जयललिता किंग बनेंगी या किंगमेकर?

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क्या वे केंद्र की राजनीति में अहम भूमिका निभाएँगी या नहीं, ये बहस शुरू हो चुकी है. जैसे-जैसे मतगणना की तारीख करीब आ रही है, सबकी नज़रें तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयराम जयललिता पर टिकी हुई हैं.

आखिरकार भारतीय राजनीति की तीन क्षेत्रीय महिला राजनेताओं में वे एकमात्र ऐसी महिला नेता हैं जिन्होंने अभी तक नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली भाजपा सरकार को समर्थन देने या न देने के बारे में स्पष्ट तौर पर कोई राय नहीं जाहिर की है.

(जयललिता बन पाएंगी किंगमेकर?)

बहुमत के आँकड़े से पीछ रह जाने की सूरत में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को इन महिला राजनेताओं के मदद की ज़रूरत पड़ सकती है. जयललिता के अलावा तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी और बसपा की मायावती दो अन्य महिला क्षेत्रीय क्षत्रप हैं.

ममता बनर्जी और मायावती दोनों ने ही ये स्पष्ट कर दिया है कि प्रचार अभियान के दौरान दिए गए उनके भाषण महज चुनावी बयानबाज़ी नहीं थी.

वहीं मोदी टेलीविज़न चैनलों पर अपने इंटरव्यू में कह चुके हैं कि चुनावों के बाद क्षेत्रीय पार्टियों के साथ सहयोग को लेकर वे सकारात्मक हैं.

अंग्रेजी अखबार 'डेक्कन क्रॉनिकल' के रेज़ीडेंट एडिटर भगवान सिंह बीबीसी से कहते हैं, "यह तय है कि जयललिता तमिलनाडु की 39 सीटों में से ज़्यादातर जीत रही हैं. वे संसद में सबसे बड़ी क्षेत्रीय ताकत बन कर उभर सकती हैं. मोदी के साथ उनके हाथ मिला लेने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है."

गुजरात की तुलना

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ममता बनर्जी और मायावती की तरह जब जयललिता को अहसास हुआ कि उनके वोट भाजपा की तरफ़ जा सकते हैं तो उन्होंने भी मोदी पर अपने सुर तीखे कर लिए थे. भाजपा ने तमिलनाडु की छोटी-छोटी पार्टियों को साथ लेकर एक बड़ा सा गठबंधन बनाया.

(तमिलनाडुः कौन है बेहतर?)

जयललिता ने लोगों से कहा कि 'मोदी' की बजाय 'लेडी' को वोट दें क्योंकि तमिलनाडु गुजरात की तुलना में विकास का कहीं बेहतर मॉडल है. राजनीतिक विश्लेषक केएन अरुण भी भगवान सिंह से सहमति जताते हैं, "भाजपा गठबंधन को नंबर कम पड़े तो इसमें कोई शक़ नहीं है कि वे एक अहम खिलाड़ी होंगी."

वे कहते हैं, "प्रधानमंत्री पद के लिए जयललिता मोदी का समर्थन करेंगी या नहीं यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है. अगर उनकी ताकत गठबंधन के लिए मजबूरी की हद तक ज़रूरी हुई तो वे ख़ुद को मोदी की जगह प्रधानमंत्री पद के लिए आगे कर सकती हैं. ऐसा हो तो इस पर किसी को हैरत नहीं होनी चाहिए."

स्तालिन की चुनौती

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हालांकि तमिलनाडु और जयललिता की राजनीति पर करीबी नज़र रखने वाली वासंती, भगवान सिंह और केएन अरुण से इत्तेफाक नहीं रखती हैं. वासंती कहती हैं, "वे जो कुछ भी करती हैं पूरी एहतियात के साथ करती हैं. वे अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश करेंगी कि अल्पसंख्यक समुदाय के वोटों को नुकसान न पहुँचे."

(तमिलनाडु के सियासी समीकरण)

वे कहती हैं, "जयललिता की नजरें 2016 के विधानसभा चुनावों पर हैं और उन्हें पता है कि द्रमुक के एमके स्टालिन इसके लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं."

जब जयललिता ने मोदी की आलोचना नहीं की, तो आम तौर पर ये माना जाने लगा कि अल्पसंख्यक समुदायों के वोट अन्नाद्रमुक से छिटक कर द्रमुक की ओर चले गए हैं.

राज्य में भाजपा ने सात पार्टियों का गठबंधन बनाया है जिसमें डीएमडीके, पीएमके, एमडीएमके जैसी पार्टियां हैं. जयललिता ने अपने वोटों को इस खेमे में जाने से रोकने के लिए मोदी पर हमला बोला.

लेकिन उन्होंने कभी 2002 के गुजरात दंगों पर एक शब्द नहीं बोला जिसे लेकर पूरी राजनीतिक बिरादरी मोदी की आलोचना करती रही है.

वाजपेयी का साथ

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लेकिन सवाल उठता है कि क्या वे एक भरोसेमंद सहयोगी हैं? भगवान सिंह कहते हैं, "उनके जैसा गठबंधन सहयोगी होने का मतलब है कि हर रोज़ सांस अटकी रहेगी.

('गुजरात के बारे में मिथ गढ़ा जा रहा है')

अरुण कहते हैं, "उन्होंने 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी के लिए मुश्किल खड़ी कर दी थी. उस वक़्त उन्होंने सरकार से समर्थन इसलिए वापस लिया था कि कथिततौर पर वे अपने कुछ मुक़दमे ख़त्म करवाना चाहती थीं. वे केंद्र से अपने प्रतिद्वंद्वी टेलीविज़न नेटवर्क पर कार्रवाई करवाना चाह रही थीं और जब भाजपा सरकार ने उनकी मदद नहीं की तो उन्होंने समर्थन वापस ले लिया."

यानी एक ऐसे शख्स के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता है जिसके बारे में कोई अनुमान लगाना कठिन हो.

इससे पहले कि चेन्नई स्थित पोएस गार्डन से मोदी को समर्थन देने वाला उनका बयान आए, सब कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि भाजपा की अगुआई वाले एनडीए को सरकार बनाने के लिए चुनाव बाद के सहयोगियों की ज़रूरत पड़ेगी ही नहीं.

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