क्या 'पोलियो आंटी' से मिले हैं आप?

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कुछ साल पहले तक दुनिया भर के पोलियो के आधे मामले भारत में ही पाए जाते थे. लेकिन आज भारत इस बीमारी से आधिकारिक रूप से मुक्त हो गया है.

इस यादगार उपलब्धि का श्रेय पोलियो ड्रॉप की खुराक़ पिलाने वाली महिलाओं की उस टोली को जाता है, जिन्होंने पांच साल से कम उम्र के बच्चों को पोलियो ड्रॉप पिलाने के लिए देश के कोने-कोने में पैदल सफ़र किया.

सीता देवी पोलियो ड्रॉप की खुराक़ पिलाने वाली उन हज़ारों महिलाओं में से एक हैं. 57 वर्षीय सीता देवी ने तेज़ गर्मी में भारत के सुदूर गांवों में मीलों का फ़ासला तय किया ताकि ज़रूरतमंद बच्चों को पिलाई जाने वाली बाइवैलेंट वैक्सीन की खुराक़ दी जा सके.

वह भारत की आंगनवाड़ी में काम करने वाली हज़ारों महिलाओं में से एक हैं. वो भारत में 1995 में शुरू किए गए पल्स पोलियो अभियान का एक हिस्सा रही हैं, जिसका उद्देश्य इस बीमारी का उन्मूलन करना था.

पोलियोमुक्त क्षेत्र

तब से अबतक यहां पर 12.1 अरब बच्चों को पोलियो की खुराक़ पिलाई जा चुकी है.

साल 2006 तक दुनिया में होने वाले पोलियो के आधे मामले भारत में होते थे, लेकिन पिछले तीन सालों से भारत में पोलियो का एक भी नया मामला दर्ज नहीं किया गया.

इस उपलब्धि के कारण विश्व स्वास्थ्य संगठन ने आख़िर में पूरे दक्षिण पूर्व एशिया को पोलियो मुक्त क्षेत्र घोषित कर दिया गया.

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लेकिन अभी सीता देवी चिंतित हैं. उनको नहीं पता कि उत्तर भारत के इलाहाबाद के ग्रामीण इलाक़े में लोगों को छोटे बच्चों को फिर से पोलियो ड्रॉप पिलाने के लिए कैसे समझाया जाए?

वह इलाहाबाद के क्षेत्रीय कार्यालय में सुबह होने वाली बैठक में अपनी यह चिंता साझा करती हैं.

बाहर तापमान 45 डिग्री है. तेज़ चलता हुआ पंखा भी कमरे के तापमान को कम नहीं कर पा रहा है.

पोलियो के टीकाकरण का दूसरा दौर जून में शुरू होने वाला है, लेकिन कई परिवारों को लगता है कि जब भारत पोलियो मुक्त हो गया है तो फिर से ड्रॉप पिलाने की कोई तुक नहीं.

'एक नई समस्या'

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वह क्षेत्रीय स्वास्थ्य अधिकारी राजेश सिंह से कहती हैं, "यह एक नई समस्या है. हमें काफ़ी सावधानी बरतनी होगी ताकि लोगों को समझाया जा सके कि हम फिर से पोलियो ड्रॉप क्यों पिला रहे हैं?"

अन्य आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की तरफ़ से यही बात उठने के बाद राजेश सिंह उनका उत्साह बढ़ाने के लिए परिवारों को नियमित खुराक से पोलियो का उन्मूलन होने की बात समझाने को कहते हैं.

वह बताते हैं कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ता एक दिन में पांच सौ घरों तक पहुंचती है. लेकिन उनकी प्रेरणा पैसा नहीं है. वे इतना अथक परिश्रम पोलियो उन्मूलन के उद्देश्य को हासिल करने के लिए करती हैं.

एक महीने में उनको चार हज़ार के मासिक वेतन के अतिरिक्त थोड़े से अतिरिक्त पैसे इस काम के बदले मिलते हैं.

सीता देवी कहती हैं, "साल 1998 में मैंने पोलियो कार्यक्रम के बारे में सुना और स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र पर पता किया कि क्या वे पोलियो की बीमारी की चपेट में आने वाले मेरे भतीजे का इलाज कर सकते हैं. लेकिन उन्होंने बताया कि इस बीमारी से बचाव का एकमात्र तरीका टीकाकरण है."

'पोलियो आंटी'

इस कारण ने सीता देवी को इस काम के लिए प्रेरित किया. उनके अच्छे व्यवहार के कारण गांव के लोग उनसे खुलकर बात करते हैं और अपनी समस्याएं साझा करते हैं.

वह जब स्लम एरिया में जाती हैं तो बच्चे नंगे पाँव उनके पीछे 'पोलियो आंटी' कहकर दौड़ते हैं.

उनकी एक सहेली ऋतु त्रिपाठी घऱ से 70 किलोमीटर दूर काम करने के लिए जाती हैं. वह अपने बच्चों की देखभाल सप्ताहांत में ही कर पाती हैं, उनकी अनुपस्थिति में उनकी मां उनके बच्चों की देखभाल करती हैं.

वह कहती हैं, "मेरे लिए बार-बार ट्रेन से सफ़र करना संभव नहीं है और इसकी बजाय मैं ऊर्जा पोलियो के ख़िलाफ़ अभियान और अन्य सरकारी योजनाओं में लगाना चाहूंगी."

आंगनवाड़ी में काम करने वाली महिलाओं की एक वास्तविक समस्या है. कुछ साल पहले भारत के कुछ हिस्से में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की हड़ताल हुई थी, लेकिन इस क्षेत्र की स्थिति पहले जैसी बनी हुई है.

ऋतु कहती हैं, "अगर सरकारी हमारी कोशिशों के लिए वेतन में बढ़ोत्तरी करती है तो अच्छा होगा, लेकिन अगर वेतन नहीं बढ़ता है, तब पर भी मैं यह काम करना जारी रखूंगी."

दोपहर बाद तक उनके साथ-साथ मुझे लगा कि रोज़ाना सालों तक यही दिनचर्या दोहराना काफ़ी कठिन है.

लेकिन वह अपने काम के प्रति प्रतिबद्ध हैं. वह कहती हैं, "हमने पोलियो को हराने के लिए कठिन लड़ाई लड़ी है. अगर हम इस बीमारी से मुक्त रहना चाहते हैं तो हम आराम नहीं कर सकते हैं."

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