चुनाव और बीबीसी की ख़बरें

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भारत में लोकतंत्र का उत्सव यानी आम चुनाव वोटों की गिनती के साथ ही समापन पर हैं. 16 मई को नतीजे सामने होंगे. इस चुनाव में क्या भारत का वह आख़िरी शख़्स शामिल है, जो हाशिए पर खड़ा है. बीबीसी हिंदी सेवा के संपादक निधीश त्यागी बता रहे हैं ख़ास पड़ताल- क़तार के आख़िरी के बारे में.

किसका देश किसका लोकतंत्र

...क्योंकि बच्चों की मौत कोई चुनावी मुद्दा नहीं

बिहार में ज़िला मुख्यालय छपरा से 35 किलोमीटर दूर मशरख के निकट धर्मासती गंडामन गाँव आजकल शांत है.

महाराजगंज लोकसभा क्षेत्र में आने वाले इस गांव में राजनीतिक हलचल नज़र नहीं आती.

ये वही गाँव हैं जिसने पिछले साल जुलाई में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुर्ख़ियाँ बटोरी थी. वजह थी मिड डे मील हादसा, जिनमें 23 मासूम बच्चों ने अपनी जान गँवा दी थी. पंकज प्रियदर्शी की विशेष रिपोर्ट

कपास जिससे ज़ख़्म ढकने वाले फाहे नहीं बनते

विदर्भ के किसान कपास उगाते हैं. इसके लिए हज़ारों रुपए का क़र्ज़ लेते हैं, लेकिन जब फ़सल बर्बाद होती है, तो उनके सामने आत्महत्या के सिवाय दूसरा विकल्प नहीं होता.

नागपुर से 135 किलोमीटर दूर दाहेगाँव में नज़र आती है ग़रीबी की वो तस्वीर जिसमें बरसों की लाचारी, बदहाली और नाउम्मीदी के रंग मिले हुए हैं.

अब से आठ साल पहले, ग़रीबी से मुक्ति का उपाय ढूँढ़ने में नाकाम इंदिरा के पति ने आत्महत्या कर ली थी.

क़तार के आख़िरी में विदर्भ की विधवाओं का दर्द. ज़ुबैर अहमद की विशेष रिपोर्ट

तेंदुए का ख़ौफ़, तो चुनाव से तौबा

75 हज़ार की आबादी और पिछले छह महीने में छह बच्चों की मौत.

तेंदुए के ख़ौफ़ का यह आलम है कि माँ-बाप बच्चे को गोद से उतारने से डरने लगे हैं. भारत-नेपाल सीमा पर बसे लौकी कला गाँव में अजब सा माहौल है.

उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती-बलरामपुर ज़िलों के अंतर्गत आने वाले सुहेलदेव वन्य-जीव अभयारण्य में क़रीब 100 गांवों में पिछले छह महीने से ज़्यादा समय से तेंदुए का ख़ौफ़ छाया हुआ है.

नितिन श्रीवास्तव की ख़ास चुनावी रिपोर्ट.

बनारस: 'पीपली लाइव बन गया है ये चुनाव'

बीबीसी हिंदी की टीम चुनावों के दौरान कई राज्यों में युवाओं का मन टटोलने पहुंची.

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में आयोजित बीबीसी गूगल हैंगआउट में अंशा नामक एक छात्रा का कहना था, ''बनारस एक चुनावी सर्कस में बदल गया है, ये पूरी तरह पीपली लाइव हो गया है. मगर चुनाव के बाद ये फ़ोकस जल्द ही ख़त्म हो जाएगा."

बनारस से बीबीसी हिंदी का कैम्पस हैंगआउट

'मेरे गाँव तो नहीं पहुँचा गुजरात का विकास'

इस चुनाव के दौरान गुजरात के विकास की चर्चा काफ़ी सुनाई देती रही. कितना उल्लेखनीय है ये विकास?

इस विषय पर गुजरात विद्यापीठ के छात्र-छात्राओं में बहुमत की राय आम धारणा से उलट मिली.

विद्यापीठ के छात्र किशोर कहते हैं, ''गुजरात में दलितों या आदिवासियों का कितना विकास हुआ है? नरेंद्र मोदी के विकास का मॉडल पूरे देश पर लागू नहीं हो सकता. विकास हुआ है मगर जिन वर्गों का होना चाहिए था उनका नहीं हुआ है."

गुजरात विद्यापीठ से बीबीसी हिंदी का कैम्पस हैंगआउट

दिल्ली तक पहुंचती है कश्मीर की आवाज़?

लोकसभा चुनावों के दौरान पूरे देश में बड़ी तादाद में मतदान की चर्चा के बीच भारतीय कश्मीर में अलगाववादियों ने मतदान के बहिष्कार का ऐलान किया था.

क्या युवा कश्मीरी भी इस चुनाव से अलग रहने वाले हैं?

इसी को टटोलने के लिए बीबीसी कैंपस हैंगआउट की टीम श्रीनगर से लगे बारामूला में एसएसएम कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग ऐंड टेक्नॉलॉजी पहुंची थी.

बारामूला से बीबीसी हिंदी का कैम्पस हैंगआउट

चाहती हूं शादी करना, वोट डालना भी, पता नहीं कब

मणिपुर की राजधानी इम्फ़ाल की इरोम शर्मिला बीते 13 साल से सरकार के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रही हैं एक ऐसे क़ानून के ख़िलाफ़ जो उनकी नज़र में मानवाधिकार छीनता है.

साल 2000 में जब शर्मिला ने अनशन शुरू किया था, वह 28 साल की थीं. उनकी मांग थी कि मणिपुर में लागू सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून हटाया जाए क्योंकि उसकी आड़ में कई मासूम लोगों की जान ली जा रही है.

इरोम की उम्र अब 41 पार कर चुकी है. क़ानून अब भी प्रदेश के कई इलाक़ों में लागू है और इरोम बँधी हैं अपनी ही शर्त में.

आमरण अनशन की इस मुहिम में वह अकेली हैं क़तार की आख़िरी मगर उनके हौसले कम नहीं हुए हैं. दिव्या आर्य की विशेष रिपोर्ट

वोट तो लेते रहेंगे, कभी पानी भी देंगे

हर तरफ़ रेत के टीले... हरियाली के नाम पर खेजड़ी, बबूल और जाल के पेड़. और खुशनुमा रंगों के नाम पर महज़ कैर के बौर और नागफ़नी की झाड़ियों के फूल.

रेगिस्तान की तपती दुपहरी में सन्नाटा तोड़ती ऊंट गाड़ी की रुनझुन. बाड़मेर ज़िला मुख्यालय से करीब 150 किलोमीटर दूर बसा है गांव जुड़ियां, ग्राम पंचायत झणकली, तहसील शिव.

26 साल की मूली सिंह इसी गाँव में छह साल पहले बहू बनकर आई. मायका चौहटन भी इसी ज़िले में है पर वहां पानी की बेरियां, टांके हैं गांव के नज़दीक. इसलिए मीठे पानी की भारी किल्लत नहीं. ससुराल में आकर देखा कि यहां तो ''मीठा पानी है ही नहीं तो लाएं कहां से?'' पूरी रिपोर्ट पढ़ें

'चायवाला मोदी' पर किसकी चाय कितनी चर्चा?

कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने जब नरेंद्र मोदीपर चुटकी लेते हुए उन्हेंचायवालाकहा तो शायद उन्हें इस बात का अंदाज़ा भी नहीं होगा कि भारतीय जनता पार्टी मोदी के इस 'अपमान' को चुनाव 2014 के सबसे बड़े डिजिटल कैंपेन में बदल देगी.

भारतीय जनता पार्टी ही नहीं भारत का लोकसभा चुनाव हर किसी के लिए दुनिया के सबसे बड़ा डिजिटल चुनाव रहा, लेकिन बीबीसी पर हमने ये जानने की कोशिश की, कि ऑनलाइन छाए रहने वाले ये डिजिटल चुनावी कैंपेन क्या ऑफलाइन भी उतने ही कारगर हैं?

जिस आम आदमी तक पहुंचने की ये सारी कवायद है क्या वो वाकई इन्हें देख रहा है? पारुल अग्रवाल की रिपोर्ट

'ज़मीन तो अच्छी है पर क्या मिट्टी खाऊँ'

बिहार की ज़मीन और युवाओं के दिमाग़- दोनों को ही उर्वर माना जाता है. मगर उन्हीं में से एक युवा की झुंझलाहट कुछ इस अंदाज़ में सामने आई बीबीसी कैंपस हैंगआउट में.

बिहार में बीबीसी कैंपस हैंगआउट की चर्चा का विषय था- 'बिहार को क्या चाहिए: नीतीश का मॉडल या मोदी का मॉडल.'

मोदी के विकास मॉडल में जहाँ औद्योगीकरण और महिलाओं को सुरक्षा की चर्चा प्रमुखता से होती है तो वहीं नीतीश के मॉडल में सभी वर्गों के विकास का नारा है.

बिहार में मुज़फ़्फ़रपुर के बाबा साहब भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं के लिए इन दोनों मॉडलों पर बहस का मौक़ा था. उन्होंने इसका बख़ूबी इस्तेमाल भी किया.

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