'मोदी बिना वजह किसी को चाय भी नहीं पिलाएँगे'

  • 16 मई 2014
प्रहलाद मोदी

भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी लड़कपन की उम्र में पतंग उड़ाने के शौक़ीन थे.

छोटे भाई प्रह्लाद उन दिनों को याद करते हैं कि तब वो चकरी पकड़ते थे और बड़े भाई नरेंद्र पतंग उड़ाते थे.

प्रह्लाद कहते हैं, ''यदि मैं मना करता तो वो नाराज़ हो जाते थे और मुझे मारते थे. मैं आज भी उनसे डरता हूं.''

अब दोनों भाई कम ही साथ नज़र आते हैं.

नरेंद्र मोदी ने लंबे समय तक अपने परिवार से दूरी बनाकर रखी. इसी आधार पर चुनावी सभा में नरेंद्र मोदी अक्सर कहते रहे कि मेरे पास कोई नहीं है ''जिसके लिए लिए भ्रष्ट हुआ जाए.''

'किसी से डर नहीं'

प्रह्लाद मोदी ने बीबीसी से कहा कि उन्हें अपने भाई पर गर्व है कि वो प्रधानमंत्री बनने वाले हैं.

उनका मानना है कि भारत को अपनी धीमी अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए 'आगे बढ़ने' वाले रवैये की ज़रूरत है.

प्रह्लाद की गुजरात के अहमदाबाद शहर में टायर की दुकान है. नरेंद्र मोदी इस राज्य में साल 2011 से मुख्यमंत्री हैं.

नरेंद्र के बारे में बात करते हुए प्रह्लाद के लहज़े में थोड़ा दुख भी समझ आता है.

प्रह्लाद कहते हैं, ''मुझे लगता है वह अभी भी मुझे प्यार करते हैं.'' प्रह्लाद के ज़ेहन में नरेंद्र मोदी के तौर-तरीके और उनका गुस्सा अभी भी ताज़ा है.

क्या भारत को भी डरना चाहिए

इस सवाल के जबाव पर प्रह्लाद कहते हैं, ''जो भी इस देश का भला चाहता है, उसे डरने की ज़रूरत नहीं है.''

वह आगे कहते हैं, ''डरने की ज़रूरत सिर्फ़ उन्हें है जो देश के ख़िलाफ़ काम करते हैं.''

गुजरात में वर्ष 2002 में साम्प्रदायिक दंगे हुए थे. तब नरेंद्र मोदी राज्य के मुख्यमंत्री थे.

गुजरात दंगों में नरेंद्र मोदी की भूमिका पर भी सवाल उठते रहे हैं. इसी पृष्ठभूमि में, नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की सूरत में भारत में कई लोगों के मन में आशंकाएं पैदा होती हैं.

लेकिन नरेंद्र के भाई प्रह्लाद इस तरह की चिंताओं को भी ख़ारिज़ करते हैं. वह इसे ''ड्रामा'' बताते हैं जिसे ''विपक्ष'' ने खड़ा किया है.

वह इस आरोप को भी ख़ारिज़ करते हैं कि नरेंद्र मोदी मुसलमानों के प्रति दुर्भावना रखते हैं.

प्रह्लाद कहते हैं, ''उन्हें डरने की कोई ज़रूरत नहीं है. नरेंद्र भाई जब छोटे थे, तब भी अक्सर मुसलमानों के साथ खेला करते थे.''

'बिग मेन'

उत्तरी गुजरात में एक छोटा सा कस्बा है- वडनगर. यहीं वह घर है जहां दोनों भाई बड़े हुए थे और बाद में पूरा परिवार यहां से चला गया था.

नरेंद्र मोदी यहां से तब खुद चले गए थे जब वह किशोर उम्र में थे. इस उम्र में ही नरेंद्र मोदी ने खुद को हिंदू राष्ट्रवादी संगठन- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समर्पित कर दिया था.

लेकिन यहां उनके कई पड़ोसी अभी भी रहते हैं जिनमें से कई नरेंद्र मोदी के बचपन के दोस्त हैं.

यहां एक सड़क भी है जो 'मोदी इलाके' के नाम से जानी जाती है क्योंकि यहां रहने वाले लगभग सभी लोग एक ही परिवार या जाति के हैं.

यहां चुनाव के नतीजों की घोषणा होने से पहले ही जश्न का माहौल है जहां लड्डू बांटने की तैयारी है.

यहां जिस घर में सन 1950 में मोदी का जन्म हुआ था, उस घर से एक दरवाज़े की दूरी पर रहने वाले दशरथलाल मोदी कहते हैं, ''यहां हर किसी ने मोदी को ही वोट दिया है.''

वह कहते हैं, ''हमें स्थानीय नेताओं की परवाह नहीं है. हमारा वोट तो बस मोदी के लिए है.''

यहां हर तरफ नरेंद्र मोदी की यादें बिखरी हुई हैं. श्यामल दास पुराने दिनों को याद करते हुए बताते हैं, ''नरेंद्र भाई ने मुझसे कहा था कि उनके हथेलियों की रेखाएं कहती हैं कि वह एक दिन बड़े आदमी बनेंगे. मैं हमेशा गाड़ियों में घूमूंगा.''

यह वर्ष 1960 के शुरुआती दिनों की बात है जब भारत में बहुत कम लोगों के पास कार होती थी.

दूसरी तस्वीर

वडनगर में ऐसा भी नहीं है कि यहां रहने वाले सभी लोग आज अपने नेता नरेंद्र मोदी से बहुत अधिक प्रभावित हैं.

कस्बे के रेलवे स्टेशन पर किसी ज़माने में अपने पिता के साथ नरेंद्र मोदी चाय बेचा करते थे.

उसी रेलवे स्टेशऩ पर अब चाय की दुकानों के इर्दगिर्द जमा कुछ लोगों को लगता है कि नरेंद्र मोदी ने ''इस इलाके का नीचा दिखाया है.''

मीठी चाय की चुस्की लेते हुए एक किसान शिक़ायत करते हैं, ''उन्होंने पूरी ज़मीन ले ली और बड़े कारोबारियों को दे दी.''

एक अन्य किसान कहते हैं, ''नरेंद्र मोदी दस साल से अधिक समय से राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं लेकिन हमारे यहां चंद सड़कें हैं, बिजली कम मिलती है.''

उनकी शिक़ायतें यह दर्शाती हैं कि भारत में नेता किस तरह से बर्ताव करते हैं.

हालांकि छोटे भाई प्रह्लाद को थोड़ी उम्मीद है कि नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री बनेंगे, चीज़ें बदलेंगी.

वह कहते हैं, ''मैं उम्मीद करता हूं कि वह हमारे परिवार की अगली पीढ़ी की मदद करेंगे. लेकिन मुझे भरोसा है कि वह ऐसा नहीं करेंगे. वह तो किसी को बिना वजह चाय भी नहीं पिलाएँगे, ख़ासतौर पर अपने परिवार में.''

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