़े बाज़ारों में आते हिचकोलों से ज़्यादा फ़र्क पड़ता है.

निजी क्षेत्र में सबसे ज़्यादा रोज़गार देने वाला उद्योग

भारत में क़रीब 31 लाख लोग आईटी-बीपीओ में काम करते हैं. सॉफ़्टवेयर कंपनियों के संगठन नैसकॉम के अनुसार, आईटी किसी भी उद्योग के निजी क्षेत्र से ज़्यादा रोज़गार देने वाला उद्योग है.

यह देश के सर्विस सेक्टर के कुल निर्यात का 38 फ़ीसदी हिस्सा भी है और देश की जीडीपी में भी इसका महत्वपूर्ण योगदान है.

आईटी क्षेत्र की नौकरी, भारत की युवा पीढ़ी के लिए ग्लोबल विलेज के नागरिक बनने का सबसे आसान रास्ता भी है.

चाहे वे रांची से हों या टीकमगढ़ से या फिर झारसुगड़ा से. ट्रेनिंग और प्रोजेक्ट के लिए विदेश कब अपना देश बन जाता है, पता ही नहीं चलता.

बड़ी और नई नौकरियों के लिहाज़ से बंगलौर पिछले कई साल से एक मज़बूत शहर बना हुआ है. नौकरियों के अलावा सॉफ़्टवेयर पेशेवर ख़ुद की कंपनियां भी खोल रहे हैं और चला भी रहे हैं. ये प्रयोग कुछ हद तक सफल भी होते हैं.

बीच में थोड़े झटके थे, पर अब रोज़गार का बाज़ार फिर उठ रहा है.

नौकरी बाज़ार में लौटी है रौनक

आईटी से लेकर एविएशन तक के बहुतेरे उद्योगों में मीडियम और सीनियर स्तर की नियुक्तियां करने वाली मानव संसाधन कंपनी एबीसी कंसल्टेंट की निदेशक रत्ना गुप्ता मानती हैं कि स्थिति पिछले दो-तीन वर्षों से बेहतर है और नौकरियों के बाज़ार में कुछ सुधार हुआ है.

रत्ना गुप्ता कहतीं हैं, “जॉब मार्केट रिकवर कर रहा है और आगे इसमें कितना सुधार हो पाता है, वह निर्भर करेगा आने वाली सरकार पर. कॉरपोरेट सेक्टर सांसें रोककर इस चुनाव के परिणामों का इंतज़ार कर रहा है. सभी चाहते हैं कि एक स्थिर सरकार आए.”

रत्ना गुप्ता के अनुसार आईटी से लेकर आउटसोर्सिंग तक का उद्योग नौकरियों के लिहाज़ से अन्य उद्योगों की तुलना में ज़्यादा रोज़गार देता है और बीते कुछ महीनों में कई रिक्तियां भी आई हैं.

नौकरियों के बाज़ार में कई महीनों बाद रौनक लौटी है, लेकिन पहले भी यह कई युवाओं के लिए रोज़गार और सपने सच करने वाला शहर रहा है.

न जात न पात, सिर्फ़ डिग्री और काबलियत

इंजीनियरिंग की डिग्री और जीवन में सफल कहलाने का ख़्वाब आंखों में लिए छोटे-बड़े शहरों से युवा बंगलौर में आते हैं और इनमें से ज़्यादातर को यह शहर निराश भी नहीं करता.

यहां न जात नौकरी दिलाती है और न ही धर्म आड़े आता है.

पटना, कानपुर, लखनऊ, नासिक से लेकर भागलपुर और मेरठ जैसे अनगिनत छोटे शहरों से युवा यहां नौकरियों के लिए पहुंचते हैं.

कुछ वर्षों बाद शहरों के बंधन टूट जाते हैं और फिर सभी बन जाते हैं ग्लोबल सिटिज़न.

तीस से पहले फ़्लैट, गाड़ी और परिवार

तीस की उम्र से पहले एक फ़्लैट, गाड़ी और परिवार यहां आने वाले युवाओं के आम सपने हैं.

लेकिन बीते वर्षों में इन सपनों के रास्ते में कुछ रुकावटें भी पनपी थीं.

फ़्रेशर्स और ऊपर के स्तर की नौकरियां देने वाली मानव संसाधन कंपनी, एचआर ग्लोबल की जनरल मैनेजर ऋतु नायर ने बताया, “अब अधिकतर कंपनियां एक सफल टीम बनाने के लिहाज़ से नियुक्तियां नहीं कर रही हैं, बल्कि वो बहुत ही मैकेनिकल तरीके से छेद भरने की कार्रवाई कर रही है. नए टैलेंट की ग्रूमिग के लिए ट्रेनिंग का भी अभाव है.”

नौकरी बाज़ार में क्या है फ़्रेशर्स का दांव?

परिस्थितियां बदली हैं, अर्थव्यवस्था में आई मंदी ने उन्हें और कठिन भी बनाया है, तो क्या नौकरियों के लिए उम्मीदवारों के व्यवहार में भी बदलाव आया है?

ऋतु नायर बताती है, “अभी जो फ्रेशर्स नौकरियों के लिए हमारे पास आ रहे हैं, वो अपनी निजी ज़िंदगी को लेकर बेहद फोकस्ड हैं. चाहते हैं कि दो-तीन साल में गाड़ी ले लें, पांच साल में फ़्लैट ख़रीद लेना है. कुछ ऐसे भी क्षेत्र हैं जहां सुधार की आवश्यकता है. ज़्यादातर फ़्रेशर्स के सीवी पर अगर नज़र डालें, तो आप पाएंगे कि सब एक जैसे दिखते हैं. सबका मज़बूत पक्ष, कमज़ोर पक्ष और क्वॉलिफ़िकेशन एक जैसे हैं. सब कार्बन कॉपी से दिखते हैं, जबकि पहचान की तरह सीवी भी हरेक का अलग दिखना चाहिए.”

नायर के अनुसार, ‘कार्बन कॉपी’ जैसी स्थिति में कंपनियों के लिए किसी को चुनने का फ़ैसला कठिन हो जाता है. ऐसे में कपनियां शैक्षिक संस्थान देखकर इंटरव्यू के लिए बुलाते हैं और उसी के आधार पर उनकी तनख्वाहें भी तय की जाती हैं.

किसको मिलता है कितना पैसा?

आईटी उद्योग से जुड़े लोगों की मानें, तो फ़्रैशर्स की क्षमताओं और शिक्षा-दीक्षा के आधार पर उन्हें ढाई-तीन लाख रुपए से लेकर 10-12 लाख तक के सालाना पैकेज़ ऑफ़र किए जाते हैं.

वहीं वरिष्ठों को मिलने वाली सैलरी उनकी उपलब्धियों, प्रायोगिकता और योजनाओं के आधार पर किसी भी स्तर तक पहुंच सकती है.

सालाना एक करोड़ रुपए से ज्यादा तक भी, कंपनी बॉन्ड और शेयरों से होने वाली कमाई अलग.

इस रास्ते से होकर गुज़र चुके और अपनी कंपनी खोलकर बैठे लोगों के लिए भी संभावनाएं कम नहीं हैं. बड़ी कंपनियों के ही भौगोलिक क्षेत्र में होने के कारण प्रतिस्पर्धा का फ़ायदा नए प्रयोगों को भी मिलता है.

इन सबका प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष असर नौकरियों पर पड़ता है.

रत्ना गुप्ता की ही तरह ऋतु नायर ने भी नई सरकार से उम्मीदें बाँधी हैं.

उनका कहना है कि नई सरकार को देशी-विदेशी निवेश को प्रोत्साहन देना चाहिए और साथ ही क़ानून भी ऐसे बनाने चाहिए ताकि किसी क्षेत्र के विकास को उससे नुक़सान न पहुंचे.

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