जब हिंदी पुरानी एंबेसैडर कार हो जाए

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चार साल पहले यहाँ न्यूयॉर्क में पैदा हुआ मेरा बेटा हिंदी नहीं बोलता है लेकिन मैंने उसे किशोर कुमार के गाने की कुछ लाइनें सिखाईं, "हम तो मोहब्बत करेगा, दुनिया से नहीं डरेगा."

मैं अक्सर उसे इन शब्दों के मायने समझाता हूँ लेकिन कभी-कभी वह मुझसे अंग्रेज़ी में पूछता है, "बाबा, दुनिया का क्या मतलब है?"

इसका मतलब दुनिया होता है बेटा, वो दुनिया जो मैं खो चुका हूँ. हिंदी की दुनिया.

मैंने अपने बेटे के गाने को रिकॉर्ड किया है और उसे उसकी बुआ को व्हॉटसऐप पर सुनाया. मेरी बहन ने मेरे बेटे को लंबे समय से नहीं देखा है. मुझे लगता है कि उसे यह जानकर ताज्जुब होगा जब वे उसे यह कहते हुए सुनेगी कि "चुपचाप सो जाओ."

मैंने अपनी जवानी का ज़्यादातर हिस्सा अमरीका में रहते हुए बिताया है. भारत के बाहर मैंने जितने भी साल गुज़ारे हैं, मैं लगातार उनका हिसाब रखता था लेकिन 14 साल गुज़ारने के बाद मैंने हिसाब रखना छोड़ दिया था. मेरा निर्वासन अब ज़्यादा स्थायी हो गया है.

हिंदी बनी एंबेसैडर कार

घर छोड़ने का एक नतीजा यह भी हुआ कि मुझे अपनी मातृभाषा गंवानी पड़ी.

मेरी हिंदी अब पुरानी एंबेसैडर कार की तरह है. वह चल तो सकती है लेकिन उसमें रफ़्तार नहीं है. मेरी यह पुरानी कार चालू हालत में तो है लेकिन शोर बहुत करती है.

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और धुएं का क्या?

मैं जिस छोटे शहर में रहता हूँ वह हडसन नदी के किनारे है. मैं न्यूयॉर्क जाने के लिए अक़्सर हडसन लाइन ट्रेन का इस्तेमाल करता हूँ. न्यूयॉर्क एक बड़ा शहर है और वहां चलते हुए अचानक आप किसी को फ़ोन पर हिंदी बोलते सुन लें.

"नहीं, नहीं, मामाजी, आप क्या बात कर रहे हो... बलजीत के साथ भेजता हूँ. आप मेरी बात सुनो-." इस तरह की हिंदी जो दिल्ली या पंजाब में बोली जाती है और जिसे बोलते हुए आप बड़े नहीं हुए हो. इस तरह की हिंदी भी मेरे लिए स्वागत योग्य है.

मैंने न्यूयॉर्क शहर में कभी भी किसी भारतीय या पाकिस्तानी टैक्सी ड्राइवर से अंग्रेज़ी में बात नहीं की है. अगर ड्राइवर मूड में है और मेरे पास समय है तो हम अपनी साझा भाषा में लंबी बात करते हैं. यह साथ में बैठकर चाय पीने जैसा एहसास है.

'लेटर फ्रॉम अमेरिका'

मुझे लग रहा है कि मैं भावुक हो रहा हूँ. लेकिन ऐसा क्यों हो रहा है उसका एक कारण है. बहुत साल पहले जब पटना से समकालीन जनमत पत्रिका प्रकाशित होती थी तो उसमें 'लेटर फ्रॉम अमेरिका' नाम से मेरा एक नियमित स्तंभ होता था.

पत्रिका में काम करने वाले लोग अंग्रेज़ी में मेरे लिखे को हिंदी में अनुवाद करते थे और यह हिंदी में छपता था. यह अनुवाद इतना अच्छा होता था कि दिल को छू जाता था.

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जिस सच्चाई को मैं बयां कर रहा था वह मेरी मातृभाषा में ज्यादा सटीक और दिल को छूने वाली लगती थी. मैं अपने ही शब्दों को हिंदी में पढ़ता और मेरी गर्दन के रोएँ खड़े हो जाते. कभी-कभी तो मैं ज़्यादा ही भावुक हो जाता.

हाल में मेरी किताब ‘ए मैटर ऑफ़ रैट्स: ए शॉर्ट बायोग्राफ़ी ऑफ़ पटना’ का अमरीका में प्रकाशन हुआ. एक रेडियो स्टेशन के एक प्रोड्यूसर ने मुझे उस जगह के बारे में एक कविता भेजने का कहा. मैंने पटना के बारे में सोचा और अपने दोस्त आलोक धन्वा की दो कविताओं का अनुवाद किया.

मैंने इन दो कविताओं को चुना क्योंकि न केवल वे बहुत ख़ूबसूरत थीं बल्कि इसलिए भी कि वे ट्रेन के बारे में थीं. वे मुझे उस वक़्त की याद दिलाती थीं जब में दिल्ली में पढ़ता था और पटना के लिए ट्रेन पकड़ता था. घर पहुँचने की सुखद अनुभूति, माँ का खिला चेहरा देखने की ख़ुशी.

दिल्ली की गलियों का अहसास

और फिर पिछले सप्ताह ही मुझे न्यूयॉर्क सिटी में अपनी किताब के कुछ अंश पढ़ने के लिए बुलाया गया. साथ ही मैंने एक साहित्यिक कार्यक्रम में हिस्सा लिया जिसमें हिंदी लेखक उदय प्रकाश और उनके दुभाषिए जेसन ग्रुनबॉम भी थे.

उदय प्रकाश की कहानियों का संग्रह अमरीका में 'द वॉल्स ऑफ़ देहली' नाम से प्रकाशित हुआ है. मैंने एक बार फिर न्यूयॉर्क जाने के लिए हडसन लाइन का सहारा लिया.

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उदय प्रकाश ने हिंदी में पढ़ा.

ऐसा लग रहा था कि मैं जैसे मैनहटन की एक इमारत की छठी मंजिल से राजघाट के क़रीब दिल्ली की गलियों में पहुँच गया हूँ. एक व्यक्ति जो उस इलाक़े से अच्छी तरह वाकिफ़ था मुझसे बात कर रहा था और मुझे अतीत में ले जा रहा था. भाषा का और क्या मतलब होता है?

साहित्यिक हिंदी को सुनना और वो भी जब सामाजिक और राजनीतिक सच्चाई बयां कर रही हो, अतीत के संदेश को प्रेषित करती लेकिन विरोध के साथ, एक ऐसा अहसास है कि आप अकेले नहीं हैं.

आप घर पहुँच गए हैं. आप एक संपूर्ण का हिस्सा हैं, एक ऐसा संपूर्ण जो हमेशा आपके साथ था. आपका मानव होने का अहसास आपको दे दिया गया हो जैसे कि वो कोई झंडा है. यह झंडा धीरे-धीरे हवा में लहरा रहा है.

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