मैंने कभी मोदी को चायवाला नहीं कहा: मणिशंकर अय्यर

मणिशंकर अय्यर

कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर के 'वह चायवाला क्या प्रधानमंत्री बनेगा', वाले बयान ने कहा जाता है भारतीय जनता पार्टी के चुनाव प्रचार की दिशा ही बदल दी थी. हालांकि वह इसे पूरी तरह बकवास बताते हैं.

वह हार के लिए पार्टी को ज़िम्मेदार मानने को तैयार नहीं बल्कि कहते हैं कि सरकार की ग़लतियों का ख़मियाज़ा कांग्रेस पार्टी को भुगतना पड़ा है.

बीबीसी संवाददाता सलमान रावी से बातचीत में मणिशंकर अय्यर ने पार्टी की चुनाव रणनीति का बचाव किया और बीजेपी पर देश को बांटने का आरोप लगाया.

ऐसा नहीं लगता कि आपके नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ 'चायवाला प्रधानमंत्री' वाले बयान ने दरअसल चुनाव का रुख बदल दिया?

माफ़ कीजिएगा, इस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर रहा हूं. मगर, यह आपका सवाल बिल्कुल बकवास है.

मैंने उनको कभी चाय वाला नहीं कहा और न वह कभी चायवाले ही थे. वह तो ख़ुद अपने भाषणों में जगह-जगह इस बात को कहा करते थे.

अहमद पटेल ने मुझे बताया कि वह ठेके पर कैंटीन चलाया करते थे. मैंने तो बस इतना कहा था कि प्रधानमंत्री बनने की क्षमता उनमें नहीं है.

नरेंद्र मोदी की लहर ने सभी राजनीतिक समीकरणों को ध्वस्त कर दिया, इसे कैसे देखते हैं आप?

मुझे बहुत अफ़सोस है. इसलिए नहीं कि हम सत्ता में नहीं आए. यह तो होता है. किसी भी जनतंत्र में इतने दिनों तक सत्ता में रहना बड़ी बात है. लेकिन जो जर्मनी में जोसफ़ गोएबल्ज़ और हिटलर करते थे, वही मुझे लगता है हिंदुस्तान में इस बार हुआ है.

मैं मानता हूं वायमार संविधान से ज़्यादा हमारा संविधान शक्तिशाली है. इसलिए यहां शायद वह नहीं हो सकता है जो वर्ष 1933 में वहां हुआ था. आप यह नहीं कह सकते कि जर्मनी की जनता बेवक़ूफ़ थी. मगर इसके बावजूद जनता ने हिटलर का समर्थन किया था.

इतिहास हमें बताता है कि जनता भी कभी-कभी ग़लत निर्णय कर सकती है.

मैं लोगों को सावधान करना चाहता हूं कि देश के सामने आगे बड़ा ख़तरा आने वाला है. हमारे देश की पहचान पंथ निरपेक्षता से है और इसे सुरक्षित रखने से ही भारत सुरक्षित रहेगा.

क्या गड़बड़ हो गई कांग्रेस से? कहां चूकी पार्टी कि उत्तर भारत की 233 सीटों में से उसे सिर्फ 10 सीटें ही मिल पाईं?

पहले भी मैंने सुना कि सफ़ाया हो गया है कांग्रेस का. यही हमने सुना 1977 में. यह कोई नई चीज़ नहीं है.

तो फिर यह क्या हुआ है?

सफ़ाए की बात मत कीजिए. हमारा सफ़ाया नहीं बल्कि हार हुई है और बुरी तरह हार हुई है. लेकिन आप यह मत भूलिए कि राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री बने तो उस वक़्त कांग्रेस को 400 से ज़्यादा सीटें मिली थीं.

मगर वह तो इंदिरा गांधी ही हत्या के बाद सुहानुभूति की लहर थी?

तो आपका कहना चाहते हैं कि लोगों ने ग़लती की?

मैं ऐसा नहीं कह रहा हूं. मगर दोनों परिस्थतियां अलग-अलग हैं. क्या ऐसा नहीं लगता आपको?

मुझे लगता है कि इस बार भी धर्म का इस्तेमाल कर, खुले तौर पर नहीं बल्कि अपने तरीक़ों से, जिस तरह नरेंद्र मोदी ने फैज़ाबाद में अपना भाषण दिया, जिस तरह बार-बार जाति की बात उन्होंने उठाई, इन सब चीज़ों से उन्होंने हमारे समाज को बांटा.

क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि आपके पास इन चुनावों को लड़ने की कोई ठोस योजना नहीं थी?

प्रचार अभियान पार्टी चलाती है और सरकार चलाती है सरकार. सरकार की ग़लतियों को हमारे कंधों पर थोप दिया गया.

ग़लतियां मैं इसलिए कह रहा हूं कि घोटाले नहीं हुए मगर आरोपों का स्पष्टीकरण भी सरकार ने ठीक से नहीं दिया. सरकार का जो सूचना तंत्र है वह चला ही नहीं. शायद स्पष्टीकरण समय पर देते तो जो कलंक लगा हम पर वह न लगा होता.

जहां तक पार्टी का सवाल है, तो जिस तरह सोनिया गांधी ने 2004 में प्रचार किया या फिर 2009 में, वह इस बार से बिलकुल अलग नहीं था. मोदी की भाषा, उनका झूठ और बीजेपी द्वारा झोंका गया पैसा.

हमने ऐसा कुछ नहीं किया. इस चुनाव को जीतने के लिए अगर हमें कीचड़ में जाना चाहिए था तो हम वहां तक नहीं गए.

बीजेपी की सोची-समझी चुनाव रणनीति, सोशल मीडिया पर प्रचार के सामने कांग्रेस पीछे नज़र आई?

यह जो आप मध्य वर्ग के लोग हैं, आप सोचते हैं कि जो संदेश संसद में दिया जाना चाहिए वह अगर सोशल मीडिया के ज़रिए दिया जा रहा है तो इसका असर होगा.

अपना नाम कमाने के लिए बीजेपी ने संसद और संसदीय परंपरा को बर्बाद कर दिया है. ऐसा 15वीं लोकसभा का कार्यकाल था.

आज कहा जाता है कि कांग्रेस में सब के सब नेता ही हैं, कार्यकर्ता गौण हैं?

अगर जो इल्ज़ाम आप लगा रहे हैं वह सच भी हो तो फिर कैसे इसी साथ, इसी कैडर के साथ हमने 10 साल तक सरकार चलाई? ठीक है कि कांग्रेस हार गई, मगर देश अब तक बचा हुआ है.

कांग्रेस अपनी सरकार की उपलब्धियों तक को जनता के बीच नहीं ले जा सकी?

मेरा यही कहना है कि जबकि कोई आदमी दीवार पर सफ़ेदी लगाने की कोशिश कर हो और कोई आकर कीचड़ फेंके तो सफ़ाई नज़रअंदाज़ हो जाती है.

हम जनता को अपनी उपलब्धियां बताने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन धर्म की कीचड़, जाति की कीचड़, झूठ की कीचड़ फेंकते जाओ और लोग गुमराह हो जाएं, तब आप अपने आंकड़े देते रहिए, तो कोई सुनने वाला नहीं रहेगा.

हम अपने सिद्धांतों के साथ समझौता नहीं कर सकते. हम जो अल्पसंख्यकों के लिए करना चाहते हैं, उसे हम तुष्टिकरण नहीं समझते हैं.

क्या आप सच्चर कमेटी की रिपोर्ट पढ़ने के बाद भी ऐसा कह रहे हैं?

मैं ये मानता हूं कि सरकार को जिस तरह सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को अमल में लाना चाहिए था, उसने नहीं किया. इसीलिए मैं विदेश मामलों की सलाहकार समिति से हटकर अल्पसंख्यक मामलों की संसदीय सलाहकार शामिल हो गया.

पार्टी में आप और आपके जैसे वरिष्ठ नेता ख़ुद को कहां पाते हैं?

मुझसे वरिष्ठ हैं अहमद पटेल. उनकी राय मानी जाती है. मुझसे वरिष्ठ हैं पी चिदंबरम और एके एंथोनी, उनकी राय मायने रखती है.

यह कहना कि वरिष्ठ नेताओं की राय नहीं ली जाती, बिल्कुल ग़लत होगा. मेरी आवाज़ क्यों नहीं सुनी जाती है? मैं खुद नहीं समझ पाता हूं?

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