अब दिल्ली दूर नहीं... मगर किसके लिए

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कुछ घंटों में भारत के सोलहवें लोकसभा चुनाव के नतीजे आ जाएँगे. सट्टा बाज़ार और एग्ज़िट पोल के मुताबिक़ विपक्षी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन जीतेगा और उसके मुख्य दल भारतीय जनता पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी सरकार का गठन करेंगे. यानी देश पर राज करने वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन और उसके मुख्य दल कांग्रेस हार जाएँगे.

लेकिन क्या अब भी कोई आशंका है कि दहलीज़ तक पहुँचकर भी मोदी दरवाज़े से भीतर न जा पाएँ? सवाल बेमायने नहीं है क्योंकि 2004 और 2009 के पिछले दो आम चुनाव में सभी एग्ज़िट पोल ग़लत साबित हुए थे.

गणित का सहारा लें तो पिछले दोनों चुनाव में तमाम एग्ज़िट पोल का औसत असली नतीजों से परे था. राजग के नतीजे एग्ज़िट पोल के औसत से 21.8 प्रतिशत कम थे और संप्रग की कुल संख्या एग्ज़िट पोल के औसत से 21.6 प्रतिशत अधिक थी.

'ज़बरदस्त उछाल चाहिए'

2014 में जो कई एग्ज़िट पोल आए हैं उनका औसत राजग को 277 सीटें और संप्रग को 113 सीटें देता है. अगर राजग के अनुमान को पिछले दो चुनावों की तर्ज़ पर 21.8 प्रतिशत कम किया जाए तो उसकी सीटें घटकर 227 हो जाती हैं.

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ठीक इसी तरह संप्रग के लिए एग्ज़िट पोल के औसत को 21.6 प्रतिशत बढ़ाया जाए तो उसकी सीटें बढ़ कर 144 हो जाती हैं.

227 सीटें हासिल करने के बाद भी राजग को सरकार बनाने के लिए 45 सीटों की आवश्यकता होगी क्योंकि लोकसभा में बहुमत के लिए कमसेकम 272 सीटें चाहिएँ. इसे हासिल करने में मोदी को अधिक तकलीफ़ नहीं होनी चाहिए.

लेकिन मोदी की जीत और राज्यों के मुक़ाबले कहीं अधिक उत्तर प्रदेश और बिहार पर निर्भर कर रही है. और इन दोनों राज्यों में भविष्यवाणी करना और भी मुश्किल है क्योंकि वहां के राजनीतिक समीकरण बेहद पेचीदा हैं.

उत्तर प्रदेश में पिछले दस सालों से क्षेत्रीय पार्टियाँ, बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और भाजपा से कहीं आगे रही है. पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को उत्तर प्रदेश में सिर्फ़ 17.5 प्रतिशत वोट मिले थे और कुल दस सीटें मिली थीं.

लेकिन उत्तर प्रदेश की अस्सी सीटों में से पचास या अधिक सीटें जीतने के लिए भाजपा को इस बार कम से कम 36-37 प्रतिशत वोट चाहिए होंगे. किसी स्थापित पार्टी के लिए इतना ज़बरदस्त उछाल दो चुनाव के दरम्यान पहले कभी नहीं आया है.

'सपा और बसपा'

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अगर मान भी लिया जाए कि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी से वोटरों का मोहभंग हो गया है क्योंकि ये दोनों क्रमश: केंद्र और राज्य में सत्तारूढ़ हैं, तो भी ऐसे कोई संकेत नहीं हैं कि वोटरों का बसपा से भी मन उचट गया है.

बल्कि 2009 के लोकसभा चुनाव में वोटरों का बसपा से बाक़ायदा दिल लगा रहा इसके बावजूद कि वो राज्य में दो साल से सत्ता में थी. यही नहीं, भले ही 22 सीटें जीत कर समाजवादी पार्टी और 21 सीटें जीत कर कांग्रेस बसपा की 20 सीटों से आगे रहीं, बसपा को कांग्रेस (18.25 प्रतिशत) और समाजवादी पार्टी (23.26 प्रतिशत) से ज़्यादा वोट (27.42 प्रतिशत) मत मिले थे.

जब बसपा 2012 में विधानसभा चुनाव हारी थी उसकी सीटें 206 से घट कर 80 हो गई थीं और समाजवादी पार्टी की 97 से बढ़ कर 224 हो गई थीं. लेकिन वोटों की संख्या में बहुत कम फ़र्क़ था: बसपा 25.95 प्रतिशत और सपा 29.29 प्रतिशत.

पिछले दोनों लोकसभा और दोनों विधानसभा चुनावों में सपा और बसपा ने मिल कर पचास से ज़्यादा प्रतिशत वोट खींचे थे. मतलब ये कि केंद्र में कोई भी सरकार हो और देश में किसी की भी "लहर" हो, इन दोनों को आधे से ज़्यादा वोट मिले थे.

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बहुकोणीय होने की वजह से उत्तर प्रदेश में अच्छा वोट प्रतिशत आने के बावजूद कोई गारंटी नहीं होती कि उम्मीदवार सीट जीत जाएगा. 2009 के चुनाव में जो 60 सीटें बसपा हारी थी उनमें उसको 51 पर बीस प्रतिशत से भी अधिक वोट मिले थे. 34 सीटों पर उसे पच्चीस प्रतिशत से ज़्यादा वोट मिले थे और 13 पर तीस प्रतिशत से अधिक. दूसरी ओर पाँच सीटों पर तीस प्रतिशत से ज़्यादा वोट पाने के बावजूद भाजपा हार गई थी.

उत्तर प्रदेश में चौदह करोड़ वोटर है. मानना होगा कि उनमें से महज़ आठ हज़ार लोगों से बात करके ये बता पाना मुश्किल होगा कि उनका ऊँट किस करवट बैठने वाला है.

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